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दक्षिण का सिनेमा, उत्तर की चेतावनी — ‘कांतारा चैप्टर 1’ ने बॉलीवुड को दिखाया आईना

मुंबई 5 अक्टूबर 2025

भारत का सिनेमा आज एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कभी देशभर की फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधि माना जाने वाला बॉलीवुड आज उस ऊंचाई से नीचे फिसलता दिखाई दे रहा है, जहां पहले साउथ की फिल्में “रीमेक सामग्री” के रूप में देखी जाती थीं। लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। दक्षिण का सिनेमा भारतीयता की आत्मा को अपने साथ लेकर आगे बढ़ रहा है, और बॉलीवुड उसी दक्षिण के कदमों के निशान पर अपनी राह तलाश रहा है। ऋषभ शेट्टी की फिल्म ‘कांतारा चैप्टर 1’ इसका ताज़ा प्रमाण है। यह फिल्म न केवल ₹160 करोड़ से अधिक की कमाई कर चुकी है, बल्कि उसने सिनेमा प्रेमियों को याद दिलाया है कि सच्चा मनोरंजन वहीं है जो अपनी मिट्टी से जुड़ा हो, अपने लोक से संवाद करता हो और अपने दर्शक की आत्मा को छू जाए।

‘कांतारा’ की सफलता केवल एक व्यावसायिक विजय नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की दिशा में एक वैचारिक सुधार भी है। इस फिल्म में तकनीकी दक्षता है, लेकिन उससे कहीं अधिक एक सजीव आत्मा है। लोककथाओं, आदिवासी संस्कृति, पर्यावरण, और देव-आस्था का जो समन्वय ऋषभ शेट्टी ने परदे पर उतारा है, वह किसी विश्वविद्यालय के शोध से कम नहीं। फिल्म का हर दृश्य उस भारत की झलक दिखाता है, जो आज भी अपने देवी-देवताओं और प्रकृति को एक ही पवित्रता से पूजता है। यह फिल्म दर्शक को याद दिलाती है कि सिनेमा का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति का दर्पण बनना भी है।

इसके उलट, हिंदी सिनेमा अब भी ग्लैमर और प्रचार के शोर में अपनी पहचान गँवा रहा है। वरुण धवन और जाह्नवी कपूर जैसी फिल्मों का हाल बताता है कि दर्शक अब केवल चेहरों पर नहीं, कहानियों पर भरोसा करता है। ‘सनी संस्कारी की तुलसी कुमारी’ जैसी फिल्मों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नकली चमक और कमजोर कहानी के दम पर आज के जागरूक दर्शक को धोखा देना नामुमकिन है। बॉक्स ऑफिस की दौड़ में हिंदी फिल्में अब साउथ की फिल्में ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सिनेमा से भी पिछड़ रही हैं।

सवाल यह उठता है कि आखिर दक्षिण का सिनेमा इतना आगे कैसे निकल गया और बॉलीवुड पीछे क्यों रह गया? इसका पहला उत्तर है — मौलिकता और सच्चाई। दक्षिण के फिल्मकार अपनी कहानियों में जीवन की गंध रखते हैं। वहाँ की फिल्मों में समाज, संघर्ष, परिवार और नैतिकता का रिश्ता बरकरार रहता है। बॉलीवुड की फिल्मों में, इसके विपरीत, कहानी अब केवल स्टारडम के इर्द-गिर्द घूमती है। साउथ का हीरो समाज के लिए लड़ता है, जबकि बॉलीवुड का हीरो अक्सर अपने स्टाइल और संवाद के लिए लड़ा करता है। ऋषभ शेट्टी, धनुष, विजय सेतुपति, अल्लू अर्जुन या फहद फासिल जैसे कलाकार अपने किरदारों में समाज की चेतना को जीवित रखते हैं। वे केवल “स्टार” नहीं, बल्कि “प्रतीक” बन चुके हैं — एक संघर्षशील भारत के, जो अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

