मुंबई 5 अक्टूबर 2025
भारतीय क्रिकेट टीम के चयन पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान और चयन समिति के पूर्व चेयरमैन कृष्णमाचारी श्रीकांत ने संजू सैमसन को टीम से बाहर किए जाने पर कड़ी नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि भारतीय क्रिकेट के चयनकर्ता अब हर बार नए बहाने बनाते हैं — कभी कहते हैं कि “संतुलन बिगड़ जाएगा”, कभी “फॉर्म सही नहीं”, और कभी “नए खिलाड़ियों को मौका देना है” — लेकिन असलियत यह है कि संजू सैमसन के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। श्रीकांत ने कहा, “रोज़ बहाने बदलते रहते हैं। ये चयन अब किसी ठोस नीति पर नहीं, बल्कि किसी लॉटरी सिस्टम की तरह चलता है। किस दिन किसका नंबर लग जाए, वही टीम में आ जाता है।”
संजू सैमसन को एक बार फिर बाहर कर दिया गया, जबकि युवा विकेटकीपर ध्रुव जुरेल को शामिल किया गया है। यह निर्णय जैसे ही सार्वजनिक हुआ, क्रिकेट जगत में बहस छिड़ गई। श्रीकांत ने चयनकर्ताओं से सीधा सवाल किया — “अगर ध्रुव जुरेल को मौका मिल सकता है, तो संजू सैमसन क्यों नहीं? क्या उसके खिलाफ कोई साज़िश चल रही है? आखिर उसके पास अनुभव, मैच टेम्परामेंट और नेतृत्व क्षमता होने के बावजूद उसे बार-बार टीम से बाहर क्यों किया जा रहा है?” श्रीकांत की यह टिप्पणी केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि उस चयन नीति पर चोट है जो लगातार भ्रम और असंगति से ग्रस्त दिखाई दे रही है।
संजू सैमसन के आंकड़े खुद यह बयान देते हैं कि उन्हें टीम से बाहर रखना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं है। वनडे क्रिकेट में उनका औसत 55 से ऊपर और स्ट्राइक रेट 120 के करीब है। वह विकेटकीपिंग में भरोसेमंद हैं और मध्यक्रम में किसी भी परिस्थिति में खेल को स्थिर कर सकते हैं। आईपीएल में उनकी बल्लेबाजी की निरंतरता ने उन्हें भारत के सबसे भरोसेमंद सीमित ओवरों के बल्लेबाजों में शामिल किया है। इसके बावजूद उन्हें बार-बार “टीम एक्सपेरिमेंट” या “रोटेशन पॉलिसी” का बहाना देकर दरकिनार कर दिया जाता है। यही कारण है कि आज #JusticeForSanjuSamson सोशल मीडिया पर देशभर में ट्रेंड कर रहा है।
श्रीकांत ने अपने बयान में भारतीय चयन समिति की कार्यशैली पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहा कि, “भारत में चयन अब लॉजिक से नहीं, नेटवर्क से होता है। जो सिस्टम को खुश रखेगा, वही टिकेगा। और जो सवाल पूछेगा, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि, “जब कोई खिलाड़ी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा हो और फिर भी उसे मौके से वंचित रखा जाए, तो यह केवल एक खिलाड़ी के साथ नहीं, बल्कि पूरे देश के क्रिकेट प्रशंसकों के साथ अन्याय है।”
ध्रुव जुरेल के चयन पर भी श्रीकांत ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “ध्रुव एक उभरता हुआ खिलाड़ी है, लेकिन क्या किसी भी अनुभवहीन खिलाड़ी को इतने बड़े टूर्नामेंट में सीधे भेज देना न्यायसंगत है? जब आपके पास संजू सैमसन जैसा परिपक्व खिलाड़ी हो, जो पहले से इंटरनेशनल अनुभव रखता हो, तो आखिर उसे नज़रअंदाज़ करने का कारण क्या है?” श्रीकांत का यह बयान देशभर के फैंस के साथ मेल खाता है, क्योंकि यही सवाल आम क्रिकेट दर्शक भी पूछ रहे हैं — आखिर कब तक प्रतिभा को राजनीति और गुटबाजी के नीचे दबाया जाएगा?
