[the_ad id="179"]
Home » International » डिक्टेटर की टूलकिट! मीडिया पर कब्जा, फर्जी वोटरों का खेल, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग—फिर भी नहीं बचा सर्बिया का वुचिच!

डिक्टेटर की टूलकिट! मीडिया पर कब्जा, फर्जी वोटरों का खेल, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग—फिर भी नहीं बचा सर्बिया का वुचिच!

मोदी के प्रशंसक अलेक्जेंडर वुचिच को छात्र आंदोलन ने दिया झटका, सत्ता बचाने के कथित हथकंडों पर उठे सवाल

ओपिनियन/ अंतरराष्ट्रीय | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026

डिक्टेटर की टूलकिट दुनिया के कई देशों में एक जैसी दिखाई देती है। सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए मीडिया को अपने प्रभाव में लेना, चुनावी मैदान को विपक्ष के लिए मुश्किल बनाना, मतदाता सूची पर सवाल खड़े होना, सरकारी संसाधनों का राजनीतिक इस्तेमाल और सरकारी संस्थाओं में सत्ताधारी दल का दबदबा बढ़ाना—सर्बिया की राजनीति पर भी ऐसे ही गंभीर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन जनता हमेशा खामोश नहीं रहती। सर्बिया में करीब दो साल तक चले छात्र आंदोलन और भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों के बाद 25 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव में अलेक्जेंडर वुचिच के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन को हार स्वीकार करनी पड़ी। वुचिच ने खुद माना कि उनकी पार्टी चुनाव हार गई है और छात्र समर्थित ‘स्टूडेंट लिस्ट’ को जीत मिली है।

मोदी के प्रशंसक वुचिच की सत्ता को झटका

अलेक्जेंडर वुचिच 2014 में सर्बिया के प्रधानमंत्री बने और 2017 में राष्ट्रपति बने। एक दशक से अधिक समय तक वह सर्बियाई राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए वुचिच ने कहा था कि मोदी ने भारत को स्वर्ग बना दिया, लेकिन कुछ लोग उन्हें नीचे खींचने की कोशिश कर रहे हैं।

अब सवाल यह है कि किसी दूसरे देश के नेता की तारीफ करने से कोई नेता अपने देश में लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुक्त हो जाता है क्या? वुचिच की राजनीति पर मीडिया की स्वतंत्रता, चुनावी निष्पक्षता और सरकारी संस्थाओं के इस्तेमाल को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने भी सर्बिया के पिछले चुनावों में असमान चुनावी परिस्थितियों और सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल पर चिंता जताई थी।

डिक्टेटर की टूलकिट—पांच तरीके

1\. ब्रॉडकास्ट मीडिया पर दबदबा: जब टीवी और दूसरे बड़े मीडिया मंचों पर सत्ता पक्ष को ज्यादा जगह मिले और विपक्ष की आवाज कमजोर पड़े, तो मतदाताओं तक पहुंचने की बराबरी प्रभावित होती है।

2\. चुनावी मैदान को असमान बनाना: चुनाव केवल मतदान के दिन नहीं होता। प्रचार, मीडिया कवरेज, सरकारी प्रभाव और विपक्ष को मिलने वाले अवसर भी तय करते हैं कि मुकाबला कितना निष्पक्ष है।

3\. मतदाता सूची पर सवाल: सर्बिया में मतदाताओं के पते बदलने, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और संगठित मतदाता स्थानांतरण को लेकर शिकायतें उठती रही हैं। ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, क्योंकि मतदाता सूची पर भरोसा चुनाव की बुनियाद है।

4\. सरकारी संसाधनों का राजनीतिक इस्तेमाल: सरकारी धन, प्रशासनिक व्यवस्था और सार्वजनिक संस्थानों का इस्तेमाल यदि किसी दल के चुनावी फायदे के लिए हो, तो लोकतंत्र में बराबरी का सिद्धांत कमजोर पड़ता है।

5\. सरकारी संस्थाओं और सत्ताधारी दल की सीमाएं मिटना: जब प्रशासन और राजनीतिक संगठन के बीच की दूरी घटती है, तो संस्थाओं की निष्पक्षता और जवाबदेही पर सवाल खड़े होते हैं।

सर्बिया में चुनाव पर्यवेक्षकों और स्वतंत्र निगरानी संगठनों ने इनमें से कई मुद्दों पर गंभीर चिंताएं दर्ज की हैं। यही वजह है कि वुचिच की सत्ता को मिली हार केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि वर्षों से चल रही राजनीतिक खींचतान का बड़ा घटनाक्रम है।

छात्रों ने क्यों खोला मोर्चा?

नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन की छतरी गिरने से 16 लोगों की मौत हुई थी। इस हादसे के बाद भ्रष्टाचार, सरकारी जवाबदेही और सार्वजनिक निर्माण कार्यों में पारदर्शिता की मांग को लेकर छात्रों ने विरोध शुरू किया। आंदोलन धीरे-धीरे देशव्यापी हो गया और सरकार के खिलाफ व्यापक जनसमर्थन जुटाने लगा।

छात्रों का सवाल केवल किसी एक हादसे का जवाब मांगना नहीं था। वे जानना चाहते थे कि जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी, सरकारी फैसलों में पारदर्शिता कैसे आएगी और सत्ता से जवाब मांगने वालों की आवाज क्यों दबाई जाए।

सत्ता की ताकत भी जनता के फैसले को नहीं रोक सकी

वुचिच ने सितंबर में समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया था। लेकिन चुनाव को सत्ता की ताकत दिखाने का अवसर बनाने की जगह नतीजों ने उनके नेतृत्व को बड़ा झटका दिया। उनके अपने बयान के मुताबिक, शुरुआती आंकड़ों में छात्र समर्थित सूची को 135 से 140 सीटें मिलने का अनुमान था, जबकि उनके गठबंधन को 105 सीटों पर सिमटने की आशंका थी। अंतिम परिणामों की पुष्टि चुनावी प्रक्रिया के अनुसार होनी थी।

सर्बिया का घटनाक्रम एक बड़ा सवाल छोड़ता है: क्या चुनाव सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों की जीत का आयोजन है, या जनता को सरकार बदलने का वास्तविक अधिकार भी है?

मीडिया, सरकारी संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया पर उठने वाले सवाल किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। जहां भी सत्ता के सामने जवाबदेही कमजोर पड़ती है, वहां नागरिकों, छात्रों, पत्रकारों और स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।

वुचिच की हार से निकला संदेश साफ है—सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न दिखे, जनता के सवाल हमेशा के लिए दबाए नहीं जा सकते।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *