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जामिया में लोकतंत्र कैद, छात्र बेहाल! अत्याचारी जामिया प्रशासन शर्म करो, छात्र संघ चुनाव कराओ!

जामिया में पुलिस छावनी, गेट बंद, टीन की शीट और दीवारों से रास्ते ब्लॉक करने की शिकायतें; अनशनकारी छात्रों को पानी, बिजली और वाशरूम तक से वंचित किए जाने के गंभीर आरोप

राष्ट्रीय/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव की मांग को लेकर जारी आंदोलन के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। छात्र अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने भारी सुरक्षा बलों की तैनाती, बंद रास्तों और बुनियादी सुविधाओं के बाधित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल है—छात्र संघ चुनाव की मांग का जवाब संवाद से देने के बजाय परिसर में ऐसा तनावपूर्ण माहौल क्यों बनाया जा रहा है?

जामिया के कुलपति और रजिस्ट्रार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। जिस विश्वविद्यालय की स्थापना स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में हुई, वहां छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने की मांग के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। छात्र संघ की बहाली पर बातचीत करने के बजाय यदि प्रशासन का रवैया टकराव बढ़ाने वाला दिखाई देता है, तो यह विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक परंपरा और शैक्षणिक वातावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

2006 से छात्र संघ नहीं, आखिर कब तक?

जामिया में 2006 से छात्र संघ नहीं है। छात्र लंबे समय से निर्वाचित प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं। छात्र संघ का संविधान तैयार कर चुनाव कराने की मांग कोई अनुचित मांग नहीं, बल्कि छात्रों को अपनी समस्याएं उठाने के लिए लोकतांत्रिक मंच देने का सवाल है।

छात्रावासों की स्थिति, हॉस्टल आवंटन, प्रशासनिक फैसलों और छात्रों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए उन्हें प्रतिनिधि संस्था चाहिए। यदि प्रशासन छात्रों की मांगों को गंभीरता से सुनता, तो आज जैसी स्थिति पैदा होने से बच सकती थी। कुलपति और रजिस्ट्रार को स्पष्ट करना चाहिए कि छात्र संघ का संविधान बनाने और चुनाव कराने की प्रक्रिया में देरी क्यों हो रही है।

जामिया विश्वविद्यालय है, पुलिस छावनी नहीं!

परिसर में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती, हथियारों से लैस जवानों और वाटर कैनन की मौजूदगी ने आंदोलन को लेकर चिंता बढ़ाई है। आईटीबीपी के जवानों सहित भारी फोर्स की तैनाती के बीच सवाल उठता है कि आखिर अपने ही विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक अधिकार मांग रहे छात्रों के सामने इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था क्यों खड़ी की गई है?

छात्र अपराधी नहीं हैं। उनकी मांगों का जवाब पुलिस बल और भय के माहौल से नहीं, बातचीत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने का माध्यम बनना।

गेट बंद, टीन की शीट और दीवारें—किससे डर रहा प्रशासन?

छात्रों की ओर से शिकायतें सामने आई हैं कि परिसर के गेट बंद कर दिए गए हैं, रास्तों को टीन की शीट लगाकर ब्लॉक किया गया है और दीवारें भी खिंचवाई गई हैं। यदि इन अवरोधों के कारण छात्रों की आवाजाही और शांतिपूर्ण विरोध प्रभावित हो रहा है, तो प्रशासन को तत्काल स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

क्या रास्ते बंद करने से छात्रों की मांगें खत्म हो जाएंगी? क्या दीवारें खड़ी करके लोकतांत्रिक सवालों को रोका जा सकता है? विश्वविद्यालय का प्रशासन छात्रों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने और समस्याएं सुलझाने के लिए होता है, न कि उनके सामने ऐसे अवरोध खड़े करने के लिए जो उनकी आवाजाही और रोजमर्रा की जरूरतों को प्रभावित करें।

