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ज्ञानेश कुमार की पुरानी फाइल फिर खुली! 2 करोड़ की रिश्वत के आरोप, मलेशियाई इंजीनियर की मौत और अब जांच का शिकंजा

मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ केरल सरकार ने दिए प्रारंभिक जांच के आदेश; 2006 में PWD सचिव रहते हुए बिल पास कराने के बदले रिश्वत मांगने का आरोप, शिकायतकर्ता ने पेश किए नए दावे—अब पुराने मामले की पूरी जांच जरूरी

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | तिरुवनंतपुरम/नई दिल्ली | 6 नवंबर 2026

देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में हैं। जिस अधिकारी पर आज देश की चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, उसके केरल में प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़ा करीब दो दशक पुराना रिश्वत का मामला फिर सामने आ गया है। केरल की कांग्रेस सरकार ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 2006 के एक सड़क निर्माण प्रोजेक्ट में कथित रिश्वत मांगने की शिकायत पर सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (VACB) को प्रारंभिक जांच के निर्देश दिए हैं।

शिकायत में आरोप है कि विश्व बैंक से वित्तपोषित केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के तहत ठेकेदारों के लगभग 14 से 17 करोड़ रुपये के बिलों का भुगतान कराने के लिए दो करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी गई थी। उस समय ज्ञानेश कुमार केरल के लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव और परियोजना निदेशक थे। इस मामले का एक और गंभीर पहलू मलेशियाई इंजीनियर ली सी बीन की आत्महत्या है, जिनकी मौत के बाद रिश्वत और भुगतान में बाधा से जुड़े आरोप सामने आए थे।

दो करोड़ की रिश्वत, 14 करोड़ के बिल और एक इंजीनियर की मौत

मामला 2006 का है। केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के तहत सड़क निर्माण का काम Indo-Malaysian संयुक्त उपक्रम PATI-BEL को दिया गया था। मलेशियाई इंजीनियर ली सी बीन इस परियोजना के मुख्य प्रोजेक्ट मैनेजर थे। परियोजना के बिलों के भुगतान में देरी को लेकर विवाद पैदा हुआ। इसी दौरान आरोप सामने आए कि काम के बिल पास कराने के लिए अधिकारियों ने ठेकेदारों से रिश्वत मांगी थी।

नवंबर 2006 में ली सी बीन मलेशिया में मृत पाए गए। उनकी मौत आत्महत्या के रूप में दर्ज हुई। उस समय यह खबर सामने आई कि उन्होंने एक नोट छोड़ा था, जिसमें परियोजना में भ्रष्टाचार और रिश्वत की मांग का जिक्र था। ज्ञानेश कुमार का नाम भी इस विवाद से जुड़ा। हालांकि, कथित सुसाइड नोट सार्वजनिक नहीं हुआ है। ली की मौत के लगभग एक महीने बाद तत्कालीन केरल सरकार ने ज्ञानेश कुमार को PWD सचिव के पद से हटा दिया और मामले की जांच शुरू कराई।

नए शिकायतकर्ता ने खोली पुरानी कहानी की परत

अब इस मामले में सामने आए नए शिकायतकर्ता साजन वी.ओ. ने दावा किया है कि वह उस समय PATI-BEL परियोजना के लिए निर्माण सामग्री की आपूर्ति करता था और ली सी बीन के संपर्क में था। उसके मुताबिक, परियोजना के चार बिलों के लगभग 14 करोड़ रुपये भुगतान के लिए लंबित थे। ली ने उसे बताया था कि तत्कालीन PWD सचिव ज्ञानेश कुमार ने भुगतान जारी कराने के बदले दो करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी।

साजन का दावा है कि PATI-BEL कंपनी रिश्वत देने को तैयार नहीं थी और भुगतान अटकने से स्थानीय ठेकेदारों तथा आपूर्तिकर्ताओं पर भी आर्थिक दबाव बढ़ रहा था। उसने यह भी कहा है कि वह जांच एजेंसी को परियोजना से जुड़े लोगों, दस्तावेजों और ली के परिवार के सदस्यों तक पहुंचने में मदद कर सकता है।

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है: साजन ने खुद कथित सुसाइड नोट नहीं देखा था। उसका दावा ली से हुई बातचीत और कंपनी के कर्मचारियों से मिली जानकारी पर आधारित है। इसलिए जांच एजेंसी को इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि करनी होगी। लेकिन शिकायतकर्ता की ओर से गवाह और दस्तावेज उपलब्ध कराने की पेशकश के बाद जांच को गंभीरता से आगे बढ़ाना और भी जरूरी हो गया है।

पहली जांच में क्या हुआ था? किसने बचाई पुरानी फाइल?