संजू सैमसन की कहानी भारतीय क्रिकेट की एक विडंबना बन चुकी है। जैसे अतीत में अंबाती रायुडू, मनोज तिवारी या वसीम जाफर जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को दरकिनार किया गया था, वैसे ही सैमसन भी “सिस्टम की अनिश्चितता” का शिकार बनते जा रहे हैं। हर सीरीज के पहले यह कहा जाता है कि “उन्हें अगली बार मौका मिलेगा”, लेकिन हर नई टीम घोषणा के साथ यह वादा हवा हो जाता है। यह एक ऐसे दौर का संकेत है जहाँ क्रिकेट केवल प्रदर्शन का खेल नहीं रहा, बल्कि “सेलेक्शन की राजनीति” का अखाड़ा बन गया है।
पूर्व खिलाड़ियों और विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड और चयनकर्ताओं के बीच स्पष्ट संवाद की कमी ने भी इस स्थिति को और खराब किया है। खिलाड़ी को यह पता ही नहीं होता कि उसे क्यों बाहर किया गया, या कब तक वह बेंच पर रहेगा। रवि शास्त्री ने कुछ समय पहले कहा था कि “हर खिलाड़ी को यह अधिकार होना चाहिए कि उसे बताया जाए कि उसे क्यों ड्रॉप किया गया। यह पारदर्शिता भारतीय टीम की आत्मा को मज़बूत बनाएगी।” लेकिन ऐसा होता नहीं। आज भी कई खिलाड़ी महीनों इंतज़ार करते रहते हैं कि शायद उनका नाम अगले टूर्नामेंट में आए, लेकिन चयन प्रक्रिया का यह “अनिश्चित गेम” उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देता है।
संजू सैमसन के पक्ष में श्रीकांत का यह गुस्सा दरअसल उस क्रिकेट संरचना पर सवाल उठाता है जहाँ प्रदर्शन की तुलना में “पॉलिटिक्स” ज़्यादा असर रखती है। सैमसन न तो विवादित खिलाड़ी हैं, न ही आत्म-प्रचार करने वाले। वे मैदान में खेल से जवाब देते हैं। लेकिन आज भारतीय क्रिकेट का सिस्टम ऐसा बन गया है कि जो चुप है, वही सबसे पहले बाहर होता है। जो ज़्यादा बोलता है, वही सुर्खियों में रहता है। यही असमानता आज देश के लाखों क्रिकेट प्रेमियों को खटक रही है।
भारतीय क्रिकेट में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन न्यायपूर्ण चयन की कमी लगातार इस खेल की साख को प्रभावित कर रही है। सैमसन के साथ जो हो रहा है, वह केवल एक खिलाड़ी का दर्द नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जो खुद के बनाए मापदंडों पर भी खरी नहीं उतर रही। अगर यह सिलसिला चलता रहा तो यह खेल अपने नैतिक मूल्य खो देगा। जब मेहनत और प्रदर्शन चयन का मापदंड नहीं रह जाता, तब खिलाड़ी नहीं, सिस्टम हार जाता है।
संजू सैमसन की कहानी हमें यही सिखाती है — कि क्रिकेट केवल मैदान पर नहीं, चयन टेबल पर भी खेला जाता है।अगर वहां पारदर्शिता नहीं होगी, तो मैदान पर मेहनत करने वाला हर खिलाड़ी एक दिन “अनदेखा” कहलाएगा। श्रीकांत की यह नाराज़गी वाजिब है, क्योंकि उन्होंने वही कहा है जो हर क्रिकेट प्रेमी सोचता है — कि अब समय आ गया है जब चयन का बहाना नहीं, न्याय का पैमाना तय होना चाहिए।




