राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने मतदाता अधिकारों और नागरिकता को लेकर बेहद कड़ा संवैधानिक संदेश दिया है। हैदराबाद में 19वें NALSAR-Justice B.R. Sawhney Memorial Moot Court Competition के समापन समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी प्रशासनिक कदम, जिसके कारण लाखों भारतीय नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएं और अपने ही देश में “दूसरे दर्जे के नागरिक” जैसा महसूस करें, स्वभावतः मनमाना होगा। उन्होंने साफ कहा कि इस तरह की कार्रवाई को किसी भी तरह के तर्क से जायज नहीं ठहराया जा सकता और संविधान ऐसी व्यवस्था की कल्पना नहीं करता जिसमें नागरिकों को वोट देने वाले और वोट से वंचित नागरिकों की दो श्रेणियों में बांट दिया जाए।
सवाल सिर्फ वोटर लिस्ट का नहीं, नागरिक की बराबरी का है
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में मतदान के अधिकार को महज एक सामान्य कानूनी अधिकार मानने से आगे जाकर इसे नागरिकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा कि नागरिकता और मताधिकार को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, संविधान निर्माताओं ने देश के हर वयस्क नागरिक को बराबर राजनीतिक आवाज देने का फैसला उस समय किया था जब भारत में व्यापक अशिक्षा और सामाजिक-आर्थिक असमानता मौजूद थी। यह फैसला सामान्य नागरिक पर संविधान के भरोसे का प्रतीक था। उन्होंने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के उस विचार का भी उल्लेख किया जिसमें राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच मौजूद विरोधाभास की ओर संकेत किया गया था। जस्टिस भुइयां ने कहा कि “एक व्यक्ति, एक वोट और एक वोट, एक मूल्य” संविधान में निहित समानता की भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दिल्ली में 47.56 लाख नाम ड्राफ्ट रोल से बाहर होने का दावा
SIR को लेकर सबसे बड़ा सवाल दिल्ली की मतदाता सूची को लेकर उठ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में 47.56 लाख नाम शामिल नहीं किए गए, जबकि करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसे आधारों पर नोटिस के लिए चिन्हित किया गया। इस प्रक्रिया को लेकर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी हैं। 22 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग से इस प्रक्रिया पर जवाब मांगा था। अदालत ने नोटिस जारी करने के आधार पर भी सवाल उठाए थे। जस्टिस जॉयमल्या बागची ने यह जांचने को कहा था कि कहीं नोटिस स्वचालित तरीके से तो नहीं बनाए जा रहे, जबकि मुख्य न्यायाधीश ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसे शब्द के अर्थ और आधार पर स्पष्टीकरण मांगा था। चुनाव आयोग ने अदालत को भरोसा दिया है कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी मतदाता का नाम नहीं हटाया जाएगा।
पश्चिम बंगाल में लाखों अपीलें, लंबित मामलों ने बढ़ाई चिंता
SIR का विवाद केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद राहत पाने की प्रक्रिया भी बड़ी चुनौती बन गई है। चुनाव आयोग के अनुसार, जिन 27.16 लाख मतदाताओं के नाम adjudication के जरिए हटाए गए, उनमें से 22.21 लाख ने अपील की है। इसके अलावा करीब 16.10 लाख अपीलें मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली हैं। इस तरह कुल अपीलों की संख्या 38.31 लाख तक पहुंच गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से बड़ी संख्या में अपीलें लंबित हैं। आयोग ने मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल की संख्या 19 से बढ़ाकर 42 करने का प्रस्ताव रखा है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को प्रस्तावित है।
जस्टिस भुइयां ने याद दिलाया संविधान का वादा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की बुनियाद हैं। अनुच्छेद 325 एक सामान्य मतदाता सूची की व्यवस्था करता है, जबकि अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर कराने का प्रावधान करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक संविधान में मान्य किसी आधार पर कोई व्यक्ति मतदान के लिए अयोग्य घोषित न हो, तब तक नागरिक को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि मतदान का अधिकार भले ही मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज न हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में इसके संवैधानिक महत्व को स्वीकार किया है, क्योंकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक संविधान की बुनियादी विशेषताओं में शामिल हैं।
‘अरबपति हो या रिक्शा चालक, वोट की कीमत बराबर’
जस्टिस भुइयां ने मतदान की बराबरी को समझाने के लिए समाज के अलग-अलग वर्गों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अरबपति और रिक्शा चालक के वोट का मूल्य समान है। इसी तरह सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति और बेहद वंचित व्यक्ति का वोट भी लोकतंत्र में बराबर महत्व रखता है। यही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की परिवर्तनकारी शक्ति है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत के संविधान ने हर नागरिक को सरकार चुनने में बराबर आवाज देने का वादा किया था और किसी प्रशासनिक प्रक्रिया को इस मूल सिद्धांत को कमजोर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई जरूरी
जस्टिस भुइयां ने 1995 के Lal Babu Hussain बनाम Electoral Registration Officer मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में एक बार नाम दर्ज होने के बाद, मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, उसे बिना नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए हटाया नहीं जा सकता। उनके मुताबिक, मतदाता के अधिकार को नागरिक की पहचान से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि नागरिक से उसका मतदान अधिकार छीनना उसकी लोकतांत्रिक पहचान के मूल हिस्से को प्रभावित करता है।
‘कोई प्राधिकरण संविधान से ऊपर नहीं’
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि अनुच्छेद 326 के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत भी इसे माफ नहीं कर सकती। उनका संदेश साफ था—कोई भी व्यक्ति या संस्था संविधान से ऊपर नहीं है। उन्होंने संवैधानिक वकील नानी पालखीवाला के उस विचार को भी याद किया कि स्वतंत्रता किसी पीढ़ी को विरासत में मिल जाने वाली चीज नहीं है; हर पीढ़ी को उसकी रक्षा करनी होती है।
SIR विवाद के बीच जस्टिस भुइयां की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बहस अब केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गई है। सवाल यह है कि ऐसी प्रक्रिया में अगर बड़ी संख्या में पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से बाहर हो जाते हैं तो उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी की सुरक्षा कौन करेगा। जस्टिस भुइयां ने इसी बिंदु पर संवैधानिक सीमा की याद दिलाते हुए कहा कि किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया के नाम पर नागरिक के मताधिकार को मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता।


