अंतरराष्ट्रीय/ विश्व राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 अक्टूबर 2026
एक तरफ इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता दांव पर है, दूसरी तरफ अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक ताकत की परीक्षा होने जा रही है। दोनों देशों के चुनाव भले ही हजारों किलोमीटर दूर हो रहे हों, लेकिन इनके नतीजों का असर पूरे पश्चिम एशिया से लेकर दुनिया की अर्थव्यवस्था तक पड़ सकता है। सबसे बड़ा सवाल है—क्या नेतन्याहू और ट्रंप अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए ईरान के खिलाफ युद्ध को और भड़काएंगे, या जनता के बढ़ते गुस्से के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ेगा?
इजरायल में 27 अक्टूबर को संसद की 120 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। इसके ठीक एक सप्ताह बाद, 3 नवंबर को अमेरिकी मतदाता कांग्रेस के लिए वोट डालेंगे। इन चुनावों के बीच सबसे खतरनाक कड़ी ईरान के साथ चल रहा युद्ध है, जिसने पश्चिम एशिया की सुरक्षा, तेल की आपूर्ति और आम लोगों की आर्थिक मुश्किलों को गहराई से प्रभावित किया है।
नेतन्याहू के लिए चुनाव या सत्ता बचाने की जंग?
नेतन्याहू चुनाव प्रचार में खुद को इजरायल की सुरक्षा के सबसे मजबूत नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद उनकी सुरक्षा नीति और नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठे थे। अब ईरान के परमाणु कार्यक्रम का खतरा बताकर वह फिर कठोर सैन्य कार्रवाई की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।
इस साल फरवरी में अमेरिका और इजरायल के बड़े हवाई हमलों ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और उसके नेतृत्व को भारी नुकसान पहुंचाया। लेकिन इतना बड़ा सैन्य अभियान भी ईरान की सत्ता को गिराने में सफल नहीं हुआ। इसके बाद ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई की और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति को अपने नियंत्रण में लेने की बात सामने आई।
यानी युद्ध ने सत्ता बदलने का लक्ष्य हासिल नहीं किया, लेकिन उसकी कीमत दुनिया की अर्थव्यवस्था और आम जनता को चुकानी पड़ रही है।
क्या चुनाव के बाद ईरान पर फिर हमला होगा?
इजरायल की राजनीति में इस आशंका पर चर्चा हो रही है कि नेतन्याहू चुनाव के बाद भी ईरान पर नए हमले का रास्ता तलाश सकते हैं। ऐसी अटकलें भी हैं कि यदि उनकी पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर पाती, तो वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी स्थिति का इस्तेमाल करके राष्ट्रीय एकता वाली सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसमें उन्हें खुद सत्ता में बने रहने का मौका मिले।
यह अभी एक राजनीतिक संभावना है, कोई तय फैसला नहीं। लेकिन सवाल गंभीर है—क्या युद्ध का फैसला देश की सुरक्षा के आधार पर होगा या सत्ता बचाने की जरूरत से प्रभावित हो सकता है?
नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने राष्ट्रीय एकता सरकार में शामिल होने से इनकार किया है। वह भी ईरान को इजरायल के लिए बड़ा खतरा मानते हैं और सैन्य कार्रवाई का समर्थन करते हैं, लेकिन उन्होंने राजनीतिक फायदे के लिए युद्ध बढ़ाने के खिलाफ चेतावनी दी है।
ट्रंप का दोहरा दबाव: युद्ध भी, महंगाई भी
अमेरिका में ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत है। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने से तेल की कीमतों पर दबाव पड़ा है। इसका असर ईंधन, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर पड़ सकता है।
ट्रंप नेतन्याहू के दोबारा चुने जाने का समर्थन कर चुके हैं। उन्होंने दोनों नेताओं के ईरान में अपना काम जल्द पूरा करने की बात भी कही है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आई हैं कि उन्होंने चुनाव से पहले इजरायल को नया हमला करने से रोकने की कोशिश की, क्योंकि इससे तेल की कीमतें बढ़ सकती थीं और अमेरिकी मतदाताओं की नाराजगी और गहरी हो सकती थी।
यही ट्रंप की सबसे बड़ी राजनीतिक मुश्किल है। वह ईरान के खिलाफ कठोर रुख दिखाना चाहते हैं, लेकिन युद्ध की आर्थिक कीमत का जवाब भी उन्हें अपने मतदाताओं को देना है।
चुनाव के बाद ट्रंप और खतरनाक हो सकते हैं?
