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ग्रामीण रोजगार की नई इबारत: मनरेगा को विदाई, ‘जी राम जी’ कानून से 125 दिन काम की गारंटी

एबीसी डेस्क 18 दिसंबर 2025

लोकसभा ने गुरुवार को ‘विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी–जी राम जी बिल’ को मंजूरी दे दी। यह बिल करीब दो दशक पुराने मनरेगा कानून की जगह लेगा। सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण परिवारों की आय-सुरक्षा मजबूत होगी और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को जमीन पर उतारने में मदद मिलेगी। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ग्रामीण परिवारों को साल में 100 नहीं बल्कि 125 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी मिलेगी।

सरकार ने इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए “संजीवनी” बताया है। बढ़ते महंगाई दबाव और गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन के बीच सरकार का कहना है कि अतिरिक्त 25 दिन का काम गरीब परिवारों को राहत देगा। जल संरक्षण, ग्रामीण बुनियादी ढांचा और टिकाऊ आजीविका जैसे कामों को इस योजना की प्राथमिकता में रखा गया है। साथ ही, बायोमेट्रिक हाजिरी, जीपीएस और एआई आधारित निगरानी से पारदर्शिता बढ़ाने का भरोसा भी दिया गया है।

हालांकि, फंडिंग पैटर्न में बदलाव को लेकर संसद में तीखी बहस हुई। अब तक मनरेगा में मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र उठाता था, लेकिन नए कानून के तहत इसे केंद्र प्रायोजित योजना बना दिया गया है। ज्यादातर राज्यों को अब 60:40 के अनुपात में खर्च उठाना होगा—यानी 60% केंद्र और 40% राज्य। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 रखा गया है, जबकि बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों का पूरा खर्च केंद्र देगा।

बिल में एक और अहम प्रावधान ‘एग्रीकल्चर पॉज’ का है। इसके तहत बुआई और कटाई के मौसम में राज्य सरकारें 60 दिनों तक इस योजना के काम रोक सकती हैं, ताकि खेती के लिए मजदूरों की कमी न हो। सरकार इसे खेती और मजदूरी के बीच संतुलन बताती है।

विपक्ष का आरोप है कि 125 दिन की गारंटी दिखाकर केंद्र सरकार वित्तीय बोझ राज्यों पर डाल रही है, जिससे कमजोर वित्तीय स्थिति वाले राज्यों पर दबाव बढ़ेगा। वहीं सरकार का कहना है कि बेहतर तकनीक, सख्त निगरानी और लक्षित कामों से हर रुपये का सही इस्तेमाल होगा और ग्रामीण इलाकों में वास्तविक बदलाव दिखेगा।

कुल मिलाकर, ‘जी राम जी बिल’ ग्रामीण भारत के लिए बड़ा नीतिगत मोड़ माना जा रहा है—जहां एक तरफ काम के दिन बढ़े हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्यों की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बढ़ गई है। अब नजर इस बात पर है कि जमीन पर यह बदलाव ग्रामीण मजदूर की जिंदगी में कितनी राहत लाता है।

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