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चुनाव आयोग में तीन महीने बाद बदला फैसला: IT विभाग की DG सीमा खन्ना पर फिर बहाल हुई वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति और कैबिनेट सचिव तक मामला पहुंचने के बाद आयोग ने जारी किया नया आदेश; 28 जुलाई को हटाई गई निगरानी व्यवस्था फिर लागू, अब वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त पवन कुमार शर्मा के माध्यम से आगे बढ़ेंगी IT विभाग की फाइलें

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 नवंबर 2026

भारत के निर्वाचन आयोग में आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों के अधिकारों को लेकर पिछले तीन महीने से चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आयोग ने अपने ताजा आदेश के जरिए सूचना प्रौद्योगिकी (IT) विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना पर वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी व्यवस्था बहाल कर दी है। अब उन्हें अपने विभाग से संबंधित फाइलें वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त पवन कुमार शर्मा के माध्यम से आगे बढ़ानी होंगी। यह वही निगरानी व्यवस्था है, जिसे 28 जुलाई 2026 के कार्य आवंटन आदेश के तहत हटा दिया गया था।

इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि जुलाई में जारी आदेश के बाद निर्वाचन आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने अपनी चिंता जताई थी। मामला इतना गंभीर हुआ कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस विषय को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन के समक्ष भी उठाया था। अब तीन महीने बाद आयोग ने नया आदेश जारी कर IT विभाग के कामकाज में वरिष्ठ स्तर की निगरानी की व्यवस्था दोबारा लागू कर दी है।

यह घटनाक्रम निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, चुनाव आयुक्तों के बीच प्रशासनिक समन्वय और आयोग के भीतर अधिकारों के बंटवारे को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।

28 जुलाई के आदेश से शुरू हुआ था विवाद

विवाद की शुरुआत 28 जुलाई 2026 को जारी कार्य आवंटन आदेश से हुई थी। इस आदेश के तहत निर्वाचन आयोग के IT विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना के कामकाज पर पहले से मौजूद वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी व्यवस्था हटा दी गई थी।

प्रशासनिक व्यवस्था में किसी विभाग के महानिदेशक को सीधे कामकाज करने की जिम्मेदारी देना असामान्य नहीं है, लेकिन निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में महत्वपूर्ण विभागों के कामकाज और फाइलों की निगरानी का सवाल विशेष महत्व रखता है। IT विभाग चुनाव आयोग की तकनीकी और डिजिटल व्यवस्थाओं से जुड़ा है। ऐसे विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण, निर्णय प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर स्पष्ट व्यवस्था होना जरूरी है।

28 जुलाई के आदेश के बाद आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव पर चिंता जताई। उन्होंने इस मामले को केवल सामान्य कार्य आवंटन का विषय मानने के बजाय प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा माना और कैबिनेट सचिव तक अपनी बात पहुंचाई।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति ने बढ़ाई गंभीरता

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आपत्ति आयोग के भीतर से ही आई थी। दो चुनाव आयुक्तों द्वारा कार्य आवंटन के फैसले पर चिंता जताना इस बात का संकेत था कि आयोग के वरिष्ठ स्तर पर इस व्यवस्था को लेकर एकमत स्थिति नहीं थी।

निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की भूमिका चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन से जुड़ी होती है। ऐसे में आयोग के भीतर प्रशासनिक फैसलों को लेकर असहमति सामने आना संस्थागत समन्वय के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

मामला कैबिनेट सचिव तक पहुंचने से इसकी गंभीरता और बढ़ गई। हालांकि उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी आपत्ति में कौन-कौन से विशिष्ट प्रशासनिक या कानूनी आधार रखे थे। इसलिए इस विवाद को किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत भूमिका या मंशा से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि जुलाई के कार्य आवंटन आदेश को लेकर आयोग के भीतर गंभीर चिंता पैदा हुई थी।

नए आदेश में क्या बदला?

निर्वाचन आयोग ने बुधवार, 4 नवंबर को नया कार्य आवंटन आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त पवन कुमार शर्मा को IT और ICT विभागों का प्रभार सौंपा गया है।

आदेश में स्पष्ट किया गया है कि महानिदेशक सीमा खन्ना को संबंधित कार्यात्मक विभागों की फाइलें वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त पवन कुमार शर्मा के माध्यम से प्रस्तुत करनी होंगी।

आदेश में कहा गया है:

“She would put up files of above-mentioned functional divisions through Sr. DEC (PKS).”