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के बाद ट्रंप पर चुनावी दबाव कम हो सकता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वह अपनी विदेश नीति की विरासत मजबूत दिखाने के लिए ईरान पर फिर सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। उनका आकलन हो सकता है कि युद्ध और प्रतिबंधों से कमजोर हुई ईरान की अर्थव्यवस्था पर नए हमले सत्ता को भीतर से कमजोर कर देंगे।
लेकिन यही सोच पहले भी गंभीर सवालों के घेरे में रही है। सैन्य हमले किसी देश की सरकार को कमजोर कर सकते हैं, लेकिन इससे सत्ता का पतन निश्चित नहीं होता। उलटे, जवाबी हमले और लंबा संघर्ष पूरे क्षेत्र को अधिक अस्थिर बना सकते हैं।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने चेतावनी दी है कि नए हमले आम नागरिकों, क्षेत्रीय देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर खतरे में डाल सकते हैं। ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी ठिकानों और युद्धपोतों के अलावा ऊर्जा संयंत्रों, पाइपलाइनों, हवाई अड्डों, समुद्री केबलों और पानी साफ करने वाले संयंत्रों को भी संभावित निशाना बताया है।
यदि ऐसा हुआ, तो संकट सिर्फ इजरायल और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी देशों की सुरक्षा और दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति भी इसकी चपेट में आ सकती है।
अमेरिका में इजरायल को लेकर बदल रही है सोच
इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—अमेरिका में इजरायल को मिलने वाले समर्थन पर बढ़ती बहस। लंबे समय से दोनों देशों के बीच मजबूत राजनीतिक और सैन्य संबंध रहे हैं, लेकिन गाजा और ईरान युद्ध के बाद अमेरिकी राजनीति में इस समर्थन को लेकर मतभेद गहरे हुए हैं।
मिशिगन में डेमोक्रेटिक सीनेट उम्मीदवार अब्दुल अल-सईद इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता कम करने की मांग उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि अमेरिका को ऐसे युद्धों में नहीं उलझना चाहिए, जो उसके अपने हितों और जनता की जरूरतों के खिलाफ हों।
यदि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में अपनी ताकत बढ़ाती है, तो इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता और युद्ध पर खर्च को लेकर ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, राष्ट्रपति के पास विदेश नीति और सैन्य कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार बने रहेंगे।
आखिर कीमत कौन चुकाएगा?
इजरायल और अमेरिका में नेता अपनी सत्ता और राजनीतिक विरासत बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन युद्ध की सबसे भारी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। पश्चिम एशिया में लोगों की सुरक्षा, ऊर्जा की उपलब्धता और दुनिया भर में महंगाई का संकट इन फैसलों से जुड़ा है।
इन चुनावों का असली महत्व सिर्फ यह नहीं कि नेतन्याहू और ट्रंप कितनी राजनीतिक ताकत बचा पाते हैं। असली परीक्षा यह है कि क्या दोनों देश युद्ध को और फैलने से रोकेंगे या चुनावी फायदे और सत्ता की महत्वाकांक्षा दुनिया को एक नए संकट में धकेल देगी।
आने वाले दिनों में मतदाताओं का फैसला पश्चिम एशिया की दिशा, अमेरिका-इजरायल के रिश्तों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। लेकिन एक बात साफ है—अगर युद्ध को सत्ता बचाने का हथियार बनाया गया, तो उसका बिल नेताओं से ज्यादा आम जनता को चुकाना पड़ेगा।