प्रशासन को बताना चाहिए कि ये अवरोध किस आदेश के तहत लगाए गए हैं और छात्रों की सुरक्षा तथा सुविधाओं पर इनके प्रभाव को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

अनशनकारी छात्रों को पानी और वाशरूम से वंचित करने के आरोप

सबसे गंभीर सवाल अनशन कर रहे छात्रों की स्थिति को लेकर हैं। छात्रों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि परिसर के भीतर बिजली काट दी गई है, पानी की आपूर्ति बंद है और पीने के पानी तथा भोजन तक की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। यह भी शिकायत है कि रास्ते बंद होने के कारण अनशनकारी छात्र वाशरूम तक नहीं जा पा रहे हैं।

यदि ये शिकायतें सही हैं, तो स्थिति बेहद गंभीर है। अनशन कर रहे छात्रों की सेहत पहले ही जोखिम में होती है। ऐसे में पीने का पानी, स्वच्छता, रोशनी और चिकित्सा सहायता तक पहुंच बाधित होने से उनका स्वास्थ्य और सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

कुलपति और रजिस्ट्रार को तुरंत बताना चाहिए कि बिजली और पानी की आपूर्ति की वास्तविक स्थिति क्या है। अनशनकारी छात्रों को पीने का पानी, शौचालय, स्वच्छता और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना प्रशासन की तत्काल जिम्मेदारी है। किसी भी परिस्थिति में बुनियादी मानवीय जरूरतों को आंदोलन समाप्त कराने के दबाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

शिक्षकों की आवाज भी जरूरी

जामिया में लोकतांत्रिक माहौल का सवाल केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। जामिया टीचर्स एसोसिएशन (JTA) की बहाली का मुद्दा भी लंबे समय से उठाया जाता रहा है। पूर्व शिक्षक के वक्तव्य के अनुसार, संगठन को पहले के प्रशासन ने भंग किया था और हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद उसकी बहाली नहीं हुई।

शिक्षकों को भी अपने संगठन और स्वतंत्र आवाज के लिए आगे आना चाहिए। छात्रों और शिक्षकों को आमने-सामने खड़ा करना विश्वविद्यालय की शैक्षणिक संस्कृति को कमजोर करेगा। प्रशासन के समर्थन में जारी बयानों को पूरे शिक्षक समुदाय की स्वतंत्र राय का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

VC-रजिस्ट्रार जवाब दो, छात्र संघ चुनाव कराओ!

जामिया के कुलपति और रजिस्ट्रार को समझना होगा कि प्रशासनिक पद जिम्मेदारी के लिए होता है, मनमानी के लिए नहीं। छात्र संघ चुनाव की मांग को इतने बड़े टकराव में बदलने के बजाय उन्हें छात्रों के साथ तत्काल और सार्थक बातचीत शुरू करनी चाहिए।

सभी बुनियादी सुविधाएं बहाल की जाएं। अनशनकारी छात्रों को पानी, बिजली, वाशरूम और चिकित्सा सहायता मिले। रास्तों में लगाए गए अवरोधों की समीक्षा हो और छात्र संघ का संविधान तैयार करने तथा चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा घोषित की जाए।

जामिया को पुलिस छावनी बनाकर लोकतंत्र की मांग को दबाया नहीं जा सकता। दीवारें सवालों को नहीं रोक सकतीं, हथियार संवाद का विकल्प नहीं बन सकते और धमकियां छात्रों के अधिकारों का जवाब नहीं हैं।

अत्याचारी जामिया प्रशासन शर्म करो! छात्रों पर दबाव बंद करो, उनकी बुनियादी सुविधाएं बहाल करो और छात्र संघ चुनाव की मांग पर समयबद्ध फैसला लो। जामिया में तालीम चाहिए, दमन नहीं। लोकतंत्र चाहिए, डर नहीं। छात्र संघ चुनाव कराओ—छात्रों की आवाज सुनो!

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