राष्ट्रीय/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 अक्टूबर 2026
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव की मांग पर 13 दिनों से छात्र आमरण अनशन कर रहे हैं, लेकिन चुनाव की तारीख घोषित करने के बजाय प्रशासन ने कक्षाएं ऑनलाइन कर दीं, लाइब्रेरी और कैंटीन बंद कर दीं तथा सभी गेट बंद रखने का आदेश जारी कर दिया। हॉस्टल खाली कराने की बात सामने आ रही है और परिसर के बाहर ITBP की तैनाती की खबरें हैं। छात्रों की मांग का जवाब पाबंदियों, दबाव और टकराव से देने वाले विश्वविद्यालय प्रशासन की जवाबदेही तय होनी चाहिए। VC प्रोफेसर मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी को तत्काल बर्खास्त किया जाए। सरकार हस्तक्षेप करे और नई प्रशासनिक व्यवस्था के तहत छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया शुरू कराए। छात्रों का सवाल है—वे अपने लोकतांत्रिक अधिकार मांग रहे हैं या कोई अपराध कर रहे हैं, जिसके जवाब में उनकी पढ़ाई, भोजन, पुस्तकालय और परिसर तक पहुंच पर ताले लगाए जा रहे हैं?
छात्रों का आरोप है कि उन्हें 13 और 15 दिसंबर की पुलिस कार्रवाई की याद दिलाकर दोबारा पुलिस बुलाने की धमकी दी गई। अमान अली शाह पर भी छात्रों को डराने का गंभीर आरोप है। शनिवार को हंगामे के बीच जब रजिस्ट्रार महताब आलम रिज़वी छात्रों के सामने आए, तो आरोप है कि समाधान निकालने के बजाय उन्होंने धमकी भरा रवैया अपनाया। इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने की बात सामने आई है। इसी बीच एडवोकेट आरफा खानम ने VC मज़हर आसिफ को खुली चेतावनी दी है। सामने आई तस्वीर में उनके बयान के मुताबिक, “छात्रों का मामला कैंपस में रहने दो। पुलिस को बीच में लाए, तो हम अखिल भारतीय स्तर पर सड़क पर उतरेंगे!” उनका संदेश साफ है—छात्रों के आंदोलन में पुलिस को बीच में लाकर दबाव बनाने की कोशिश हुई, तो विरोध कैंपस से बाहर भी पहुंचेगा।
इसके साथ ही, प्रशासन से जुड़े लोगों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि VC मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार महताब आलम रिज़वी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और सरकार का नाम लेकर लोगों को धमकाते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आरोप यह भी है कि संघ में इन दोनों की कोई पूछ नहीं है और वे संघ तथा सरकार का नाम लेकर उन्हें बदनाम कर रहे हैं। जामिया में उठ रहे इन सवालों का जवाब अब जरूरी है। 13 दिन से भूखे छात्रों को और आश्वासन नहीं, चुनाव की तारीख चाहिए। धमकी, दबाव और प्रशासनिक कार्रवाई के आरोपों की जांच हो। छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। सरकार VC और रजिस्ट्रार की जवाबदेही तय करे और उन्हें पद से हटाने का फैसला ले।
तालीम पर ताला, लाइब्रेरी-कैंटीन बंद, सभी गेट बंद करने का आदेश
24 अक्टूबर को रजिस्ट्रार कार्यालय की ओर से जारी नोटिस में सभी पाठ्यक्रमों की कक्षाएं तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक ऑनलाइन संचालित करने का फैसला किया गया। इसके बाद विश्वविद्यालय की कैंटीन और लाइब्रेरी बंद रखने तथा सभी गेट बंद रखने का आदेश भी सामने आया।
जिस विश्वविद्यालय का काम शिक्षा देना है, वहां छात्रों को लाइब्रेरी और कैंटीन से दूर कर दिया गया। पढ़ाई के लिए परिसर आने वाले छात्रों के सामने नई मुश्किलें खड़ी कर दी गईं। छात्र संघ चुनाव की मांग का जवाब क्या यही है कि विश्वविद्यालय की सामान्य शैक्षणिक सुविधाएं ही बंद कर दी जाएं?
