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छह साल से जेल, मुकदमे की रफ्तार पर सवाल! शरजील इमाम ने जमानत के लिए खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश के UAPA मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे शरजील इमाम; अभियोजन के 900 से अधिक गवाहों और अब तक गवाही शुरू न होने का हवाला देकर मांगी जमानत, 47 गवाह संरक्षित श्रेणी में

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 नवंबर 2026

फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में आरोपी बनाए गए कार्यकर्ता शरजील इमाम ने एक बार फिर न्याय की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। उनकी याचिका का मूल सवाल केवल जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि जब मुकदमे में अभियोजन पक्ष की गवाही शुरू नहीं हुई है और सैकड़ों गवाहों की सूची है, तो आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखने का औचित्य क्या है?

शरजील इमाम ने अपनी याचिका में दलील दी है कि अभियोजन पक्ष अब तक गवाहों की जांच नहीं कर पाया है और सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई एक वर्ष की रोक की अवधि भी समाप्त होने के करीब है। उनका कहना है कि मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी को देखते हुए उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। यह मामला अब एक बार फिर इस बड़े संवैधानिक प्रश्न को सामने ला रहा है कि गंभीर आरोपों की जांच और मुकदमे की प्रक्रिया के बीच किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमा कहां तय होती है।

900 से अधिक गवाह, 18 आरोपी और लंबी सुनवाई की आशंका

शरजील इमाम की याचिका में मुकदमे की व्यापकता से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े रखे गए हैं। इसके अनुसार, इस मामले में 25 सितंबर 2020 को आरोपपत्र दाखिल किया गया था। कुल 18 आरोपी मुकदमे का सामना कर रहे हैं और अभियोजन पक्ष ने 900 से अधिक गवाहों की सूची पेश की है। इनमें 47 संरक्षित गवाह भी शामिल हैं।

गवाहों की इतनी बड़ी संख्या का अर्थ है कि मुकदमे की सुनवाई एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है। प्रत्येक गवाह की गवाही, उससे जुड़े दस्तावेज और बचाव पक्ष की जिरह के बाद ही अदालत आरोपों के गुण-दोष पर फैसला कर सकेगी। लेकिन इसी स्थिति से एक गंभीर कानूनी सवाल भी पैदा होता है—यदि सुनवाई लंबी चलने की आशंका है और गवाही शुरू होने में ही देरी हो रही है, तो क्या आरोपी को अनिश्चित अवधि तक जेल में रखा जाना चाहिए?

शरजील इमाम की याचिका इसी आधार पर जमानत की मांग कर रही है। हालांकि, यह उनकी ओर से पेश की गई दलील है। सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष का पक्ष और मामले की परिस्थितियां भी देखेगा।

30 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की थी जमानत

दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2026 को शरजील इमाम को UAPA के तहत दर्ज इस मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया था। यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश से जुड़ा है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में राहत की मांग की है।

यहां यह समझना जरूरी है कि जमानत पर फैसला और मुकदमे के अंतिम नतीजे दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। जमानत मिलने का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं होता और जमानत खारिज होने का अर्थ दोष सिद्ध हो जाना भी नहीं है। शरजील इमाम के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय मुकदमे की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होना है।

UAPA और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल

इस मामले का सबसे संवेदनशील पहलू UAPA जैसे कठोर कानून के तहत लंबे समय तक हिरासत और मुकदमे की धीमी गति के बीच संतुलन का है। UAPA आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े अपराधों से निपटने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। इसमें जमानत के लिए सामान्य आपराधिक कानून की तुलना में कठोर शर्तें लागू होती हैं।

लेकिन कठोर कानून का इस्तेमाल भी संविधान और न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। न्यायिक प्रक्रिया में देरी, मुकदमे की अवधि और आरोपी की हिरासत जैसे प्रश्न इसी संवैधानिक अधिकार के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह देखने का अवसर होगा कि आरोपों की गंभीरता, उपलब्ध सामग्री, अभियोजन की स्थिति और मुकदमे में हो रही देरी के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए। अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या जमानत देने से जांच या मुकदमे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

न्याय में देरी का सवाल केवल एक आरोपी का मामला नहीं

शरजील इमाम की याचिका ने एक व्यापक सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन आरोपों का अंतिम परीक्षण अदालत में होना चाहिए। मुकदमे की सुनवाई में देरी और लंबी न्यायिक हिरासत के प्रश्न को भी उतनी ही गंभीरता से देखना जरूरी है।

एक ओर फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में प्रभावित परिवारों को न्याय मिलने और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होने की अपेक्षा है। दूसरी ओर, आरोपों का सामना कर रहे प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई और समयबद्ध न्याय का अधिकार भी प्राप्त है। न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता इसी में है कि वह पीड़ितों को न्याय दिलाने के साथ-साथ आरोपियों के संवैधानिक अधिकारों की भी रक्षा करे।

अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में शरजील इमाम ने अभियोजन की ओर से गवाहों की जांच में हुई देरी, 900 से अधिक गवाहों की सूची और एक वर्ष की रोक की अवधि समाप्त होने के करीब होने को जमानत के पक्ष में आधार बनाया है।

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तय करने का सवाल होगा कि इन परिस्थितियों में जमानत देने का आधार बनता है या नहीं। अदालत का फैसला केवल शरजील इमाम की हिरासत के लिहाज से ही नहीं, बल्कि UAPA के मामलों में लंबी न्यायिक प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

कानून का राज केवल आरोप लगाने या सजा देने से मजबूत नहीं होता। उसकी असली कसौटी यह है कि न्याय समय पर मिले, सुनवाई निष्पक्ष हो और किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर फैसला कानून तथा ठोस न्यायिक आधार पर हो। दिल्ली दंगों के इस मामले में भी पीड़ितों को न्याय और आरोपियों को निष्पक्ष सुनवाई—दोनों ही लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था की अनिवार्य जिम्मेदारियां हैं।

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