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मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना सुप्रीम कोर्ट के जज जैसा मुश्किल, चुनाव आयोग ने अदालत में दी दलील

ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से संयुक्त हलफनामा; CEC के कामकाज पर रोक लगाने के प्रयास को कानून के खिलाफ बताया, फॉर्म-6 में बदलाव से भी किया इनकार

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अक्टूबर 2026

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर जारी विवाद के बीच भारत निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की ओर से 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त हलफनामा दाखिल किया गया। करीब 250 पन्नों के इस दस्तावेज में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी ही है।

आयोग ने यह भी दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर रोक लगाने का कोई भी प्रयास कानून के विपरीत होगा। हलफनामा ऐसे समय दाखिल हुआ है, जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है।

CEC को हटाने की प्रक्रिया पर आयोग का पक्ष

संयुक्त हलफनामे में आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए लागू संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लेख किया। इस प्रक्रिया के तहत CEC को हटाने के लिए वही आधार और तरीका अपनाना होता है, जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के मामले में लागू होता है।

आयोग का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के संवैधानिक कामकाज को रोकने की कोशिश कानूनी व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। हालांकि, पद से हटाने की प्रक्रिया कठिन होने का अर्थ यह नहीं है कि आयोग या उसके पदाधिकारियों के फैसलों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। चुनाव आयोग की जवाबदेही और उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

SIR और फॉर्म-6 को लेकर भी विवाद

चुनाव आयोग ने हलफनामे में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 पर भी अपना पक्ष रखा। आयोग के अनुसार, फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया है। उसने यह भी कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज को लेकर मीडिया में आई रिपोर्ट अपने आप में अदालत में आरोपों का प्रमाण नहीं मानी जा सकती।

हलफनामे में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अधिकारियों की ओर से मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के कुछ फैसलों के खिलाफ अपील दायर किए जाने का भी उल्लेख है। इस मामले में मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया, उसके नियमों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे हैं।

विपक्ष के सवाल और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष की मांग और चुनाव आयोग के जवाब के बीच टकराव बढ़ा है। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर सवाल उठा रहा है, जबकि आयोग ने अदालत में अपने फैसलों का बचाव किया है।

यह विवाद केवल किसी एक अधिकारी के पद पर बने रहने का सवाल नहीं है। इसका संबंध चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से भी है। मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामा चुनाव आयोग का पक्ष है, अदालत का अंतिम फैसला नहीं। अब न्यायिक प्रक्रिया में आयोग की दलीलों और याचिकाकर्ताओं के सवालों पर विचार किया जाएगा।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए आयोग के फैसलों पर उठने वाले सवालों का जवाब स्पष्ट नियमों, पारदर्शिता और ठोस तथ्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए। पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन जनता के मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता से जुड़े सवालों पर जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

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