हॉस्टल खाली कराने की बात भी सामने आ रही है। यदि छात्रों को हॉस्टल छोड़ने के लिए कहा जा रहा है, तो सवाल है कि दूर-दराज से पढ़ने आए छात्र अचानक कहां जाएंगे, उनके भोजन और रहने की व्यवस्था कौन करेगा और उनकी पढ़ाई का क्या होगा? प्रशासन को हॉस्टल संबंधी आदेश और अपनी मंशा साफ करनी चाहिए।
छात्रों का सवाल सीधा है—चुनाव की मांग का जवाब कैंपस बंद करके क्यों दिया जा रहा है? ऑनलाइन कक्षाएं छात्र संघ चुनाव का विकल्प नहीं हैं। लाइब्रेरी और कैंटीन बंद करना छात्रों की लोकतांत्रिक मांग का समाधान नहीं है।
13 दिन से भूख हड़ताल, फिर भी चुनाव की तारीख नहीं
जामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर आंदोलन 12 अक्टूबर को शुरू हुआ था। 24 अक्टूबर को पांच छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल 13वें दिन में पहुंच गई। उनकी प्रमुख मांग जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन (JMISU) को बहाल करना और चुनाव की आधिकारिक समयसीमा घोषित करना है।
छात्रों का कहना है कि 2006 में छात्र संघ भंग किए जाने के बाद से नियमित छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं। करीब दो दशक से निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व का अभाव है। छात्र अपने प्रतिनिधि चुनना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अब तक चुनाव की निश्चित तारीख नहीं मिली है।
आंदोलनकारी छात्र निलंबन, निष्कासन और शो-कॉज नोटिस जैसी कार्रवाइयों को वापस लेने तथा चीफ प्रॉक्टर को हटाने की मांग भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग पर कार्रवाई करने के बजाय प्रशासन को बातचीत करनी चाहिए।
13 दिन से छात्र भूखे बैठे हैं। यह केवल चुनाव की मांग नहीं, विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही का सवाल है। आखिर प्रशासन छात्रों को और कितने दिन इंतजार कराना चाहता है?
VC और रजिस्ट्रार की जवाबदेही तय हो, कुर्सी से हटाओ
वाइस चांसलर प्रोफेसर मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी के कार्यकाल में छात्र संघ चुनाव का विवाद इस स्तर तक पहुंच गया है। जब छात्र 13 दिनों से आमरण अनशन पर हैं, तब प्रशासन की जिम्मेदारी थी कि वह उनकी मांग पर स्पष्ट निर्णय लेता। इसके बजाय परिसर में टकराव बढ़ा और शैक्षणिक सुविधाएं बंद करने के आदेश सामने आए।
24 अक्टूबर को रजिस्ट्रार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए कमेटी बनाई गई है। उनके अनुसार, छात्रों द्वारा संविधान का मसौदा सौंपे जाने के बाद चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाएगा। उन्होंने अनुशासनात्मक कार्रवाई की समीक्षा करने और निर्दोष पाए जाने वाले छात्रों को बहाल करने की बात भी कही।
लेकिन सवाल है—जब छात्र संघ चुनाव की मांग करीब दो दशक से लंबित है, तो चुनाव की समयसीमा तय करने में और कितना वक्त लगेगा? कमेटी बनाने का ऐलान चुनाव की तारीख नहीं है। आश्वासन से भूख हड़ताल खत्म नहीं होती और न ही छात्रों की लोकतांत्रिक मांग का समाधान निकलता है।
VC और रजिस्ट्रार की भूमिका की जांच होनी चाहिए। छात्रों के आरोपों, परिसर में लिए गए फैसलों और सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही तय की जाए। सरकार को दोनों अधिकारियों को पद से हटाने पर फैसला लेना चाहिए, ताकि नई प्रशासनिक व्यवस्था में छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ सके।
प्रशासन पर संघ और सरकार का नाम लेकर धमकाने के आरोप
