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डरा हुआ सत्ता तंत्र! जनता के विरोध पर एक और तुगलकी फरमान

जंतर-मंतर बंद, रामलीला मैदान 2026 में सिर्फ 3 दिन खाली—आखिर जनता विरोध करे तो कहां करे?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026

दिल्ली में जनता अपनी आवाज उठाए भी तो आखिर कहां? पहले जंतर-मंतर रोड को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया और अब राजधानी के प्रमुख प्रदर्शन स्थलों में शामिल रामलीला मैदान की बुकिंग का हाल यह है कि 2026 के अंत तक सिर्फ तीन दिन—29, 30 और 31 दिसंबर—ही उपलब्ध हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब विरोध के लिए घोषित मैदानों में जगह ही नहीं मिलेगी, तो सरकार से सवाल पूछने और अपनी मांगें रखने वाले लोग कहां जाएंगे?

दिल्ली में रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के CBD ग्राउंड को जंतर-मंतर रोड के स्थान पर नए निर्धारित प्रदर्शन स्थलों के रूप में नामित किया गया है। लेकिन रामलीला मैदान की उपलब्धता ने इस व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस मैदान में करीब 50 हजार लोगों के जुटने की क्षमता है, वहां साल के बाकी दिनों में प्रदर्शन के लिए कोई तारीख उपलब्ध नहीं होने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार, अब केवल 29, 30 और 31 दिसंबर को बुकिंग की गुंजाइश है।

प्रदर्शन की इजाजत, लेकिन जगह और तारीखें कहां?

रामलीला मैदान करीब 12 एकड़ में फैला है। इतने बड़े मैदान में हजारों लोगों के जुटने की क्षमता है, लेकिन जब बुकिंग के लिए केवल तीन दिन उपलब्ध हों, तो विरोध प्रदर्शन आयोजित करने वाले संगठनों के सामने व्यावहारिक मुश्किलें खड़ी होना स्वाभाविक है। किसी आंदोलन की तारीख तय करना, लोगों को जुटाना और आयोजन की तैयारी करना समय मांगता है। ऐसे में महीनों तक उपलब्धता न होना शांतिपूर्ण विरोध की योजना को प्रभावित कर सकता है।

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन कोई सरकारी एहसान नहीं, बल्कि जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, चुनावी प्रक्रिया या नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर लोग तभी प्रभावी ढंग से अपनी बात रख सकते हैं, जब उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का वास्तविक अवसर मिले। केवल कागज पर प्रदर्शन स्थल घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है; वहां जगह और तारीख उपलब्ध होना भी जरूरी है।

जंतर-मंतर के बाद रामलीला मैदान पर भी सवाल

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर रोड को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित सूची से हटा दिया है। इसके बाद तीन नए स्थलों की व्यवस्था सामने आई। लेकिन रामलीला मैदान की सीमित उपलब्धता ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है कि क्या राजधानी में शांतिपूर्ण विरोध के लिए पर्याप्त और व्यावहारिक विकल्प मौजूद हैं?

प्रशासन यातायात, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला दे सकता है। बड़े आयोजनों के लिए अनुमति, सुरक्षा इंतजाम और स्थान का प्रबंधन जरूरी भी है। मगर इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों को आसान बनाना होना चाहिए, न कि उन्हें इस स्थिति में पहुंचा देना कि वे महीनों तक अपनी मांगों के साथ इंतजार करते रहें।

यदि किसी मैदान पर पहले से दूसरे कार्यक्रम निर्धारित हैं, तो प्रशासन को बुकिंग की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। साथ ही, अन्य निर्धारित स्थलों की उपलब्धता, अनुमति की प्रक्रिया और वैकल्पिक तारीखों की जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए। इससे प्रदर्शन करने वाले संगठनों को समय रहते योजना बनाने का अवसर मिलेगा।

आखिर असहमति की आवाज कहां उठेगी?

जंतर-मंतर रोड को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और रामलीला मैदान में केवल तीन तारीखें उपलब्ध होने के बीच सबसे बड़ा सवाल नागरिक अधिकारों का है। क्या दिल्ली में सरकार की नीतियों से असहमत लोग अपनी बात आसानी से रख सकते हैं? क्या विरोध के लिए घोषित स्थानों पर पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं? और यदि नहीं, तो प्रशासन जनता को कौन-सा व्यावहारिक विकल्प दे रहा है?

सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का आकलन केवल उसके भाषणों से नहीं, बल्कि इस बात से भी होता है कि वह आलोचना और असहमति के लिए कितनी जगह देती है। शांतिपूर्ण विरोध करने वालों को कानून का पालन करना चाहिए, लेकिन प्रशासन की भी जिम्मेदारी है कि अनुमति की प्रक्रिया स्पष्ट, पारदर्शी और व्यावहारिक हो।

लोकतंत्र में मैदान का नाम घोषित कर देना काफी नहीं; जनता को वहां अपनी आवाज उठाने का अवसर भी मिलना चाहिए। जंतर-मंतर का रास्ता बंद होने और रामलीला मैदान में साल के अंत तक केवल तीन दिन उपलब्ध होने के बाद सवाल सीधा है—आखिर जनता विरोध करे तो कहां करे?

दिल्ली प्रशासन को अब स्पष्ट करना चाहिए कि बाकी दिनों में प्रदर्शन के इच्छुक संगठनों के लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं। क्योंकि लोकतंत्र की ताकत असहमति को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने और उसका जवाब देने में है।

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