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मेडिकल कॉलेजों पर निगरानी के नियम वापस, मरीजों की सुरक्षा और जवाबदेही पर उठे सवाल

NMC ने 2023 के मेडिकल शिक्षा मानक विनियम वापस लिए; आयोग का दावा—प्रक्रियाओं का दोहराव खत्म होगा, चिकित्सा कार्यकर्ताओं ने नियामकीय निगरानी कमजोर होने की जताई चिंता

स्वास्थ्य | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 अक्टूबर 2026

देश में मेडिकल कॉलेजों की निगरानी, चिकित्सा शिक्षा के मानकों और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई को लेकर नई बहस छिड़ गई है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने मेडिकल शिक्षा के मानकों के रखरखाव से जुड़े 2023 के विनियम—Maintenance of Standards of Medical Education Regulations, 2023 (MSMER-2023)—को वापस ले लिया है। यह फैसला 17 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हो गया है।

इस कदम के बाद सवाल उठ रहे हैं कि मेडिकल कॉलेजों में निर्धारित मानकों का पालन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा, नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई किस व्यवस्था के तहत होगी और नियामक निगरानी कितनी प्रभावी रहेगी। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है कि नियमों को वापस लेने से निगरानी कमजोर हो सकती है और अंततः इसका असर मरीजों की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

दूसरी ओर, NMC का कहना है कि MSMER-2023 को वापस लेने का उद्देश्य प्रक्रियाओं में मौजूद दोहराव और एक-दूसरे से मिलती-जुलती व्यवस्थाओं को हटाना है। आयोग के अनुसार, मेडिकल कॉलेजों की जवाबदेही और निर्धारित मानकों के अनुपालन की प्रक्रिया राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 तथा अन्य लागू नियमों के तहत जारी रहेगी।

14 अक्टूबर की अधिसूचना से वापस हुए नियम

NMC ने 14 अक्टूबर 2026 को जारी अधिसूचना के माध्यम से MSMER-2023 को तत्काल प्रभाव से वापस लेने का फैसला किया। यह अधिसूचना 17 अक्टूबर को राजपत्र में प्रकाशित हुई। इस फैसले के साथ 2023 के इन विनियमों का नियामकीय ढांचा समाप्त हो गया।

हालांकि, इन नियमों की जगह कोई एक नया विनियमन लागू नहीं किया गया है। यही इस बदलाव का महत्वपूर्ण पहलू है। अब सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेजों की निगरानी और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई से संबंधित अलग-अलग प्रावधान किस तरह लागू किए जाएंगे और उनके बीच समन्वय कैसे सुनिश्चित होगा।

NMC के मुताबिक, मेडिकल कॉलेजों को वार्षिक प्रकटीकरण रिपोर्ट यानी Annual Disclosure Reports (ADRs) जमा करने की आवश्यकता बनी रहेगी। यह व्यवस्था राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 और अन्य लागू विनियमों के तहत जारी रहेगी।

वार्षिक रिपोर्ट में कॉलेजों की जानकारी और मानकों के अनुपालन से जुड़े विवरण नियामक के सामने रखने की व्यवस्था होती है। लेकिन रिपोर्ट जमा करना और उसमें दी गई जानकारी की स्वतंत्र रूप से जांच करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग उपलब्ध जानकारी का सत्यापन किस तरह करता है और कमियां सामने आने पर क्या कदम उठाता है।

नियम हटने से निगरानी पर क्या असर पड़ेगा?

मेडिकल शिक्षा के मानकों का सवाल सीधे डॉक्टरों के प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा है। मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की उपलब्धता, आवश्यक बुनियादी सुविधाएं, प्रशिक्षण की गुणवत्ता और निर्धारित शैक्षणिक मानकों का पालन महत्वपूर्ण है। इन व्यवस्थाओं में कमी का असर विद्यार्थियों की शिक्षा और भविष्य में मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सेवाओं पर पड़ सकता है।

इसी वजह से चिकित्सा क्षेत्र के कार्यकर्ता MSMER-2023 को वापस लेने के फैसले को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनकी चिंता है कि यदि निगरानी और कार्रवाई की प्रक्रिया पर्याप्त स्पष्ट नहीं रही, तो नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की जवाबदेही तय करना कठिन हो सकता है।

हालांकि, केवल नियम वापस लिए जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मेडिकल कॉलेजों की निगरानी पूरी तरह समाप्त हो गई है। NMC ने स्पष्ट किया है कि वार्षिक प्रकटीकरण रिपोर्ट और अन्य लागू नियमों के तहत अनुपालन की प्रक्रिया जारी रहेगी। असली सवाल यह है कि शेष व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होती है।

NMC के सामने पारदर्शिता की चुनौती

NMC को यह स्पष्ट करना होगा कि MSMER-2023 वापस लेने के बाद निरीक्षण, अनुपालन की जांच और उल्लंघनों पर कार्रवाई के लिए कौन-से प्रावधान लागू होंगे। मेडिकल कॉलेजों को नियमों का पालन न करने पर किन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ेगा, इसकी जानकारी भी स्पष्ट होनी चाहिए।

नियामक व्यवस्था का उद्देश्य केवल दस्तावेज जमा कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि संस्थान वास्तव में निर्धारित मानकों पर खरे उतरें। यदि किसी कॉलेज में आवश्यक सुविधाओं या शैक्षणिक व्यवस्था की कमी पाई जाती है, तो उस पर समयबद्ध कार्रवाई और सुधार की निगरानी जरूरी है।

इसके साथ ही, मेडिकल कॉलेजों को भी निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार मिलना चाहिए। नियम स्पष्ट हों, निरीक्षण के मानक समान हों और कार्रवाई के आधार सार्वजनिक रूप से समझाए जा सकें, ताकि नियामक व्यवस्था भरोसेमंद बनी रहे।

मरीजों की सुरक्षा सर्वोपरि

मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। आज मेडिकल कॉलेजों में प्रशिक्षण पाने वाले विद्यार्थी ही भविष्य में अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों का इलाज करेंगे। इसलिए शिक्षा के मानकों पर निगरानी किसी औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

NMC का कहना है कि नियमों का दोहराव हटाने से प्रक्रियाएं सरल होंगी। लेकिन इस बदलाव की सफलता इस बात से तय होगी कि क्या मेडिकल कॉलेजों के लिए जवाबदेही कायम रहती है, उल्लंघनों की पहचान प्रभावी ढंग से होती है और मरीजों के हितों की रक्षा के लिए समय पर कार्रवाई की जाती है।

फिलहाल, MSMER-2023 की वापसी ने नियामकीय व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में यह महत्वपूर्ण होगा कि NMC शेष नियमों के क्रियान्वयन, निगरानी और उल्लंघनों पर कार्रवाई के बारे में कितनी स्पष्टता और पारदर्शिता दिखाता है।

मेडिकल शिक्षा के नियमों में बदलाव का अंतिम पैमाना प्रक्रियाओं को सरल बनाना भर नहीं, बल्कि डॉक्टरों की शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।

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