राष्ट्रीय / दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में जारी विरोध प्रदर्शन के बीच आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज को पुलिस ने हिरासत में लिया। हिरासत में लिए जाने के दौरान भारद्वाज ने दिल्ली पुलिस के व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के साथ बेहद आक्रामक तरीके से पेश आया जा रहा है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “मुझे ऐसे उठाकर फेंक रहे हैं जैसे मैं कोई फुटबॉल हूं।” भारद्वाज ने दावा किया कि पुलिसकर्मी उन्हें इस तरह उठाकर ले जा रहे थे कि उनके पैर ऊपर और सिर नीचे था। उनके बयान ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई, हिरासत के तरीके और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को लेकर नया विवाद खड़ा कर दिया है।
‘पैर ऊपर, सिर नीचे करके ले गए’
पुलिस हिरासत में मौजूद भारद्वाज ने आरोप लगाया कि उन्हें सामान्य तरीके से हिरासत में लेने के बजाय पुलिसकर्मियों ने जबरन उठाया और ले गए। उनके मुताबिक, जिस तरह से उन्हें उठाया गया, उसमें उनके पैर ऊपर और सिर नीचे था। उन्होंने इसी अनुभव को बयान करते हुए कहा कि पुलिस उन्हें “फुटबॉल की तरह उठाकर फेंक रही है।” भारद्वाज ने सवाल उठाया कि किसी राजनीतिक नेता या आम नागरिक को हिरासत में लेने के दौरान क्या इस तरह का व्यवहार उचित है। उनके आरोपों के बाद अब यह सवाल भी उठ रहा है कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस किस स्तर तक बल का इस्तेमाल कर सकती है और हिरासत की प्रक्रिया में क्या निर्धारित मानकों का पालन किया गया।
महिला पत्रकार से कथित बदसलूकी ने बढ़ाई गर्मी
विवाद सिर्फ प्रदर्शनकारियों की हिरासत तक सीमित नहीं है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कवरेज के दौरान एक महिला मीडियाकर्मी के साथ कथित पुलिस बदसलूकी का मामला भी सामने आया है। इस घटना को लेकर पत्रकारों में नाराजगी देखी गई और पत्रकारों ने संसद मार्ग थाने के बाहर प्रदर्शन करते हुए संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। इससे पुलिस की भूमिका पर सवाल और गंभीर हो गए हैं। प्रदर्शन स्थल पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन मीडिया कवरेज कर रहे पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों पर भी स्पष्ट और निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
भारद्वाज ने पुलिस पर उठाए सवाल
सौरभ भारद्वाज ने महिला पत्रकार से कथित बदसलूकी के मामले को भी उठाया और सवाल किया कि जिस पुलिस अधिकारी पर आरोप लगाए जा रहे हैं, उसके खिलाफ FIR दर्ज करने में कथित तौर पर देरी क्यों हो रही है। उनका कहना है कि अगर किसी आम नागरिक या पत्रकार के साथ पुलिसकर्मी के व्यवहार को लेकर शिकायत सामने आती है तो उस शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनके आरोपों ने विरोध प्रदर्शन की पुलिसिंग को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बढ़ता विरोध
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों का विरोध लगातार तेज हो रहा है। प्रदर्शनकारियों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची से जुड़े विवादों और चुनावी प्रक्रिया में जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी विरोध के दौरान पुलिस की कार्रवाई अब खुद एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही है। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने और पुलिस की भारी मौजूदगी के बीच विपक्ष आरोप लगा रहा है कि असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है।
सवाल अब पुलिस के तौर-तरीके पर
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस कार्रवाई की सीमा क्या होनी चाहिए। प्रदर्शन को नियंत्रित करना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सौरभ भारद्वाज का “फुटबॉल की तरह उठाकर फेंकने” वाला आरोप इसी वजह से गंभीर है। यह आरोप सही है या पुलिस की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक अतिशयोक्ति—इसका फैसला जांच और उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों से होना चाहिए। लेकिन आरोप सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस पर यह जिम्मेदारी जरूर है कि वह पूरे घटनाक्रम पर स्पष्ट जवाब दे।
एक तरफ प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि असहमति को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है, दूसरी तरफ पुलिस के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। अब असली कसौटी यही होगी कि विरोध को नियंत्रित करते समय क्या पुलिस लोकतांत्रिक अधिकारों और हिरासत की गरिमा की सीमा के भीतर रही। महिला पत्रकार से कथित बदसलूकी और सौरभ भारद्वाज के हिरासत संबंधी आरोपों पर कार्रवाई और स्पष्टीकरण से ही तस्वीर साफ होगी।