जामिया प्रशासन से जुड़े लोगों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि VC प्रोफेसर मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और सरकार का नाम लेकर लोगों को धमकाते हैं। आरोप है कि वे लोगों को यह संदेश देते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
आरोप लगाने वालों का कहना है कि संघ में इन दोनों अधिकारियों की कोई पूछ नहीं है, फिर भी वे संघ और सरकार का नाम लेकर अपना प्रभाव दिखाते हैं और उन्हें बदनाम कर रहे हैं। आरोप यह भी है कि संघ तथा सरकार का नाम लेकर लोगों पर दबाव बनाने की कोशिश की जाती है, मानो इन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हो ही नहीं सकती।
किसी संगठन या सरकार का नाम लेकर जवाबदेही से बचने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। कोई पद किसी को मनमानी का लाइसेंस नहीं देता। संघ और सरकार का नाम लेकर लोगों को डराने के आरोपों पर जवाब मांगा जाना चाहिए और इस मामले की जांच होनी चाहिए।
जामिया में छात्रों की मांग का जवाब चुनाव की तारीख से दिया जाना चाहिए, न कि ताकत या राजनीतिक पहुंच का प्रदर्शन करके। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या किसी अधिकारी को किसी संगठन का नाम लेकर लोगों को धमकाने की छूट है।
आंदोलन स्थल पर टकराव, टेंट हटाने की कोशिश और छात्रों के आरोप
24 अक्टूबर को विश्वविद्यालय के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की बैठक के बाद आंदोलन स्थल पर तनाव बढ़ गया। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कुलपति, रजिस्ट्रार और कर्मचारियों ने छात्रों से धरना समाप्त करने तथा आंदोलन स्थल खाली करने की अपील की। इसके बाद छात्रों और विश्वविद्यालय कर्मियों के बीच नोकझोंक हुई।
छात्र संगठनों का आरोप है कि भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के टेंट हटाने और उन्हें आंदोलन स्थल से हटाने की कोशिश की गई। छात्रों ने सुरक्षाकर्मियों पर बल प्रयोग और छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार के आरोप भी लगाए हैं। कुछ छात्र संगठनों ने छात्राओं का हिजाब खींचे जाने और उन्हें घसीटने की शिकायत की है।
छात्रों का आरोप है कि वे अपनी लोकतांत्रिक मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे, लेकिन उनके आंदोलन को खत्म कराने के लिए दबाव बनाया गया। भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के टेंट हटाने और उनके साथ बल प्रयोग की शिकायतें गंभीर सवाल खड़े करती हैं। जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
छात्रों को आंदोलन स्थल से हटाने की कोशिश और छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन को जवाब देना होगा कि विरोध कर रहे छात्रों के साथ क्या हुआ और परिसर में सुरक्षा व्यवस्था संभालने वालों की भूमिका क्या थी।
अमान अली शाह पर छात्रों को धमकाने का आरोप
जामिया में आंदोलन के बीच DISSC की ओर से जारी बयान में रजिस्ट्रार कार्यालय के DIDS और प्रॉपर्टी सेक्शन से जुड़े अमान अली शाह पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
DISSC के बयान के मुताबिक, छात्रों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान अमान अली शाह ने 13 और 15 दिसंबर की घटनाओं का हवाला देते हुए छात्रों से पूछा कि क्या वे उन दिनों को दोबारा देखना चाहते हैं। बयान में आरोप लगाया गया कि उन्होंने पुलिस के परिसर में आने और छात्रों से निपटने की धमकी भी दी।
13 और 15 दिसंबर की घटनाओं की याद दिलाकर छात्रों को डराने का आरोप बेहद गंभीर है। छात्र चुनाव मांग रहे हैं, ऐसे में उन्हें पुरानी पुलिस कार्रवाई की याद दिलाकर दबाव में लेने की कोशिश क्यों की जा रही है? क्या विश्वविद्यालय में छात्रों की आवाज का जवाब धमकी से दिया जाएगा?
