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देश का गद्दार ज्ञानेश! चुनाव आयोग की खुली पोल, पांच हफ्तों में 14 आपत्तियों पर पलटे फैसले, Form-6 से हटानी पड़ी विवादित शर्त

दो निर्वाचन आयुक्तों ने दस महीने में 14 बार उठाए गंभीर सवाल; ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले आयोग को बैठकों, IT सिस्टम, अधिकारियों की शक्तियों और मतदाता पंजीकरण तक पर बदलना पड़ा रुख। सवाल—अगर खुलासे नहीं होते, तो क्या मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ी ये गड़बड़ियां कभी सुधारी जातीं?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 नवंबर 2026

देश के लोकतंत्र के साथ इससे बड़ा खिलवाड़ क्या होगा कि जिस चुनाव आयोग पर हर नागरिक के वोट की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसी के कामकाज पर उसके अपने दो निर्वाचन आयुक्त बार-बार गंभीर सवाल उठा रहे हों? जिस आयोग को निष्पक्षता और पारदर्शिता की मिसाल होना चाहिए, वहां दस महीनों में 14 बार आपत्तियां दर्ज हों और फिर सार्वजनिक खुलासों के बाद पांच हफ्तों के भीतर लगभग हर बड़े विवादित फैसले पर यू-टर्न लेना पड़े!

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में है। मतदाता पंजीकरण के Form-6 में विवादित घोषणा जोड़ने से लेकर IT सिस्टम, अधिकारियों के अधिकारों, बैठकों की पारदर्शिता और मतदाता सूची में नाम शामिल करने तक कई मामलों में आयोग को अपना रुख बदलना पड़ा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर आयोग के भीतर विरोध दर्ज नहीं होता, अगर इन गड़बड़ियों का खुलासा नहीं होता और अगर जनता सवाल नहीं उठाती, तो क्या ज्ञानेश कुमार का आयोग खुद इन फैसलों को सुधारता?

यह मामला केवल प्रशासनिक चूक का नहीं है। यह करोड़ों मतदाताओं के भरोसे और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल है।

दो आयुक्तों की 14 आपत्तियां, फिर आयोग के फैसलों में यू-टर्न

पिछले दस महीनों में निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने आयोग की कार्यप्रणाली और विभिन्न फैसलों पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कराईं। इनमें बैठकों की प्रक्रिया, अधिकारियों के अधिकार, IT सिस्टम पर नियंत्रण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने तथा SIR से जुड़े फैसले शामिल थे।

इन आपत्तियों के बाद सामने आए घटनाक्रम में आयोग को पांच हफ्तों के भीतर लगभग हर उस मुद्दे पर बदलाव करना पड़ा, जिस पर सवाल उठाए गए थे।

अब आयोग यह कह रहा है कि उसके प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और आयुक्तों की टिप्पणियां औपचारिक निर्णय नहीं थीं। लेकिन जनता पूछ रही है कि अगर सब कुछ सही था तो फिर इतनी जल्दी इतने बड़े बदलाव क्यों करने पड़े? क्या आयोग ने पहले गलतियां नहीं की थीं या अब उन्हें स्वीकार करने से बचने की कोशिश हो रही है?

Form-6 में जोड़ी गई विवादित शर्त, युवाओं को बनाया पुराने रिकॉर्ड का मोहताज

Form-6 वह आवेदन है जिसके जरिए कोई व्यक्ति पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। जुलाई में इसके ऑनलाइन संस्करण में एक नई अनिवार्य घोषणा जोड़ दी गई। आवेदक को बताना पड़ता था कि क्या उसका नाम, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुई पिछली SIR के बाद प्रकाशित मतदाता सूची में दर्ज था।

इस सवाल का जवाब दिए बिना आवेदक आगे नहीं बढ़ सकता था। यानी पहली बार वोट देने की उम्र तक पहुंचे युवाओं को भी अपने परिवार के दशकों पुराने मतदाता रिकॉर्ड के बारे में जानकारी देनी पड़ रही थी।

यहां सबसे बड़ा कानूनी सवाल था। Form-6 का निर्धारित प्रारूप Registration of Electors Rules, 1960 के तहत आता है और इसमें औपचारिक संशोधन का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। 16 मई को निर्वाचन आयुक्त विवेक जोशी ने यह बात रिकॉर्ड पर रखी थी। 19 मई को सुखबीर सिंह संधू ने भी इस पर सहमति जताई थी।

इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन Form-6 में नई घोषणा दिखाई देने लगी। सवाल है कि जब आयोग के भीतर ही इस बदलाव की वैधानिकता पर आपत्ति दर्ज थी, तो इसे लागू करने का आदेश किसने दिया?

