राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के नाम से एक गंभीर सवाल सामने आया है। सोशल मीडिया पर साझा की जा रही सामग्री के अनुसार, उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची में “सुनीता, पत्नी राजेश” नाम की प्रविष्टि 2,341 बार दर्ज है। इस दावे ने मतदाता सूची की शुद्धता, सत्यापन प्रक्रिया और चुनाव आयोग की जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि, इन 2,341 प्रविष्टियों के एक ही व्यक्ति से संबंधित होने की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध सामग्री से नहीं होती। एक जैसा नाम कई अलग-अलग मतदाताओं का भी हो सकता है। इसलिए असली सवाल यह है कि क्या इन प्रविष्टियों के पते, मतदान केंद्र, मतदाता पहचान विवरण और अन्य रिकॉर्ड की जांच की गई है?
पीलीभीत का मामला: 10,470 प्रविष्टियों में मिली गड़बड़ी
पीलीभीत में मतदाता सूची से जुड़ी अनियमितताओं का मामला पहले ही सामने आ चुका है। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाता विवरण में बदलाव के लिए 13,779 फॉर्म-8 प्रविष्टियां दर्ज की गईं। इनमें से 10,470 को मंजूरी दी गई, लेकिन जांच में इन सभी मंजूर प्रविष्टियों में अनियमितताएं पाई गईं। संबंधित कार्यालय में इन आवेदनों के फॉर्म या सहायक दस्तावेज उपलब्ध नहीं मिले। इस मामले में दो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवाएं समाप्त करने के निर्देश दिए गए।
एक जैसे नाम की 2,341 प्रविष्टियां—सवाल सत्यापन का
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अखिलेश यादव ने मतदाता सूची में एक ही व्यक्ति के कई स्थानों पर दर्ज होने का मुद्दा उठाते हुए “सुनीता, पत्नी राजेश” नाम की 2,341 प्रविष्टियों का उदाहरण दिया। उन्होंने मतदाता सूची को आधार से जोड़ने और मतदान केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन की व्यवस्था करने की मांग भी की।
हालांकि, एक ही नाम की हजारों प्रविष्टियां होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी प्रविष्टियां एक ही व्यक्ति की हैं या सभी फर्जी हैं। इसकी पुष्टि के लिए पते, मतदाता पहचान संख्या, बूथ और अन्य संबंधित विवरणों की जांच जरूरी है।
चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग
यदि किसी नाम की हजारों प्रविष्टियां हैं, तो आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि वे अलग-अलग मतदाताओं की हैं या उनमें दोहराव है। इसी तरह, पीलीभीत में सामने आई अनियमितताओं की जांच, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और प्रभावित मतदाताओं के सही विवरण बहाल करने की प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। लेकिन जब एक ओर मतदाताओं के नामों की जांच और कटौती हो रही हो और दूसरी ओर इतनी बड़ी संख्या में अनियमित प्रविष्टियों का मामला सामने आए, तो पारदर्शिता की मांग और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि नागरिक के मतदान के अधिकार का आधार है। इसलिए चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब रिकॉर्ड और जांच के नतीजों के साथ देना चाहिए—ताकि किसी पात्र मतदाता का नाम न कटे और किसी गलत प्रविष्टि के सहारे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल न उठें।



