राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 8 अक्टूबर 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर आज चल रही राजनीतिक बहस कोई नई बहस नहीं है। इसकी जड़ें संविधान निर्माण के दौर तक जाती हैं। करीब 77 साल पहले, 15 जून 1949 को संविधान सभा में एक ऐसी चेतावनी दर्ज हुई थी, जो आज चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच फिर प्रासंगिक हो गई है। संविधान सभा के सदस्य शिब्बन लाल सक्सेना ने उस समय इस बात पर चिंता जताई थी कि अगर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार सरकार के प्रभाव में रहा, तो सत्ता में बैठी पार्टी पर अपने चुनावी मुकाबले के ‘रेफरी’ को प्रभावित करने का आरोप लग सकता है।
संविधान के मसौदे में उस समय यह प्रावधान था कि भारत के चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे। लेकिन संविधान सभा में बहस के दौरान यह सवाल उठा कि संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति आम तौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। ऐसे में नियुक्ति की वास्तविक प्रक्रिया सरकार के प्रभाव में आ सकती है। शिब्बन लाल सक्सेना ने इसी संभावित स्थिति को लेकर चेतावनी दी थी कि सत्ता में मौजूद कोई राजनीतिक दल अपने हित में ऐसे व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सकता है जो उसके प्रति राजनीतिक रूप से झुका हुआ हो।
यह बहस केवल किसी व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे बड़ा सवाल था—चुनाव कराने वाली संस्था कितनी स्वतंत्र दिखाई देती है? लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका इसलिए असाधारण है क्योंकि वही चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करता है, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए नियम लागू करता है और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने वाली संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए आयोग की निष्पक्षता केवल वास्तविक रूप से नहीं, बल्कि जनता की नजर में भी दिखाई देनी चाहिए।
आज मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। SIR यानी Special Intensive Revision के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष का आरोप है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल हैं। विपक्षी दल इसी मुद्दे को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर बहस को राजनीतिक केंद्र में ले आए हैं। चुनाव आयोग और सरकार की ओर से अपनी प्रक्रिया और संवैधानिक भूमिका को लेकर जवाब दिए जाते रहे हैं।
मौजूदा विवाद का मूल प्रश्न इसलिए सिर्फ यह नहीं है कि किसी विशेष चुनाव आयुक्त ने क्या फैसला लिया या किसी विशेष राजनीतिक दल ने क्या आरोप लगाया। असली सवाल नियुक्ति की उस व्यवस्था का है, जिसके जरिए देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक चुनावी संस्था के शीर्ष अधिकारियों का चयन होता है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो उसके पीछे पारदर्शिता और संस्थागत संतुलन भी दिखाई देना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल उनके फैसलों से नहीं, बल्कि उन फैसलों तक पहुंचने वाली प्रक्रिया से भी बनती है।
संविधान सभा की बहस में उठी चिंता आज इसलिए महत्वपूर्ण दिखाई देती है क्योंकि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर जब भी राजनीतिक विवाद पैदा होता है, चर्चा वापस उसी बुनियादी सवाल पर पहुंचती है—चुनाव का रेफरी किस तरह चुना जाए कि किसी पक्ष को उसके पक्षपाती होने का संदेह भी न रहे?
एक मजबूत लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष चुनाव कराना पर्याप्त नहीं होता। चुनाव कराने वाली संस्था को राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र दिखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नियुक्ति प्रक्रिया जितनी पारदर्शी और व्यापक संस्थागत सहमति पर आधारित होगी, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को उतना ही बल मिलेगा। इसके विपरीत यदि नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर लगातार राजनीतिक विवाद बना रहे, तो संस्था के हर फैसले पर संदेह की राजनीति हावी होने का खतरा बढ़ सकता है।
संविधान सभा के सदस्य शिब्बन लाल सक्सेना की 1949 की चेतावनी आज फिर इसलिए याद की जा रही है क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ मतदान का दिन नहीं होता, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का नाम है जिसमें मतदाता को भरोसा हो कि उसका वोट सुरक्षित है, चुनाव कराने वाला संस्थान निष्पक्ष है और सत्ता तथा विपक्ष दोनों के लिए नियम एक समान हैं। यही भरोसा चुनावी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है।