संधू ने बताया अनधिकृत और गैरकानूनी, फिर भी नहीं हटी शर्त

13 अगस्त को निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की थी। उनकी चेतावनी साफ थी कि पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं को इस तरह की शर्तों के जरिए परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

लेकिन 23 सितंबर तक यह घोषणा आयोग के पोर्टल पर मौजूद रही। यानी आयोग के भीतर आपत्ति दर्ज होने के बावजूद विवादित व्यवस्था जारी रही।

23 सितंबर को मामला सार्वजनिक होने के बाद आयोग ने बयान जारी कर अपने कदमों को कानून के अनुरूप बताया। आयुक्तों की टिप्पणियों को निर्णय प्रक्रिया के दौरान उठाए गए संचालन संबंधी सवाल करार दिया गया।

तीन दिन बाद, 26 सितंबर को आयोग ने दूसरा रुख अपनाया। उसने कहा कि SIR से जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है, लेकिन जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका है, वहां इसका इस्तेमाल नहीं होगा।

12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित Form-6 को न तो मंजूरी दी थी और न ही खारिज किया था।

इसके बाद 21 अक्टूबर को आयोग ने पूरे देश में ऑनलाइन Form-6 से SIR की घोषणा हटा दी और उसे अलग फॉर्म में रखने का फैसला किया। अब यह घोषणा उन राज्यों में भी ऑनलाइन Form-6 का हिस्सा नहीं है, जहां SIR की प्रक्रिया जारी है।

सुप्रीम कोर्ट में कहा—Form-6 बदला ही नहीं, लेकिन पोर्टल पर बदलाव दिख रहा था!

इस मामले में आयोग के हलफनामे ने एक और गंभीर विरोधाभास सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट में आयोग ने कहा कि Form-6 में कभी औपचारिक संशोधन नहीं किया गया। लेकिन उसी हलफनामे में यह भी स्वीकार किया गया कि ऑनलाइन पोर्टल पर घोषणा जिस तरह दिखाई गई, उससे ऐसा लग सकता था मानो Form-6 में संशोधन कर दिया गया हो।

अब सवालों से बचने का रास्ता नहीं है।

* यदि Form-6 में संशोधन नहीं हुआ था, तो जुलाई में नई अनिवार्य घोषणा किसके आदेश पर जोड़ी गई?

* यदि यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था थी, तो आवेदक को जवाब दिए बिना आगे बढ़ने से क्यों रोका गया?

* यदि घोषणा पूरी तरह कानूनी थी, तो फिर इसे पूरे देश में ऑनलाइन फॉर्म से हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?

* जब आयोग के भीतर आपत्ति दर्ज हो चुकी थी, तो कार्रवाई के लिए सार्वजनिक विवाद का इंतजार क्यों किया गया?

आठ मोर्चों पर पीछे हटना पड़ा चुनाव आयोग को

Form-6 अकेला मामला नहीं है। पांच हफ्तों में आयोग को कई दूसरे मुद्दों पर भी बदलाव करने पड़े।

1\. बैठकों का एजेंडा और मिनट्स: पहले बैठकों का एजेंडा समय पर साझा नहीं किया जाता था और कार्यवाही का विवरण जारी नहीं होता था। अब हर बैठक से पहले एजेंडा प्रसारित करने और बाद में मिनट्स जारी करने की व्यवस्था की गई है।

2\. अधिकारियों के विदेश दौरे: पहले अधिकारियों के विदेश दौरे आयोग की मंजूरी के बिना होने पर सवाल उठे थे। अब ऐसे दौरों के लिए आयोग की अनुमति जरूरी कर दी गई है।

3\. IT सिस्टम पर निगरानी: नए IT मॉड्यूल और पोर्टल आयोग की पूरी जानकारी और मंजूरी के बिना विकसित किए जाने पर आपत्ति उठी थी। अब DG (IT) सीमा खन्ना के अधीन तैयार होने वाले नए मॉड्यूल पहले समिति के सामने रखे जाएंगे और फिर आयोग की मंजूरी के लिए भेजे जाएंगे।

4\. ECINet का ऑडिट: ECINet सॉफ्टवेयर की कानूनी अनुपालना की जांच के लिए 14 अक्टूबर को समिति बनाई गई। जबकि इसकी मांग 29 मई को की गई थी और 14 अगस्त को संधू ने दर्ज किया था कि इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई।

