राष्ट्रीय | आलोक रंजन, पॉलिटिकल एडिटर | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 नवंबर 2026
चुनाव जीतने के लिए केवल धार्मिक ध्रुवीकरण, जातीय समीकरण और चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का गणित पर्याप्त नहीं होता। मतदाताओं का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण होता है। जब किसी राजनीतिक दल के पारंपरिक समर्थक ही उससे नाराज होकर दूरी बनाने लगते हैं, तो उसकी पूरी चुनावी रणनीति धरी रह सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के अनुभव और बिहार के बांकीपुर उपचुनाव का उदाहरण भारतीय राजनीति के लिए यही महत्वपूर्ण संदेश देता है।
बीजेपी के लिए अमेरिका का यह घटनाक्रम एक अहम राजनीतिक सबक है। भारत में जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण यदि जल्दबाजी, गोपनीयता और राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है, तो इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
ट्रंप के निर्देश पर आठ राज्यों में बदला चुनावी नक्शा
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में रिपब्लिकन पार्टी ने आठ राज्यों में कांग्रेस के चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा निर्धारित कीं। इस कवायद का मकसद डेमोक्रेटिक पार्टी के कब्जे वाली सीटों को अपने पक्ष में करना और रिपब्लिकन पार्टी की सीटों को सुरक्षित बनाना था।
लेकिन चुनाव परिणामों ने इस रणनीति को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने दी। रिपब्लिकन पार्टी ने कई ऐसी सीटें भी गंवा दीं, जिन्हें वह अपने लिए सुरक्षित मान रही थी। टेक्सास और फ्लोरिडा जैसे उसके पारंपरिक राजनीतिक गढ़ों में भी उसे नुकसान उठाना पड़ा। इससे साफ हुआ कि चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं अपने पक्ष में तय कर लेने भर से मतदाताओं का समर्थन सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।
क्या है जेरिमैंडरिंग और क्यों उठते हैं सवाल?
चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को किसी राजनीतिक दल के लाभ के हिसाब से पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया को जेरिमैंडरिंग कहा जाता है। इसमें सामाजिक और राजनीतिक समूहों के मतदाताओं को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में इस तरह बांटा जाता है कि किसी खास पार्टी को चुनावी फायदा मिल सके।
इस रणनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह मानकर चलती है कि मतदाताओं की राजनीतिक पसंद एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक स्थिर रहेगी। लेकिन जब किसी पार्टी के पारंपरिक समर्थक ही उससे नाराज होकर अपना समर्थन वापस लेने लगते हैं, तो चुनावी क्षेत्रों का पूरा गणित बेअसर हो सकता है।
बांकीपुर उपचुनाव ने भी दिखाया बदलते मतदाताओं का मिजाज
बिहार के बांकीपुर उपचुनाव का उदाहरण इसी राजनीतिक वास्तविकता को सामने रखता है। इस विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक और जनसांख्यिकीय संरचना बीजेपी के अनुकूल मानी जाती थी। इसके बावजूद पार्टी को वहां बड़ा झटका लगा, क्योंकि उसके पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन बदल गया।
यह उदाहरण बताता है कि जातीय समीकरण किसी राजनीतिक दल की स्थायी चुनावी गारंटी नहीं होते। जिन मतदाताओं को किसी पार्टी का निश्चित समर्थक मान लिया जाता है, वे भी अपने राजनीतिक अनुभव, स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार और सरकार के कामकाज के आधार पर फैसला बदल सकते हैं।
भारत में जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पर सवाल
भारत में 2021 की जनगणना में देरी और 2026 में जनगणना तथा परिसीमन की संभावित प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या में बदलाव के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है। लेकिन इसकी प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
यदि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर किया जाता है, तो इससे चुनावी व्यवस्था में समान प्रतिनिधित्व और निष्पक्षता को लेकर विवाद पैदा हो सकते हैं। इसलिए परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अभ्यास में व्यापक चर्चा, पारदर्शिता और सभी पक्षों का विश्वास जरूरी है।
चुनाव का असली आधार जनता का भरोसा
भारतीय राजनीति के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि चुनाव केवल हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण, जातीय गोलबंदी या ‘वोट चोरी’ के आरोपों के सहारे नहीं जीते जा सकते। चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप गंभीर हैं और उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी इससे कहीं व्यापक है।
रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय, युवाओं का भविष्य और आम लोगों की आर्थिक स्थिति जैसे सवाल भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं। कोई भी राजनीतिक दल यह मानकर नहीं चल सकता कि धार्मिक या जातीय पहचान के आधार पर उसका समर्थन हमेशा बना रहेगा।
मतदाता किसी पार्टी को समर्थन देते हैं तो वे उससे बेहतर शासन, जवाबदेही और अपने जीवन में बदलाव की उम्मीद भी रखते हैं। जब ये उम्मीदें टूटती हैं, तो पारंपरिक समर्थक भी अपना राजनीतिक फैसला बदल सकते हैं।
अमेरिका में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी रणनीति और बिहार के बांकीपुर का उदाहरण यही बताते हैं कि चुनावी नक्शे और सामाजिक समीकरण किसी पार्टी की जीत की गारंटी नहीं होते। लोकतंत्र में अंततः मतदाताओं का भरोसा, सरकार का कामकाज और जनता के वास्तविक मुद्दे ही चुनावी राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।