दूसरा कारण है रीमेक संस्कृति का विस्तार। पिछले दो दशकों में बॉलीवुड की जिन फिल्मों ने बड़ी सफलता हासिल की, उनमें से अधिकांश दक्षिण भारत से आई कहानियों की नकल या रूपांतरण थीं। सलमान खान की ‘वांटेड’ तेलुगु फिल्म ‘पोकिरी’ की रीमेक थी। आमिर खान की ‘गजनी’ तमिल संस्करण से ली गई थी। अजय देवगन की ‘दृश्यम’ मलयालम फिल्म का हिंदी रूपांतरण थी। अक्षय कुमार की ‘रोडी राठौर’ तेलुगु फिल्म ‘विक्रमकुडु’ पर आधारित थी, जबकि उनकी ‘स्पेशल 26’ भी तमिल-मलयालम घटनाओं से प्रेरित कहानी थी। यहां तक कि शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘जवान’ भी तमिल सिनेमा की भाषा और लहजे में ढली रचनाएं हैं।

यानी बॉलीवुड जिन फिल्मों को “अपनी” कहकर गर्व करता रहा, उनकी जड़ें दक्षिण भारत की सृजनशीलता में थीं। यह स्थिति दर्शाती है कि हिंदी सिनेमा का आत्मविश्वास कमजोर हुआ है और उसने कल्पनाशक्ति का स्थान अनुकरण को दे दिया है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है तकनीक और परंपरा का संतुलन। दक्षिण की फिल्मों ने आधुनिक तकनीकी उत्कृष्टता को अपनाया, पर अपनी परंपरा को नहीं छोड़ा। ‘कांतारा’ इसका जीता-जागता प्रमाण है — कैमरे का हर फ्रेम प्रकृति और आध्यात्मिकता के संवाद में रचा गया है। वहीं बॉलीवुड तकनीक को ही कहानी मान बैठा है। सेट भव्य हैं, लोकेशन विदेशी हैं, लेकिन आत्मा गायब है। यह वही खोखलापन है जिसने सिनेमा को “उद्योग” बना दिया है, कला नहीं रहने दिया।

अब दर्शक बदल चुका है। सोशल मीडिया, ओटीटी और विश्व सिनेमा के संपर्क में आने के बाद भारतीय दर्शक अब नासमझ नहीं रहा। वह जानता है कि कौन उसे भावनाओं से जोड़ रहा है और कौन केवल प्रचार से। यही कारण है कि कांतारा, RRR, KGF और पुष्पा जैसी फिल्में दर्शकों के दिलों पर राज कर रही हैं, जबकि करोड़ों के प्रमोशन के बावजूद बॉलीवुड की फिल्में खाली सीटों के सामने ढह रही हैं।

अब वक्त आ गया है कि बॉलीवुड अपने अतीत के गौरव और वर्तमान की विफलताओं के बीच से सीख ले। उसे समझना होगा कि भारत के सिनेमा की ताकत ग्लैमर या गॉसिप में नहीं, बल्कि उस विविध संस्कृति में है जो देश के हर कोने में सांस लेती है। मुंबई की तकनीक, चेन्नई की मौलिकता, हैदराबाद की ऊर्जा और केरल की संवेदना — जब ये चार धाराएँ मिलेंगी, तभी भारतीय सिनेमा सचमुच “राष्ट्र का सिनेमा” कहलाएगा।

‘कांतारा चैप्टर 1’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक चेतावनी है — बॉलीवुड के लिए और पूरे सिनेमा जगत के लिए। यह फिल्म कहती है कि दर्शक अब वही देखना चाहता है जिसमें उसका सच झलके, उसका समाज बोले, और उसकी मिट्टी की खुशबू हो। सिनेमा तभी अमर होता है जब वह अपने समय और अपनी भूमि के प्रति ईमानदार हो। जो सिनेमा अपनी जड़ों को भूल जाता है, वह अगली शुक्रवार की शाम तक मिट जाता है। “जिस फिल्म में अपनी मिट्टी की खुशबू हो, वही अमर होती है; बाकी सब बस शोर है — जो अगले शुक्रवार तक ख़ामोश हो जाता है।”

 

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