केरलम | ABC NATIONAL NEWS | तिरुवनंतपुरम | 23 अक्टूबर 2026
केरलम के नए राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर के एक फैसले ने राज्य में खानपान, सामाजिक विविधता और ‘खाने की शुद्धता’ की राजनीति पर बहस छेड़ दी है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को राज्यपाल पद की शपथ लेने वाले माथुर ने लोक भवन की रसोई में मांसाहारी भोजन पकाने पर रोक लगा दी है। राजस्थान से आने वाले माथुर सख्त शाकाहारी हैं और उनकी व्यक्तिगत खानपान की पसंद को इस फैसले की वजह बताया जा रहा है।
यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि केरलम जैसे विविध खानपान और सांस्कृतिक परंपराओं वाले राज्य में भोजन केवल निजी पसंद का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और परंपराओं से भी जुड़ा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि किसी व्यक्ति की शाकाहारी जीवनशैली का सम्मान करते हुए क्या पूरे सरकारी परिसर की रसोई में मांसाहारी भोजन बनाने पर रोक लगाना उचित है?
निजी पसंद बनाम सरकारी संस्थान
शाकाहार अपनाना किसी व्यक्ति का निजी अधिकार है। कोई भी व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर भोजन चुन सकता है। लेकिन जब यही पसंद किसी सार्वजनिक संस्थान की व्यवस्था को प्रभावित करती है, तो मामला निजी दायरे से आगे बढ़ जाता है।
लोक भवन राज्यपाल का आधिकारिक निवास और कार्यालय है। यहां काम करने वाले कर्मचारियों तथा अन्य लोगों की खानपान संबंधी जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए रसोई में मांसाहारी भोजन पर रोक के फैसले को लेकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संस्थान की व्यवस्था सभी की जरूरतों और पसंद का ध्यान रखेगी।
केरलम में ‘खाने की शुद्धता’ पर बहस
केरलम में भोजन की परंपराएं विविध हैं। यहां शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों तरह के व्यंजन आम खानपान का हिस्सा हैं। ऐसे राज्य में सरकारी परिसर की रसोई से मांसाहारी भोजन हटाने का फैसला सामाजिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है।
‘खाने की शुद्धता’ की राजनीति का सवाल तब उठता है, जब किसी एक खानपान की आदत को दूसरी आदत से बेहतर या अधिक स्वीकार्य मानने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि राज्यपाल ने किसी समुदाय या खानपान परंपरा को नीचा दिखाने के उद्देश्य से यह फैसला लिया है। फिर भी, फैसले का सार्वजनिक संस्थान पर असर और उसकी व्यावहारिक वजहें चर्चा का विषय हैं।
क्या सरकारी परिसर में सबकी पसंद का ध्यान जरूरी नहीं?
लोक भवन जैसी सरकारी जगहों पर व्यवस्था तय करते समय यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि कर्मचारियों और वहां आने वाले लोगों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी। राज्यपाल की व्यक्तिगत पसंद का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि क्या रसोई में सभी के लिए भोजन के विकल्प उपलब्ध होने चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति के लिए शाकाहारी भोजन की अलग व्यवस्था की जा सकती है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या पूरे परिसर में मांसाहारी भोजन पर रोक लगाए बिना उनकी पसंद का सम्मान किया जा सकता है। इस मुद्दे पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले लोक भवन के नियमों, कर्मचारियों की व्यवस्था और फैसले के आधिकारिक आधार की जानकारी भी जरूरी है।
फैसले से उठे बड़े सवाल
ओम प्रकाश माथुर भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे हैं और राजस्थान से आते हैं। राज्यपाल के रूप में उनके इस फैसले ने निजी खानपान की पसंद और सार्वजनिक संस्थान की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन पर सवाल खड़े किए हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी की भोजन संबंधी पसंद का मजाक उड़ाना या उसे कमतर आंकना उचित नहीं है। उसी तरह, किसी एक व्यक्ति की पसंद को पूरे सरकारी परिसर की व्यवस्था का आधार बनाने पर सवाल पूछना भी स्वाभाविक है।
अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि लोक भवन में भोजन की व्यवस्था किस तरह तय की गई और क्या उसमें वहां काम करने वाले लोगों की विविध जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा। राज्यपाल की शाकाहारी पसंद व्यक्तिगत है, लेकिन सरकारी संस्थान की नीति का प्रभाव उससे कहीं व्यापक हो सकता है। यही वजह है कि यह फैसला केरलम में ‘खाने की शुद्धता’ और सार्वजनिक संस्थानों में विविधता के सम्मान पर चर्चा का विषय बन गया है।