इसका सीधा अर्थ है कि IT और ICT से संबंधित निर्धारित विभागों की फाइलें अब सीधे आगे बढ़ाने के बजाय वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त के माध्यम से प्रस्तुत की जाएंगी। इस तरह विभाग के कामकाज पर वरिष्ठ प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था फिर से लागू हो गई है।

यह बदलाव केवल किसी अधिकारी के पद या जिम्मेदारी का मामला नहीं है। सरकारी और संवैधानिक संस्थाओं में फाइलों के आगे बढ़ने की प्रक्रिया से यह तय होता है कि निर्णय किस स्तर पर लिए जाएंगे, उनकी समीक्षा कौन करेगा और किसी फैसले के लिए जवाबदेही किसकी होगी।

IT विभाग की जिम्मेदारी इतनी महत्वपूर्ण क्यों?

निर्वाचन आयोग का IT और ICT विभाग चुनावी प्रक्रिया के तकनीकी ढांचे से जुड़ा है। आज चुनाव प्रबंधन में डिजिटल प्रणालियों, डेटा प्रबंधन, तकनीकी संचार और सूचना प्रणालियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

मतदाता सूची के प्रबंधन से लेकर चुनावी सूचनाओं के प्रसार, आयोग की डिजिटल सेवाओं और तकनीकी समन्वय तक कई क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए इस विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा जवाबदेही आवश्यक है।

ऐसे विभाग में वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी व्यवस्था का होना या हटाया जाना केवल आंतरिक प्रशासनिक बदलाव नहीं माना जा सकता। इसका संबंध संस्थागत नियंत्रण और निर्णयों की समीक्षा से भी है।

हालांकि, उपलब्ध आदेश के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि जुलाई में निगरानी हटाने से किसी चुनावी प्रक्रिया या तकनीकी प्रणाली को नुकसान पहुंचा था। इसके लिए अलग से प्रमाण और विस्तृत जानकारी की आवश्यकता होगी।

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और आंतरिक जवाबदेही का सवाल

निर्वाचन आयोग भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी इसी संस्था पर है। इसलिए आयोग के भीतर लिए जाने वाले प्रशासनिक फैसलों का महत्व भी सामान्य सरकारी विभागों से कहीं अधिक है।

आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव के दिन की व्यवस्था से नहीं बनती। उसकी निर्णय प्रक्रिया, अधिकारियों के बीच अधिकारों का स्पष्ट बंटवारा, आंतरिक पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

जब किसी महत्वपूर्ण विभाग की निगरानी व्यवस्था बदली जाती है और उसी पर आयोग के दो चुनाव आयुक्त सवाल उठाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह जानने की जरूरत पैदा होती है कि बदलाव किस आधार पर किया गया था। क्या इस फैसले पर आयोग के भीतर पर्याप्त विचार-विमर्श हुआ था? क्या सभी संबंधित अधिकारियों को विश्वास में लिया गया था? और अब तीन महीने बाद निगरानी व्यवस्था बहाल करने के पीछे प्रशासनिक कारण क्या हैं?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है। केवल नया आदेश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है; संस्थागत पारदर्शिता के लिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पहले व्यवस्था क्यों बदली गई और अब उसे दोबारा लागू करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

तीन महीने का घटनाक्रम क्या संदेश देता है?

28 जुलाई को निगरानी व्यवस्था हटाई गई। इसके बाद दो चुनाव आयुक्तों ने चिंता जताई और मामला कैबिनेट सचिव तक पहुंचा। अब 4 नवंबर को जारी नए आदेश में IT/ICT विभागों का प्रभार वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त पवन कुमार शर्मा को सौंपते हुए फाइलों को उनके माध्यम से आगे बढ़ाने की व्यवस्था बहाल कर दी गई।

यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि निर्वाचन आयोग के भीतर प्रशासनिक नियंत्रण और कार्य आवंटन को लेकर उठे सवालों का समाधान तत्काल नहीं हुआ, बल्कि लगभग तीन महीने बाद नया आदेश जारी किया गया।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था से आयोग के भीतर प्रशासनिक समन्वय कितना बेहतर होता है और IT विभाग के कामकाज में जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित की जाती है।

लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है पारदर्शिता

निर्वाचन आयोग से देश के नागरिकों की अपेक्षा है कि वह राजनीतिक दलों और सरकारों से स्वतंत्र होकर निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था सुनिश्चित करे। इस जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए आयोग का आंतरिक प्रशासन भी स्पष्ट, पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए।

आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति, मामला कैबिनेट सचिव तक पहुंचना और फिर तीन महीने बाद निगरानी व्यवस्था की बहाली—ये सभी घटनाएं ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए।

यह मामला किसी एक अधिकारी के अधिकार या पद की सीमा से आगे बढ़कर उस संस्थागत संस्कृति से जुड़ा है, जिसमें निर्णयों की समीक्षा, असहमति का सम्मान और जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के लिए यह आवश्यक है कि उसके महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसलों पर अनावश्यक अस्पष्टता न रहे।

क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी उस संस्था पर जनता का भरोसा है जो चुनाव कराती है। और यह भरोसा तभी मजबूत होता है, जब निर्वाचन आयोग के भीतर भी हर महत्वपूर्ण फैसले की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह हो।

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