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महाराष्ट्र में बीजेपी के गढ़ में ही चुनौती! पुणे में पिछड़ी पार्टी, नागपुर में कांटे की टक्कर; उम्मीदवार चयन पर उठे सवाल

MLC चुनावों ने बीजेपी के भीतर असंतोष और महायुति में खींचतान को किया उजागर; पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी और सहयोगियों के बीच तालमेल पर सवाल

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई/नई दिल्ली | 28 अक्टूबर 2026

महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के चुनाव ने बीजेपी के संगठन, उम्मीदवार चयन और सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन क्षेत्रों में बीजेपी अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ का दावा करती रही है, वहां भी उसे कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। पुणे स्नातक सीट पर बीजेपी उम्मीदवार पिछड़ता दिखा, जबकि नागपुर स्नातक सीट पर मुकाबला कांटे का रहा। इन रुझानों ने पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष और स्थानीय नेतृत्व की नाराजगी को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

बीजेपी के लिए यह महज पांच सीटों का चुनाव नहीं है। सवाल यह है कि जब पार्टी सत्ता में है और उसके पास मजबूत संगठन का दावा है, तब उसके पारंपरिक क्षेत्रों में मुकाबला इतना कड़ा क्यों हो रहा है? क्या उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय को नजरअंदाज किया गया? क्या पुराने नेताओं की नाराजगी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर रही है? और क्या महायुति के घटक दल अपने उम्मीदवारों के लिए वास्तव में एकजुट होकर काम कर रहे हैं?

नागपुर में चुनौती, बीजेपी के लिए चेतावनी

नागपुर स्नातक सीट का राजनीतिक महत्व असाधारण है। यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राज्य के मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले का गृह क्षेत्र है। नागपुर में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी है। ऐसे क्षेत्र में करीबी मुकाबला बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मतगणना के शुरुआती दौर में कांग्रेस के मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी आगे थे। बाद के रुझानों में बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले ने बढ़त बनाई। निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले के प्रदर्शन ने मुकाबले को और जटिल बना दिया।

नागपुर को बीजेपी का मजबूत क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन 2020 में पार्टी के पूर्व महापौर संदीप जोशी को यहां हार का सामना करना पड़ा था। अब एक बार फिर करीबी मुकाबले ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या पार्टी अपने पुराने समर्थन आधार को लेकर जरूरत से ज्यादा आश्वस्त रही?

बीजेपी के भीतर भी असंतोष के संकेत सामने आए। वरिष्ठ नेता अनिल सोले ने पार्टी के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा था कि स्थानीय नेताओं से पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं किया जा रहा और फैसले ऊपर से लिए जा रहे हैं। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की चेतावनी दी थी, हालांकि बाद में उन्हें पीछे हटने के लिए मना लिया गया।

यह घटनाक्रम बताता है कि संगठन के भीतर उठने वाली नाराजगी को केवल आंतरिक मामला कहकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। चुनावी मुकाबले में स्थानीय समीकरण और कार्यकर्ताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

पुणे में उम्मीदवार चयन पर घिरी बीजेपी

पुणे स्नातक सीट पर बीजेपी उम्मीदवार स्मिता जाधव के पिछड़ने से उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पर सवाल उठे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में पूछा कि क्या उम्मीदवार की योग्यता के साथ-साथ संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं और पार्टी के पारंपरिक समर्थकों के बीच उनकी स्वीकार्यता का भी पर्याप्त आकलन किया गया था?

नेता ने यह सवाल भी उठाया कि दशकों से संगठन के लिए काम करने वाले किसी स्थानीय चेहरे को उम्मीदवार बनाने पर विचार क्यों नहीं किया गया।

यह सवाल बीजेपी के उस संगठनात्मक मॉडल पर बहस खड़ी करता है, जिसमें पार्टी अक्सर मजबूत कैडर और बूथ स्तर तक फैले नेटवर्क का दावा करती है। यदि स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी और उम्मीदवार की स्वीकार्यता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो नेतृत्व के सामने इनकी समीक्षा करना जरूरी होगा।

हालांकि, केवल चुनावी रुझानों से यह साबित नहीं होता कि उम्मीदवार चयन ही प्रदर्शन का एकमात्र कारण था। लेकिन पार्टी के भीतर से उठ रही आलोचना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

महायुति में एकजुटता के दावे पर सवाल

चुनाव ने बीजेपी के साथ-साथ उसके सहयोगी दलों की आपसी खींचतान को भी सामने ला दिया। छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीट पर एनसीपी के सतीश चव्हाण, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रतापसिंह पाटिल से पीछे चल रहे थे।