DISSC ने अमान अली शाह के बयान और आचरण की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच कराने तथा कानून के अनुसार अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की मांग की है। विश्वविद्यालय प्रशासन को इस मामले में जवाब देना चाहिए। छात्रों को डराने और पुलिस कार्रवाई की धमकी देने के आरोपों की जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
आरफा खानम की खुली चेतावनी—पुलिस को बीच में लाए तो सड़क पर उतरेंगे
जामिया में जारी तनाव के बीच एडवोकेट आरफा खानम ने VC प्रोफेसर मज़हर आसिफ को खुली चेतावनी दी है। सामने आई तस्वीर में उनके बयान के मुताबिक, “छात्रों का मामला कैंपस में रहने दो। पुलिस को बीच में लाए, तो हम अखिल भारतीय स्तर पर सड़क पर उतरेंगे!”
आरफा खानम का यह बयान प्रशासन के लिए सीधी चुनौती है। छात्र संघ चुनाव की मांग कर रहे हैं। ऐसे में आंदोलन को बातचीत से सुलझाने के बजाय पुलिस को बीच में लाने की कोई भी कोशिश हालात को और भड़का सकती है। छात्रों की मांग पर फैसला लेने के बजाय यदि पुलिस की मौजूदगी और दबाव बढ़ता है, तो विरोध कैंपस से बाहर भी जा सकता है।
VC को जवाब देना चाहिए कि छात्र संघ चुनाव की मांग का समाधान निकालने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने की मांग करने पर डर और दबाव का सामना क्यों करना पड़ रहा है? आरफा खानम की चेतावनी साफ है—छात्रों के मामले को पुलिस के हवाले करके दबाने की कोशिश हुई, तो सड़क पर विरोध होगा।
छात्रों की आवाज का जवाब चुनाव की तारीख से दिया जाए, पुलिस के दबाव से नहीं। जामिया में टकराव बढ़ाने के बजाय संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
हॉस्टल खाली कराने की बात पर प्रशासन स्पष्ट करे
कक्षाएं ऑनलाइन करने, लाइब्रेरी-कैंटीन बंद करने और सभी गेट बंद रखने के फैसले के बीच हॉस्टल खाली कराने की बात ने छात्रों की चिंता बढ़ा दी है। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या हॉस्टल खाली कराने का औपचारिक आदेश जारी किया गया है और यदि हां, तो उसके पीछे क्या कारण हैं।
यदि छात्रों को हॉस्टल छोड़ने के लिए कहा जा रहा है, तो उन्हें लिखित आदेश, पर्याप्त समय और रहने की वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए। दूर-दराज के राज्यों से आए छात्रों के लिए अचानक हॉस्टल छोड़ना उनकी पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर गंभीर असर डाल सकता है।
कैंटीन बंद होने के बीच भोजन की व्यवस्था और हॉस्टल खाली कराने की स्थिति में रहने की व्यवस्था कौन करेगा? प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। छात्रों की बुनियादी जरूरतों को संकट में डालकर आंदोलन खत्म कराने की कोशिश किसी भी हाल में स्वीकार नहीं की जा सकती।
जामिया के बाहर ITBP की तैनाती, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
जामिया परिसर के बाहर ITBP की तैनाती की तस्वीरें और जानकारी सामने आई हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में परिसर के बाहर सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने सवाल खड़े किए हैं। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि ITBP की तैनाती किस आदेश पर और किस उद्देश्य से की गई है।
जब विवाद की जड़ छात्र संघ चुनाव की मांग है, तो समाधान बातचीत और चुनाव की समयसीमा घोषित करने से निकलेगा या सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाने से? छात्रों को अपनी मांग उठाने का अधिकार है। सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर ऐसा माहौल नहीं बनना चाहिए जिसमें छात्र अपनी बात रखने से डरें।
सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। छात्रों, छात्राओं, शिक्षकों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी छात्र के साथ दुर्व्यवहार, धमकी या अनुचित बल प्रयोग की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।
भारत-विरोधी नारे किसने लिखे? CCTV फुटेज सामने लाओ
23 अक्टूबर को जामिया परिसर की दीवारों पर ‘फ्री कश्मीर’ और ‘फ्री शरजील इमाम’ जैसे नारे लिखे जाने की खबरें सामने आईं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन नारों की निंदा की है। रजिस्ट्रार ने आरोप लगाया कि कुछ अनधिकृत लोग परिसर में दाखिल हुए थे।
दूसरी ओर, छात्र आंदोलन से जुड़े लोगों ने इन नारों को लिखने में अपनी भूमिका से इनकार किया है और CCTV फुटेज की जांच कराने की मांग की है। उनकी मांग है कि छात्र संघ चुनाव की लड़ाई को दीवारों पर लिखे नारों के साथ जोड़कर पूरे आंदोलन को बदनाम न किया जाए और वास्तविक जिम्मेदार लोगों की पहचान की जाए।
सवाल साफ हैं—जब परिसर में सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी, तो दीवारों पर नारे लिखने वाले लोग वहां तक कैसे पहुंचे? CCTV कैमरे काम कर रहे थे, तो फुटेज सामने क्यों नहीं लाई जाती? यदि संबंधित स्थानों पर कैमरे खराब थे, तो उनकी निगरानी और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी?
प्रशासन CCTV फुटेज और प्रवेश-निकास रिकॉर्ड सुरक्षित रखे। दीवारों पर नारे लिखने वालों की पहचान सबूतों के आधार पर की जाए। भारत-विरोधी नारे लिखने वाला कोई भी व्यक्ति हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इन नारों को आधार बनाकर छात्र संघ चुनाव की मांग कर रहे छात्रों को निशाना बनाना भी बंद होना चाहिए।
छात्र संघ के साथ टीचर्स यूनियन के चुनाव भी जरूरी
जामिया में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की बहाली केवल छात्र संघ चुनाव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शिक्षकों के लिए भी टीचर्स यूनियन के चुनाव का रास्ता खोला जाना चाहिए। छात्र अपने प्रतिनिधि चुनें और शिक्षक अपने प्रतिनिधि—यही एक स्वस्थ विश्वविद्यालय की पहचान है।
शिक्षकों की स्वतंत्र आवाज और निर्वाचित प्रतिनिधित्व शैक्षणिक संस्थान को मजबूत करता है। प्रशासन को छात्र संघ और टीचर्स यूनियन, दोनों के चुनावों के लिए स्पष्ट समयसीमा घोषित करनी चाहिए। जामिया में लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली आधी-अधूरी नहीं होनी चाहिए।
छात्रों और शिक्षकों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। विश्वविद्यालय में निर्णय लेने की प्रक्रिया जवाबदेह होनी चाहिए। लोकतंत्र की बात केवल भाषणों में नहीं, संस्थान की व्यवस्था में भी दिखाई देनी चाहिए।
छात्राओं की सुरक्षा और सिक्योरिटी सिस्टम की जवाबदेही
आंदोलन के दौरान छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार, उन्हें घसीटने और हिजाब खींचने के आरोप सामने आए हैं। इन आरोपों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। किसी भी सुरक्षाकर्मी को अपनी वर्दी के दम पर छात्राओं की गरिमा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है।
एक छात्रा को पुरुषों के टॉयलेट का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ा—यह शिकायत भी छात्र कल्याण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। स्टूडेंट वेलफेयर डीन को बताना चाहिए कि छात्राओं की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था है और ऐसी शिकायतें सामने आने पर क्या कार्रवाई की गई।
