पटना 11 नवंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव अपने सबसे अहम पड़ाव से गुजर चुका है। आज दूसरे चरण की वोटिंग पूरी तरह संपन्न हो चुकी है, और इसके साथ ही अब पूरा राज्य नतीजों की ओर नजरें गड़ाए बैठा है। मतदान के खत्म होते ही इस चुनावी जंग की असली तस्वीर रैलियों के आंकड़ों और जनता के मूड के जरिए उभरने लगी है। चुनाव प्रचार भले थम गया था, लेकिन नेताओं की मेहनत का वजन अब ईवीएम में बंद फैसले के रूप में सामने आने वाला है।
इस चुनावी दौड़ में सबसे बड़ी चर्चा का विषय रहे विपक्ष के युवा चेहरे तेजस्वी यादव, जिन्होंने प्रचार के दौरान 155 रैलियां कर एक रिकॉर्ड कायम किया। उन्होंने युवा, बेरोज़गारी, महंगाई और बदलाव के मुद्दों को लगातार सबसे ऊंची आवाज़ में उठाया। उनकी सभाओं में उमड़ी भीड़ और उनका आक्रामक दौरा इस बात का संकेत रहा कि उन्होंने इस चुनाव को महागठबंधन के लिए एक निर्णायक लड़ाई की तरह लड़ा। चुनाव समाप्त होने के बाद अब राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज़ है कि क्या तेजस्वी की यह अभूतपूर्व मेहनत वोटों में तब्दील होगी।
उधर चिराग पासवान ने भी अपने दम पर 85 रैलियां कर बिहार में अपनी राजनीतिक उपस्थिति को मजबूती से जताया। ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के नारे के साथ चिराग ने युवा मतदाताओं में खासा आकर्षण पैदा किया। उनके प्रचार अभियान का रफ्तार और तेवर यह दिखाता है कि वह इस बार किसी भी कीमत पर गंभीर दावेदार के तौर पर खुद को स्थापित करना चाहते थे। मतदान खत्म होते ही उनके खेमे में भी उत्साह और उम्मीद की लहर देखी जा रही है।
सत्ता पक्ष की ओर से मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने कुल 67 रैलियां कीं। उन्होंने अपने लंबे शासनकाल की विकास योजनाओं, सामाजिक सुधारों और स्थिरता के वादे को केंद्र में रखा। हालांकि विपक्ष से दो गुना ज्यादा रैलियों का प्रहार झेलने के बाद अब यह देखना अहम होगा कि नितीश की शांत, संतुलित राजनीति ज़मीन पर कितना असर दिखा पाई है। नतीजों से पहले एनडीए के भीतर और बाहर दोनों से निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या नितीश जादू एक बार फिर चलेगा या जनता बदलाव चाहती है।
राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी ने प्रचार में पूरी ऊर्जा लगाई लेकिन रैलियों की संख्या में वह तेजस्वी यादव से बहुत पीछे रही। अमित शाह ने 33, राजनाथ सिंह ने 21, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 रैलियां कीं। मोदी की सभाएं, भीड़ और प्रभाव के नजरिये से अब भी बड़े राजनीतिक संदेश लेकर आती हैं, लेकिन इस बार संख्या में कमी यह संकेत देती है कि बीजेपी ने बिहार के चुनाव को स्थानीय नेतृत्व और राज्य इकाई पर अधिक छोड़ा। इस रणनीति के क्या परिणाम निकलते हैं, यह अब वोटिंग के बाद की सबसे बड़ी चर्चा बन चुका है।
उधर कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने भी 14 रैलियां कीं। उनके ‘वोट चोरी’ वाले हमलों ने पूरे चुनाव में एक नई आक्रामक धारा पैदा की। लेकिन प्रचार सीमित रहने के चलते अब यह सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस का कितना प्रभाव वोटों में बदल पाएगा।
कुल मिलाकर, मतदान पूरा हो चुका है और अब तस्वीर साफ़ है कि मेहनत के मैदान में बाज़ी तेजस्वी यादव के हाथ में रही। अकेले 155 रैलियां करके उन्होंने मोदी-शाह-नितीश और कई केंद्रीय नेताओं की संयुक्त संख्या को टक्कर दे दी। अब राज्यभर में चर्चा यही है कि क्या इस चुनाव का फैसला रैलियों की संख्या तय करेगी या मतदाताओं ने कोई अलग ही संदेश दिया है।
नतीजे चाहे जो हों, बिहार का चुनाव इस बार पूरी तरह मुद्दों, भीड़ और नेताओं की थकान को मात देती रफ्तार का चुनाव साबित हुआ है। अब सबकी निगाहें ईवीएम खुलने के उस दिन पर टिकी हैं, जब यह पता चलेगा कि किसके पसीने की सबसे ऊंची कीमत जनता ने चुकाई।