शिवसेना नेता अब्दुल सत्तार ने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के कुछ सदस्य एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के उम्मीदवार का समर्थन कर रहे थे। इस बयान ने गठबंधन के भीतर आपसी भरोसे और चुनावी तालमेल को लेकर सवाल बढ़ा दिए।

बीजेपी, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और एनसीपी राज्य में सत्ता साझा कर रहे हैं। इसके बावजूद यदि स्थानीय स्तर पर सहयोगी दलों के उम्मीदवारों को एक-दूसरे के समर्थकों का पूरा समर्थन नहीं मिल रहा, तो गठबंधन की चुनावी रणनीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सत्ता में साझेदारी और चुनाव में साझा रणनीति—दोनों अलग-अलग बातें हैं। इन चुनावों ने दिखाया कि गठबंधन की मजबूती का आकलन केवल सरकार में साथ बैठने से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर आपसी सहयोग से भी होगा।

बीजेपी ने झटका मानने से किया इनकार

बीजेपी प्रवक्ता नवनाथ बन ने नतीजों को पार्टी के लिए बड़ा झटका मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि पांच में से तीन सीटों पर महायुति आगे है और बीजेपी अपने तीन में से दो मुकाबलों में बढ़त बनाए हुए है। इसलिए इसे हार या बड़ी विफलता बताना उचित नहीं है।

उन्होंने विपक्ष के इस दावे को भी खारिज किया कि मतपत्रों से हुए चुनाव बीजेपी की कमजोर होती स्थिति का संकेत देते हैं।

वहीं, शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने कहा था कि मतपत्रों से हुए चुनाव बीजेपी की वास्तविक स्थिति दिखाते हैं। यह विपक्ष का राजनीतिक आकलन है, जबकि बीजेपी ने अपने प्रदर्शन का बचाव किया है। दोनों पक्षों के दावों के बीच अंतिम नतीजे और निर्वाचन क्षेत्रवार आंकड़े अहम रहेंगे।

पुणे शिक्षक सीट पर बीजेपी को राहत

पुणे स्नातक सीट पर पिछड़ने के विपरीत, पुणे शिक्षक सीट पर बीजेपी उम्मीदवार कौस्तुभ गावड़े कांग्रेस के मौजूदा विधान परिषद सदस्य जयंत असगांवकर से आगे थे। अमरावती शिक्षक सीट पर शिवसेना के मौजूदा सदस्य किरण सरनाइक कांग्रेस उम्मीदवार अदिति पोहरे से आगे चल रहे थे।

ये रुझान बताते हैं कि पांचों सीटों पर एक जैसी तस्वीर नहीं थी। कुछ क्षेत्रों में महायुति को बढ़त मिली, जबकि अन्य में विपक्ष ने मजबूत चुनौती पेश की। इसलिए पूरे चुनाव को किसी एक दल की जीत या हार के सरल निष्कर्ष में समेटना उचित नहीं होगा।

10.68 लाख मतदाता, 72.96 प्रतिशत मतदान

चुनाव अधिकारियों के अनुसार, पांच निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 182 उम्मीदवार मैदान में थे। कुल 10.68 लाख पंजीकृत मतदाताओं के लिए 2,419 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इन चुनावों में 72.96 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।

इन आंकड़ों के बीच असली राजनीतिक सवाल उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, स्थानीय संगठन की सक्रियता और गठबंधन के भीतर तालमेल का है। विधान परिषद के इन चुनावों में मतदाताओं का फैसला केवल राज्यस्तरीय राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की छवि से भी प्रभावित हो सकता है।

बीजेपी नेतृत्व के सामने अब जवाबदेही की चुनौती

महाराष्ट्र के इन चुनावी रुझानों ने बीजेपी नेतृत्व के सामने कई सवाल रखे हैं। क्या उम्मीदवार चयन में स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय को पर्याप्त महत्व मिला? क्या पुराने नेताओं की नाराजगी को समय रहते दूर किया गया? क्या महायुति के सहयोगी दलों के बीच चुनावी तालमेल वास्तव में प्रभावी रहा?

बीजेपी इन सवालों को खारिज कर सकती है, लेकिन पार्टी के भीतर से उठी आलोचना और कुछ सीटों पर कड़ा मुकाबला संगठनात्मक समीक्षा की जरूरत की ओर ध्यान खींचते हैं।

फिलहाल, उपलब्ध रुझानों के आधार पर पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी का जनाधार कमजोर पड़ने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि उम्मीदवार चयन, आंतरिक असंतोष और सहयोगियों के साथ तालमेल को लेकर उठे सवालों के जवाब पार्टी नेतृत्व को देने होंगे। सत्ता में होना और हर निर्वाचन क्षेत्र में निर्विरोध राजनीतिक स्वीकार्यता बनाए रखना एक ही बात नहीं है।

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