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मोदी-ट्रंप की दोस्ती के दावों के बीच अमेरिका में लॉबिंग पर ₹17 करोड़ खर्च!

ट्रंप के करीबी जेसन मिलर की कंपनी को हर महीने 1.4 करोड़ रुपये देती रही भारतीय सरकार; इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में खुलासा, व्हाइट हाउस के शीर्ष अधिकारियों से बातचीत कराने के लिए करार

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/वाशिंगटन | 7 नवंबर 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती, गले मिलने की तस्वीरों और ‘Howdy Modi’ जैसे आयोजनों को भारत-अमेरिका के मजबूत रिश्तों का प्रतीक बताकर पेश किया जाता रहा है। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट ने इस दोस्ती के पीछे अमेरिकी सत्ता के गलियारों तक पहुंच बनाने के लिए भारत सरकार की ओर से किए गए भारी खर्च पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की 7 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी जेसन मिलर की लॉबिंग कंपनी SHW Partners LLC को हर महीने 1.5 लाख डॉलर यानी लगभग 1.4 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह करार अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के दो दिन बाद 24 अप्रैल को किया गया था। कंपनी को एक साल के लिए कुल 18 लाख डॉलर यानी लगभग 17 करोड़ रुपये दिए जाने थे। अप्रैल 2026 में इस करार को एक और साल के लिए बढ़ाया गया था। The Indian Express +1

व्हाइट हाउस तक पहुंच बनाने के लिए हर महीने डेढ़ लाख डॉलर

रिपोर्ट के मुताबिक, SHW Partners का काम अमेरिकी सरकार, कांग्रेस, विभिन्न सरकारी विभागों और दूसरे प्रभावशाली संस्थानों के सामने भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर रणनीतिक सलाह देना, संपर्क स्थापित करना और सरकारी अधिकारियों के साथ बातचीत की व्यवस्था करना था।

अमेरिकी कानून Foreign Agents Registration Act (FARA) के तहत दाखिल दस्तावेजों में कंपनी ने मई और जून 2026 के दौरान भारतीय पक्ष और ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच आठ फोन कॉल आयोजित कराने का उल्लेख किया है।

इन संपर्कों में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीयर, उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल नीडहम और व्हाइट हाउस के दूसरे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। इन बातचीत का विषय भारत-अमेरिका संबंध बताया गया। India News – The Indian Express

जेसन मिलर के सरकार में जाते ही खत्म हुआ करार

इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू जेसन मिलर की अपनी राजनीतिक भूमिका है। मिलर लंबे समय से डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी और उनके चुनावी अभियानों के प्रमुख रणनीतिकारों में रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 23 जून 2026 को भारतीय दूतावास और SHW Partners के बीच करार समाप्त कर दिया गया। यह घटनाक्रम उस समय हुआ जब जेसन मिलर ट्रंप प्रशासन में ‘स्पेशल गवर्नमेंट एम्प्लॉयी’ के रूप में शामिल हो गए।

यानी जिस व्यक्ति की कंपनी को भारत सरकार अमेरिकी प्रशासन तक पहुंच बनाने के लिए भुगतान कर रही थी, वही व्यक्ति बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रशासन का हिस्सा बन गया। इस घटनाक्रम ने हितों के टकराव और भारत की लॉबिंग रणनीति को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। India News – The Indian Express +1

दूसरी कंपनी को भी हर महीने 75 हजार डॉलर

भारतीय दूतावास ने केवल जेसन मिलर की कंपनी को ही नहीं, बल्कि ट्रंप के चुनावी अभियान और ट्रांजिशन टीम से जुड़े लोगों की दूसरी लॉबिंग कंपनी Mercury Public Affairs को भी काम सौंपा था।

इस कंपनी को हर महीने 75,000 डॉलर यानी लगभग 67 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इसकी टीम में ट्रंप के ट्रांजिशन अभियान के संचार निदेशक रहे ब्रायन लांजा शामिल थे। ट्रंप की मौजूदा चीफ ऑफ स्टाफ सुसी वाइल्स भी पहले इस कंपनी से लॉबिस्ट के तौर पर जुड़ी रही थीं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, Mercury Public Affairs ने अपने काम के विवरण में ट्रंप की उस सोशल मीडिया पोस्ट को भी शामिल किया, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को भारत का सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाला प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी थी। India News – The Indian Express +1

‘विश्वगुरु’ की छवि और अमेरिकी लॉबिंग का सवाल

यह खुलासा कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। भारत की विदेश नीति में प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति, ट्रंप के साथ उनकी नजदीकी और दोनों नेताओं की सार्वजनिक मित्रता को लगातार महत्व दिया गया। लेकिन अगर दोनों नेताओं के बीच इतने मजबूत व्यक्तिगत संबंध थे, तो भारतीय दूतावास को अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी सहयोगियों की लॉबिंग कंपनियों को करोड़ों रुपये देकर संपर्क स्थापित कराने की जरूरत क्यों पड़ी?

क्या भारत की पारंपरिक कूटनीतिक व्यवस्था अमेरिकी प्रशासन तक प्रभावी पहुंच बनाने में पर्याप्त साबित नहीं हो रही थी? क्या ट्रंप के करीबी लोगों तक पहुंच बनाने के लिए निजी लॉबिंग कंपनियों पर निर्भरता बढ़ गई थी? और क्या सरकार को देश को यह बताना चाहिए कि इन करोड़ों रुपये के खर्च से भारत को वास्तविक कूटनीतिक लाभ क्या मिला?

यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि अमेरिका में विदेशी सरकारों की ओर से लॉबिंग कंपनियों को नियुक्त करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। वहां FARA कानून के तहत ऐसी गतिविधियों और भुगतान का सार्वजनिक खुलासा करना अनिवार्य है। लेकिन इस मामले में खर्च की गई रकम, लॉबिंग कंपनियों के राजनीतिक संबंध और उनके जरिए कराई गई बातचीत पर सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल जरूर उठता है।

मोदी सरकार से जवाब मांगने का समय

पहलगाम हमले के ठीक बाद जेसन मिलर की कंपनी को नियुक्त करना, फिर उसी कंपनी का करार बढ़ाना और बाद में मिलर का ट्रंप प्रशासन में शामिल हो जाना—ये सभी घटनाएं भारत की अमेरिका नीति पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी को देश को बताना चाहिए कि भारत की ओर से अमेरिकी लॉबिंग पर लगभग 17 करोड़ रुपये सालाना खर्च करने का फैसला किसने लिया? क्या विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास के पारंपरिक कूटनीतिक माध्यम पर्याप्त नहीं थे? ट्रंप के करीबी सहयोगियों की कंपनियों को करोड़ों रुपये देने के बाद भारत को क्या हासिल हुआ?

दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा केवल तस्वीरों, गले मिलने और बड़े-बड़े आयोजनों से तय नहीं होती। असली कसौटी यह है कि कठिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को कितनी मजबूती से आगे बढ़ा पाता है।

अब सवाल यही है—अगर मोदी और ट्रंप की दोस्ती इतनी गहरी थी, तो वाशिंगटन में भारतीय पक्ष की आवाज पहुंचाने के लिए हर महीने डेढ़ लाख डॉलर खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ी?

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