मौजूदा सिक्योरिटी सिस्टम की भूमिका की तत्काल समीक्षा होनी चाहिए। जिन सुरक्षाकर्मियों या अधिकारियों पर गंभीर दुर्व्यवहार और लापरवाही के आरोप हैं, उनकी भूमिका की जांच की जाए। शिकायतें सही पाए जाने पर उन्हें ड्यूटी से हटाने, निलंबित करने और नियमानुसार कठोर कार्रवाई करने का फैसला लिया जाए।
छात्रों के फोन जब्त किए जाने और कानूनी सहायता लेने में बाधा पहुंचाने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि छात्रों के फोन किस आधार पर लिए गए और क्या उन्हें अपनी शिकायतों के लिए स्वतंत्र कानूनी सहायता लेने की अनुमति दी जा रही है। सुरक्षा के नाम पर छात्रों के अधिकार कुचले नहीं जा सकते।
अब सरकार को फैसला करना होगा
जामिया में छात्र 13 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं। ऑनलाइन कक्षाएं, बंद लाइब्रेरी, बंद कैंटीन, सभी गेट बंद रखने का आदेश, हॉस्टल खाली कराने की चर्चा, परिसर के बाहर ITBP की तैनाती और छात्रों के साथ टकराव—इन घटनाओं ने संकट को और गहरा कर दिया है। रजिस्ट्रार के साथ टकराव और धमकी देने के आरोपों के बीच एडवोकेट आरफा खानम की खुली चेतावनी ने भी यह साफ कर दिया है कि छात्रों के आंदोलन में पुलिस को बीच में लाने की कोशिश हुई, तो विरोध कैंपस से बाहर तक जा सकता है।
VC मज़हर आसिफ और रजिस्ट्रार महताब आलम रिज़वी की भूमिका की जांच होनी चाहिए। सरकार को उनकी जवाबदेही तय करते हुए दोनों को पद से हटाने पर फैसला लेना चाहिए। विश्वविद्यालय को ऐसी नई प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है जिसमें छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया समयबद्ध ढंग से आगे बढ़े और छात्रों की शिकायतों को दबाने के बजाय सुना जाए।
अमान अली शाह पर छात्रों को धमकाने के आरोपों की जांच हो। छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। CCTV फुटेज और सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति सामने लाई जाए। दीवारों पर नारे लिखने वालों की पहचान करके कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। हॉस्टल खाली कराने का कोई आदेश है तो उसे सार्वजनिक किया जाए और छात्रों की रहने, भोजन तथा पढ़ाई की व्यवस्था स्पष्ट की जाए।
मज़हर आसिफ और महताब आलम रिज़वी पर संघ और सरकार का नाम लेकर लोगों को धमकाने के जो आरोप सामने आए हैं, उनकी भी जांच होनी चाहिए। आरोप है कि दोनों अपने कथित प्रभाव का हवाला देकर लोगों को यह जताते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह भी आरोप है कि संघ में उनकी कोई पूछ नहीं है और वे संघ तथा सरकार का नाम लेकर उन्हें बदनाम कर रहे हैं। इन आरोपों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी अधिकारी को किसी संगठन या सरकार का नाम लेकर लोगों पर दबाव बनाने या अपने पद को मनमानी का हथियार बनाने का अधिकार नहीं है।
जामिया किसी VC, रजिस्ट्रार, अधिकारी या सिक्योरिटी एजेंसी की निजी जागीर नहीं है। यह एक सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थान है। यहां छात्रों और शिक्षकों के लोकतांत्रिक अधिकारों, छात्राओं की गरिमा और शैक्षणिक स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।
छात्र संघ चुनाव की तारीख घोषित करो। टीचर्स यूनियन चुनाव का रास्ता खोलो। 13 दिन से भूखे छात्रों की मांग का जवाब दो। हॉस्टल, कैंटीन और लाइब्रेरी से जुड़े फैसलों पर स्थिति स्पष्ट करो। धमकी, दुर्व्यवहार और बल प्रयोग के आरोपों की जांच कराओ। सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही तय करो। VC और रजिस्ट्रार की भूमिका पर फैसला लो। जामिया को तालीम का केंद्र बनाओ, टकराव का मैदान नहीं। छात्रों की आवाज दबाना बंद करो। लोकतंत्र बहाल करो!



