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अमेरिका से आया संदेश: नाम और मजहब नहीं, जनता के मुद्दे चुनाव जिताते हैं

अब्दुल एल-सयद मिशिगन से अमेरिकी सीनेट पहुंचे, बने पहले मुस्लिम सीनेटर; महंगाई, पेट्रोल, राशन और इलाज के खर्च को बनाया चुनावी मुद्दा। जोहरान ममदानी की जीत ने भी दिखाया कि व्यापक जनसमर्थन से धार्मिक पहचान की दीवारें पार की जा सकती हैं।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 नवंबर 2026

अमेरिका से आई एक चुनावी खबर ने भारत की राजनीति में धर्म, पहचान और चुनावी ध्रुवीकरण को लेकर चल रही बहस को एक नया संदर्भ दे दिया है। मिशिगन से डेमोक्रेट उम्मीदवार डॉ. अब्दुलरहमान मोहम्मद एल-सयद ने अमेरिकी सीनेट का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया है। वह अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बनने जा रहे हैं। उनकी जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि चुनाव प्रचार के दौरान उनके नाम और धार्मिक पहचान को मुद्दा बनाने की कोशिशें हुईं, लेकिन उन्होंने मतदाताओं के सामने अपनी बात रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित रखी—महंगाई, पेट्रोल, किराना, स्वास्थ्य सेवाएं और आम परिवारों की आर्थिक मुश्किलें।

जीत के बाद एल-सयद का संदेश बेहद स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि उनका नाम और उनका धर्म इस बात की वजह नहीं हैं कि लोगों के लिए पेट्रोल खरीदना महंगा हो गया है, किराने का सामान खरीदना मुश्किल हो गया है या डॉक्टर को दिखाना उनकी पहुंच से बाहर हो रहा है। यह टिप्पणी केवल उनके चुनाव की प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उस राजनीति पर भी सवाल थी जिसमें नागरिकों की वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाकर उनकी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया जाता है। Detroit, MI Patch +2

चुनाव में धर्म से ज्यादा अहम रहे जनता के सवाल

एल-सयद के चुनाव अभियान का मुख्य जोर आम लोगों की आर्थिक परेशानियों पर था। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को आम नागरिकों की पहुंच में लाने, परिवारों पर बढ़ते खर्च का बोझ कम करने और राजनीति में बड़े कॉरपोरेट चंदे के प्रभाव को सीमित करने जैसे मुद्दे उठाए। उनके सामने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स थे, जिन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन खेमे का समर्थन हासिल था। प्रचार के दौरान एल-सयद की धार्मिक पहचान और उनके नाम को लेकर भी हमले किए गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक अपील को केवल मुस्लिम मतदाताओं तक सीमित नहीं रखा।

एसोसिएटेड प्रेस के चुनावी सर्वेक्षण के मुताबिक, मिशिगन में मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं का लगभग दो प्रतिशत थे और मुस्लिम मतदाताओं में करीब 90 प्रतिशत ने एल-सयद का समर्थन किया। यह आंकड़ा बताता है कि मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन उनके लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन उनकी जीत को केवल मुस्लिम वोटों के आधार पर समझना सही नहीं होगा। उनकी चुनावी सफलता के पीछे व्यापक मतदाता गठबंधन और महंगाई तथा स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों पर केंद्रित अभियान की भी भूमिका रही। Africanews +2

नेहरू से बाबर तक दोषारोपण की राजनीति पर सवाल

भारत में भी महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, सरकारी सेवाओं की स्थिति और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी और संघ इन सवालों पर जवाबदेही तय करने के बजाय बहस को धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक विवादों की ओर मोड़ते हैं। उनके मुताबिक, कभी नेहरू तो कभी मुगल शासकों का हवाला देकर वर्तमान सरकार की नीतियों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से ध्यान हटाने की कोशिश होती है।

यहां एक बुनियादी सवाल है: पेट्रोल की कीमत, रसोई का बजट, युवाओं को रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और इलाज का खर्च किसी नागरिक के धर्म से तय नहीं होता। इन सवालों का जवाब सरकार की नीतियों, आर्थिक परिस्थितियों और प्रशासनिक फैसलों में तलाशना चाहिए। किसी भी सरकार को उसके कामकाज के आधार पर जवाबदेह ठहराना लोकतंत्र का सामान्य सिद्धांत है।

भारत के बहुसंख्यक मतदाताओं के लिए भी एल-सयद की जीत से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक निकलता है। रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान किसी दूसरे धर्म या समुदाय को दोषी ठहराने से नहीं होगा। महंगाई, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित संस्थाओं की है। मतदाताओं को यह देखना होगा कि सत्ता में बैठे लोग इन समस्याओं पर क्या कर रहे हैं और उनके पास क्या ठोस जवाब हैं।