इस मामले की सबसे अहम कड़ी 2006 में शुरू हुई सतर्कता जांच है। उस समय केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट में बिलों के भुगतान और रिश्वत मांगने की शिकायतों की जांच हुई थी। लेकिन आरोपों की पुष्टि नहीं होने की बात कहकर आगे कार्रवाई की सिफारिश नहीं की गई।

ज्ञानेश कुमार का नाम 2003 से 2006 के बीच बिना टेंडर के 76 कार्य आवंटित किए जाने से जुड़ी एक अलग सतर्कता जांच में भी आया था। उस जांच में भी अनियमितताएं प्रमाणित नहीं हो सकीं और कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। 2012 में आठ मामलों को अदालत में ‘मिस्टेक ऑफ फैक्ट’ रिपोर्ट के साथ रखा गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था।

लेकिन अब सवाल यह है कि क्या 2006 की जांच में सभी संबंधित ठेकेदारों, आपूर्तिकर्ताओं और परियोजना से जुड़े लोगों के बयान दर्ज किए गए थे? क्या ली सी बीन के परिवार से संपर्क किया गया था? क्या भुगतान रोकने और कथित रिश्वत मांगने से जुड़े दस्तावेजों की पूरी पड़ताल हुई थी? नए शिकायतकर्ता का दावा है कि उससे पहले कभी पूछताछ ही नहीं की गई। अगर ऐसा है, तो पुरानी जांच की प्रक्रिया की भी जांच होनी चाहिए।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त की कुर्सी जवाबदेही से बड़ी नहीं

आज ज्ञानेश कुमार देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं। यह वही संवैधानिक पद है, जिसके अधीन चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं। SIR को लेकर विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहा है। ऐसे समय में उनके पुराने प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़ी रिश्वत की शिकायत का दोबारा सामने आना मामले को और संवेदनशील बनाता है।

यह कोई सामान्य प्रशासनिक विवाद नहीं है। शिकायत में दो करोड़ रुपये की कथित रिश्वत, करोड़ों रुपये के लंबित भुगतान और एक विदेशी इंजीनियर की आत्महत्या जैसे गंभीर पहलू जुड़े हैं। इसलिए जांच केवल कागजी औपचारिकता बनकर नहीं रहनी चाहिए। पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाने चाहिए, भुगतान से जुड़ी फाइलें सामने आनी चाहिए, संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों के बयान दर्ज होने चाहिए और ली सी बीन के परिवार से भी संपर्क किया जाना चाहिए।

अब सवालों से बचने का रास्ता नहीं

केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने नई शिकायत के आधार पर सतर्कता ब्यूरो को प्रारंभिक जांच की अनुमति दी है। एजेंसी यह तय करेगी कि मामले में FIR दर्ज करने और आगे आपराधिक जांच की जरूरत है या नहीं। अभी आरोप साबित नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी गंभीरता को देखते हुए जांच का हर कदम पारदर्शी होना चाहिए। ज्ञानेश कुमार की ओर से इन नए आरोपों पर कोई तत्काल सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। India News – The Indian Express +2

अब यह मामला केवल 2006 की एक पुरानी फाइल तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में जवाबदेही और भरोसे का भी है। अगर किसी आम अधिकारी के खिलाफ ऐसी शिकायत आती, तो क्या उसे भी दो दशक पुरानी फाइलों के पीछे छिपकर सवालों से बचने दिया जाता?

ज्ञानेश कुमार को इस मामले में उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए। जांच एजेंसी को बिना किसी दबाव के हर पहलू की पड़ताल करनी चाहिए। यदि रिश्वत मांगने के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो कानून के तहत कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो जांच के आधार और निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

देश को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर बैठे व्यक्ति से विशेष छूट नहीं, बल्कि विशेष जवाबदेही चाहिए। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी अधिकारी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से बड़ी है।

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