5\. मैदानी अधिकारियों के अधिकार: मतदाता सूची से जुड़े फैसलों और दस्तावेजों तक पहुंच के केंद्रीकरण पर सवाल उठे थे। अब ERO और अन्य मैदानी अधिकारियों को ECINet के जरिए कुछ मामलों में अधिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई है। बूथ लेवल अधिकारियों को मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज जुटाने की अनुमति भी दी गई है।

6\. गोवा के 97 मतदाता: गोवा में 97 मतदाताओं के नाम ERO द्वारा मंजूर किए जाने के बावजूद ECINet की तकनीकी व्यवस्था में हटाए गए नाम वापस जोड़ने का विकल्प नहीं था। अब इनके नाम शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। इनमें से 88 लोगों ने Form-6 भरा और उनके आवेदन स्वीकार किए गए हैं।

7\. छूटे हुए मतदाताओं के लिए अभियान: 29 सितंबर को आयोग ने SIR पूरा कर चुके राज्यों में छूटे हुए मतदाताओं को शामिल करने के लिए विशेष अभियान का आदेश दिया। अक्टूबर में 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया भी शुरू की गई, जिसमें 2027 में 18 वर्ष के होने वाले युवाओं को शामिल करने पर जोर है।

8\. पश्चिम बंगाल में अपीलें: मतदाता सूची में नाम बहाल किए जाने के खिलाफ दाखिल हजारों अपीलों को लेकर संधू ने अगस्त में पांच सवाल उठाए थे। आयोग के हलफनामे में अब इनमें से अधिकांश सवालों के जवाब दिए गए हैं। हालांकि अपीलें अभी भी ट्रिब्यूनल के सामने लंबित हैं।

ज्ञानेश कुमार से जवाब मांग रहा है लोकतंत्र

इन घटनाओं के बाद चुनाव आयोग केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। यदि फैसले सही थे तो उन्हें बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? यदि आयुक्तों की आपत्तियां केवल सुझाव थीं, तो उन्हीं मुद्दों पर आयोग को अपना रुख क्यों बदलना पड़ा?

ज्ञानेश कुमार को बताना होगा कि Form-6 में विवादित घोषणा किसके निर्देश पर जोड़ी गई। दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों को समय रहते क्यों नजरअंदाज किया गया? ECINet की तकनीकी खामियों के कारण मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कैसे रह गए? और इन फैसलों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

चुनाव आयोग कोई निजी दफ्तर नहीं है। यहां किसी अधिकारी की मनमर्जी नहीं चल सकती। मतदाता सूची किसी की निजी संपत्ति नहीं और चुनाव आयोग किसी राजनीतिक सत्ता का उपकरण नहीं हो सकता। देश के नागरिकों का वोट किसी अधिकारी की कृपा से नहीं, संविधान से मिलने वाला अधिकार है।

अगर खुलासे नहीं होते तो क्या यू-टर्न भी होते?

यह इस पूरे प्रकरण का सबसे तीखा सवाल है। दो निर्वाचन आयुक्तों ने बार-बार आपत्तियां दर्ज कराईं। मामला सार्वजनिक हुआ। कानूनी सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देना पड़ा। इसके बाद पांच हफ्तों में आयोग को लगभग हर बड़े विवादित मुद्दे पर अपना रुख बदलना पड़ा।

क्या यह सब आयोग की अपनी जवाबदेही का नतीजा था, या फिर लगातार उठते सवालों और सार्वजनिक खुलासों ने उसे पीछे हटने के लिए मजबूर किया?

विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर पहले से गंभीर आरोप लगा रहा है। इन घटनाओं ने उन आरोपों के बीच आयोग की विश्वसनीयता को लेकर बहस और तेज कर दी है। लेकिन किसी भी आरोप को अंतिम सच मानने से पहले आयोग को तथ्यों के साथ जवाब देना होगा।

लोकतंत्र का प्रहरी अगर मतदाता के अधिकारों पर ही सवाल खड़े करने लगे, तो जवाबदेही भी सबसे पहले उसी की तय होनी चाहिए। ज्ञानेश कुमार को समझना होगा कि चुनाव आयोग कोई ‘ज्ञानेश प्रिंटर’ नहीं है, जहां मनचाहा नतीजा छापने के लिए सिस्टम चलाया जाए। यह देश के मतदाता का आयोग है—और इसका हिसाब भी जनता ही मांगेगी!

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