राजनीति | अरिंदम बनर्जी | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 4 जून 2026
58 विधायकों ने बनाया अलग गुट, ऋतब्रत बनर्जी को चुना नेता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुली बगावत में बदलती दिखाई दे रही है। पार्टी से हाल ही में निष्कासित किए गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों ने अलग गुट बनाने का दावा किया है और उन्हें विधायक दल का नेता घोषित किया है।
बुधवार को बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से मुलाकात कर समर्थन पत्र सौंपा। इस नए गुट ने जावेद खान, संदीपन साहा और सिउली साहा को उपनेता तथा अखरुज्जमान को चीफ व्हिप नियुक्त करने की घोषणा की है।
दिलचस्प बात यह है कि बागी गुट ने अपने पत्र में ममता बनर्जी को अब भी पार्टी अध्यक्ष माना है, लेकिन सांसद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व और उनके द्वारा लिए जा रहे राजनीतिक फैसलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभर चुके हैं।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब सोमवार को अभिषेक बनर्जी के लेटरहेड पर विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव भेजा गया। विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने आरोप लगाया कि उस प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से किए गए थे। दोनों विधायकों ने इस संबंध में स्पीकर से शिकायत की थी। इसके बाद पार्टी ने दोनों को निष्कासित कर दिया।
राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यही घटना TMC में खुले विद्रोह की शुरुआत का कारण बनी। निष्कासन के बाद बागी विधायकों ने एकजुट होकर अलग शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया और अब 58 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं।
पार्टी में बढ़ते संकट के बीच ममता बनर्जी ने बड़ा संगठनात्मक फैसला लेते हुए राज्य की सभी पार्टी समितियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। सूत्रों के अनुसार पार्टी अब संगठन के व्यापक पुनर्गठन की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने और संभावित टूट को रोकने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
हालांकि बागी विधायक फिलहाल विधायक दल के भीतर अपनी अलग पहचान बना सकते हैं, लेकिन पार्टी और चुनाव चिह्न पर दावा करना उनके लिए आसान नहीं होगा। संविधान की दसवीं अनुसूची, दलबदल कानून, पार्टी संविधान और चुनाव आयोग के नियम इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी दल के दो-तिहाई निर्वाचित प्रतिनिधि अलग होते हैं तो उन्हें दलबदल कानून से राहत मिल सकती है, लेकिन पार्टी पर वास्तविक नियंत्रण का फैसला अंततः चुनाव आयोग करेगा।
पिछले कुछ दिनों से TMC में असंतोष के संकेत लगातार मिल रहे थे। ममता बनर्जी की बैठकों में बड़ी संख्या में विधायकों की अनुपस्थिति, सांसदों और विधायकों के इस्तीफे, अभिषेक बनर्जी पर कथित हमले तथा पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर बढ़ती नाराजगी ने संकट को और गहरा कर दिया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि यह बगावत और मजबूत होती है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में वही स्थिति बन सकती है, जैसी महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के विभाजन के दौरान देखने को मिली थी।
फिलहाल राज्य की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी इस संकट से पार्टी को बाहर निकाल पाएंगी या TMC एक बड़े विभाजन की ओर बढ़ रही है। आने वाले दिनों में विधानसभा, पार्टी संगठन और चुनाव आयोग के स्तर पर होने वाली गतिविधियां इस राजनीतिक संघर्ष की दिशा तय करेंगी।




