राष्ट्रीय/शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 अक्टूबर 2026
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर जारी आंदोलन के बीच लिंगदोह समिति की रिपोर्ट फिर चर्चा में आ गई है। विश्वविद्यालय में छात्रसंघ का संविधान तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की गई है। इस समिति को छात्रसंघ के विघटन के कारणों, अदालत के संबंधित फैसलों और 2006 में आई लिंगदोह समिति की सिफारिशों पर विचार करने की जिम्मेदारी दी गई है।
जामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर 12 अक्टूबर 2026 से छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। विद्यार्थियों की मांग है कि उन्हें अपने प्रतिनिधि चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार मिले और विश्वविद्यालय में निर्वाचित छात्रसंघ की व्यवस्था दोबारा शुरू की जाए।
लिंगदोह समिति का गठन क्यों हुआ था?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह की अध्यक्षता में गठित समिति ने 23 मई 2006 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनावों के लिए दिशा-निर्देश तय करना था, ताकि चुनाव निष्पक्ष, पारदर्शी और छात्र हितों के अनुरूप हो सकें।
समिति ने छात्र राजनीति में बाहरी हस्तक्षेप, चुनावी खर्च, उम्मीदवारों की पात्रता और राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों की भूमिका जैसे मुद्दों पर विचार किया। उसकी चिंता थी कि जब राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से जुड़े संगठन कैंपस चुनावों में प्रभाव बढ़ाते हैं, तो छात्र अलग-अलग राजनीतिक गुटों में बंट सकते हैं और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो सकता है।
राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों पर क्या थी चिंता?
लिंगदोह समिति का मानना था कि छात्रसंघ चुनावों को केवल राजनीतिक दलों के प्रभाव का विस्तार बनने से रोकना जरूरी है। समिति ने आशंका जताई कि पार्टी से जुड़े छात्र संगठन विश्वविद्यालयों में प्रतिस्पर्धा को छात्र हितों से हटाकर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में बदल सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि छात्र राजनीति या राजनीतिक विचारों पर चर्चा को पूरी तरह रोक दिया जाए। बल्कि उद्देश्य यह था कि चुनावों में छात्रों की भागीदारी, शैक्षणिक हित और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा प्रमुख रहें।
जामिया में गठित समिति के सामने अब यह महत्वपूर्ण सवाल है कि छात्रसंघ का ऐसा संविधान कैसे तैयार किया जाए, जिसमें चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी हो, छात्रों को प्रतिनिधित्व मिले और विश्वविद्यालय के नियमों का पालन भी सुनिश्चित किया जा सके।
जामिया की समिति को क्या देखना है?
विश्वविद्यालय ने सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन जुबैर मीनाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति बनाई है। उसे यह अध्ययन करना है कि जामिया का छात्रसंघ 2006 में क्यों भंग किया गया था, इस विषय पर अदालतों ने क्या फैसले दिए और लिंगदोह समिति की सिफारिशें विश्वविद्यालय पर किस तरह लागू होती हैं।
इन पहलुओं की समीक्षा के बाद समिति छात्रसंघ के संविधान का मसौदा तैयार करेगी। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में चुनाव बहाली की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है।
छात्रसंघ चुनाव क्यों हैं महत्वपूर्ण?
छात्रसंघ विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने का एक संस्थागत माध्यम होता है। फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, कैंटीन, परिवहन, सुरक्षा और शैक्षणिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर निर्वाचित प्रतिनिधि छात्रों की सामूहिक आवाज बन सकते हैं।
छात्रसंघ की अनुपस्थिति में विद्यार्थियों के सामने अपनी समस्याओं को संगठित तरीके से उठाने के अवसर सीमित हो सकते हैं। दूसरी ओर, चुनावों के दौरान निष्पक्षता, अनुशासन और शैक्षणिक गतिविधियों को बनाए रखना भी जरूरी है।
अब निगाहें समिति की सिफारिशों पर
जामिया में जारी विरोध के बीच समिति का गठन छात्रसंघ बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है, लेकिन विद्यार्थियों की मांगों का समाधान किस समय और किस रूप में होगा, यह आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
लिंगदोह समिति की रिपोर्ट इस बहस में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह छात्रसंघ चुनावों के संचालन के लिए दिशा-निर्देश उपलब्ध कराती है। अब चुनौती ऐसा रास्ता निकालने की है, जिससे छात्रों का प्रतिनिधित्व बहाल हो, चुनाव निष्पक्ष हों और विश्वविद्यालय का शैक्षणिक माहौल भी सुरक्षित रहे।