जोहरान ममदानी की जीत ने भी दिया ऐसा ही संदेश

अमेरिका में धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर व्यापक समर्थन हासिल करने का यह पहला उदाहरण नहीं है। नवंबर 2025 में जोहरान ममदानी ने न्यूयॉर्क के मेयर का चुनाव जीतकर इतिहास रचा था। वह शहर के पहले मुस्लिम और दक्षिण एशियाई मूल के मेयर बने। उनके चुनाव अभियान में किराये का बोझ, महंगाई, सार्वजनिक परिवहन, बच्चों की देखभाल और आम नागरिकों की जीवन-यापन संबंधी परेशानियां प्रमुख मुद्दे थे।

ममदानी की जीत ने दिखाया कि किसी उम्मीदवार की धार्मिक पहचान के बावजूद मतदाता उसके कार्यक्रम, नीतियों और स्थानीय समस्याओं पर उसके रुख के आधार पर समर्थन दे सकते हैं। एल-सयद की सीनेट जीत और ममदानी की मेयर पद तक पहुंच इसी व्यापक राजनीतिक अनुभव के दो अलग-अलग उदाहरण हैं। WNYC +2

मुस्लिम राजनीति के लिए भी आत्ममंथन का समय

इस घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश भारत के अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर मुस्लिम समाज के लिए है। लोकतंत्र में किसी समुदाय की राजनीतिक ताकत केवल उसकी आबादी या अलग राजनीतिक पहचान से तय नहीं होती। उसकी वास्तविक ताकत व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने, दूसरे समुदायों के साथ भरोसे के रिश्ते कायम करने और साझा मुद्दों पर राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने से बनती है।

मिशिगन में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग दो प्रतिशत होने के बावजूद एल-सयद का सीनेट तक पहुंचना इस बात का उदाहरण है कि किसी उम्मीदवार की सफलता के लिए केवल अपने धार्मिक समुदाय के वोट पर्याप्त नहीं होते। उसे व्यापक मतदाता समूह का विश्वास भी हासिल करना पड़ता है। यही बात भारत की राजनीति पर भी लागू होती है।

मुस्लिम समाज के सामने यह सवाल गंभीरता से विचार करने का है कि क्या उसकी राजनीतिक रणनीति केवल अलग पहचान और अलग प्रतिनिधित्व के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी या फिर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, संविधान, सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों जैसे साझा मुद्दों पर दूसरे समुदायों के साथ मिलकर राजनीतिक भागीदारी बढ़ाएगी?

80-20 की राजनीति किसके हित में?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति में 80-20 का चुनावी संदर्भ पहले भी चर्चा में रहा है। इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति को लेकर आलोचकों का आरोप है कि उनकी रणनीति कई बार मुस्लिम मतदाताओं को अलग राजनीतिक धुरी पर संगठित करने पर केंद्रित दिखाई देती है। इन दोनों राजनीतिक दृष्टिकोणों को एक जैसा घोषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि धार्मिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने से किसे फायदा और किसे नुकसान होता है।

अगर किसी समुदाय को लगातार अलग राजनीतिक खांचे में सीमित कर दिया जाए, तो उसके लिए व्यापक राजनीतिक गठबंधन बनाना कठिन हो सकता है। दूसरी ओर, यदि वह साझा नागरिक मुद्दों पर दूसरे समुदायों के साथ खड़ा होता है, तो उसकी राजनीतिक भागीदारी और प्रभाव का दायरा बढ़ सकता है।

इसलिए मुस्लिम समाज के सामने चुनौती केवल अपने प्रतिनिधि चुनने की नहीं, बल्कि ऐसी राजनीति में सक्रिय भागीदारी की है जो संविधान, समान अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देती हो। मुख्यधारा की राजनीतिक प्रक्रियाओं में प्रभावी भागीदारी का अर्थ अपनी पहचान छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ व्यापक लोकतांत्रिक गठबंधन बनाना है।

धर्म नहीं, नीतियां और जवाबदेही बनें चुनाव का आधार

अब्दुल एल-सयद की जीत का संदेश भारत के लिए भी प्रासंगिक है। किसी व्यक्ति का नाम, धर्म या खानपान उसके पेट्रोल, राशन, रोजगार और इलाज की कीमत तय नहीं करता। इन सवालों का संबंध आर्थिक नीतियों, सरकारी फैसलों और प्रशासनिक जवाबदेही से है।

बहुसंख्यक समाज के लिए संदेश है कि अपनी वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सवाल पूछे जाएं, न कि किसी दूसरे समुदाय को जिम्मेदार ठहराया जाए। अल्पसंख्यक समाज के लिए संदेश है कि लोकतंत्र में अलग-थलग पड़ने के बजाय साझा मुद्दों पर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक साझेदारी बनाई जाए।

अमेरिका में अब्दुल एल-सयद और जोहरान ममदानी की चुनावी सफलताएं यह दिखाती हैं कि धार्मिक पहचान किसी नागरिक की राजनीतिक भागीदारी की सीमा तय नहीं करती। अंततः मतदाता उन मुद्दों पर भी फैसला करते हैं जो उनके घर के बजट, बच्चों के भविष्य, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं।

लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि नागरिकों की पहचान अलग-अलग हो सकती है, लेकिन उनकी समस्याएं और बेहतर जीवन की आकांक्षाएं साझा हो सकती हैं। राजनीति को इन्हीं साझा सवालों का जवाब देना चाहिए।

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