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महिला पत्रकार से बदसलूकी पर भड़का मीडिया, पुलिस के खिलाफ सड़क पर उतरे पत्रकार, कांग्रेस ने अमित शाह से पूछे सवाल

राष्ट्रीय / दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026

जंतर-मंतर पर CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन की कवरेज के दौरान महिला पत्रकारों के साथ दिल्ली पुलिस के कथित दुर्व्यवहार ने अब बड़ा रूप ले लिया है। तीन महिला पत्रकारों ने पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न और अनुचित तरीके से छूने के गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोपों के खिलाफ कार्रवाई और FIR की मांग को लेकर बड़ी संख्या में पत्रकार सड़क पर उतर आए हैं और संसद मार्ग थाने के बाहर धरना दे रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लेते हुए सवाल किया है कि दिल्ली पुलिस के अधीन आने वाली इस व्यवस्था में महिला पत्रकारों की शिकायत पर तत्काल FIR क्यों नहीं हुई।

मामला उस समय का है जब जंतर-मंतर पर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन की पत्रकार कवरेज कर रहे थे। आरोप है कि पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित तौर पर बदसलूकी हुई। एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने पुलिस कार्रवाई के दौरान महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी को लेकर सवाल किया तो एक ACP रैंक के अधिकारी ने उनके साथ कथित तौर पर अनुचित शारीरिक व्यवहार किया और धक्का दिया।

महिला पत्रकारों का आरोप है कि घटना के बाद वे शिकायत लेकर थाने पहुंचीं, लेकिन तत्काल FIR दर्ज नहीं की गई। यहीं से मामला और भड़क गया। पत्रकारों ने सवाल उठाया कि अगर पुलिस पर ही महिला पत्रकार से दुर्व्यवहार का आरोप है, तो शिकायत दर्ज करने में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

FIR की मांग पर थाने के बाहर पत्रकारों का धरना

शिकायतों के बाद संसद मार्ग थाने के बाहर पत्रकारों की संख्या बढ़ती चली गई। पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों ने आरोपी पुलिस अधिकारी के खिलाफ FIR दर्ज करने और निष्पक्ष जांच की मांग की। विरोध का स्वर लगातार तेज होता गया।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पत्रकार किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपना पेशेवर दायित्व निभाते हुए मौके पर मौजूद थे। ऐसे में पुलिस कार्रवाई की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार को सामान्य कानून-व्यवस्था की कार्रवाई बताकर टाला नहीं जा सकता।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी मामले पर चिंता जताते हुए दिल्ली पुलिस से कार्रवाई की मांग की है। अब मामला सिर्फ पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव का नहीं, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता का सवाल बन गया है।

कांग्रेस का हमला—‘ये देश की सरहद नहीं, संसद मार्ग थाना है’

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी ने कहा—

“ये देश की सरहद नहीं, दिल्ली का संसद मार्ग थाना है। जहां महिला पत्रकारों की छाती पर हाथ रखने वाले पुलिसवाले को बचाने के लिए दिल्ली पुलिस ने पूरी बटालियन उतार दी है।”

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि महिला पत्रकार न्याय और FIR की मांग को लेकर थाने के बाहर बैठी हैं, लेकिन पुलिस आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय प्रदर्शन कर रहे पत्रकारों के सामने भारी पुलिस बल खड़ा कर रही है।

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधते हुए सवाल किया कि जब पत्रकार सड़क पर न्याय की मांग कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं? पार्टी ने इसे भाजपा के महिला सम्मान और ‘नारी वंदन’ के राजनीतिक दावों से जोड़ते हुए हमला बोला।

कांग्रेस का सवाल सीधा है—अगर महिला पत्रकार के साथ पुलिसकर्मी पर गंभीर आरोप लगते हैं और FIR के लिए भी पत्रकारों को थाने के बाहर धरना देना पड़े, तो फिर महिला सुरक्षा और सम्मान के सरकारी दावों का क्या अर्थ रह जाता है?

हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं और पुलिसकर्मियों पर लगाए गए आरोपों की जांच अभी जारी है।

राहुल गांधी ने अमित शाह से मांगा जवाब

मामले में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाब मांगा है। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, ऐसे में महिला पत्रकारों की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

उन्होंने जंतर-मंतर की कार्रवाई को लेकर महिलाओं के साथ कथित बदसलूकी, पत्रकारों को घसीटे जाने और कैमरे छीने जाने जैसे आरोपों का भी जिक्र किया।

इससे मामला सीधे गृह मंत्रालय की जवाबदेही तक पहुंच गया है। अब सवाल यह नहीं है कि सिर्फ घटनास्थल पर क्या हुआ; सवाल यह भी है कि शिकायत मिलने के बाद पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया क्या थी और FIR दर्ज करने में देरी क्यों हुई।

दिल्ली पुलिस ने जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी

विवाद बढ़ने के बाद दिल्ली पुलिस ने कहा कि 3 अक्टूबर को नई दिल्ली इलाके में प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। पुलिस के मुताबिक शिकायतें प्राप्त हो चुकी हैं और निष्पक्ष जांच के लिए उन्हें क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया है।

यानी फिलहाल आरोपों की जांच चल रही है और किसी पुलिस अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी अभी साबित नहीं हुई है। लेकिन क्राइम ब्रांच को जांच सौंपे जाने से वह शुरुआती सवाल खत्म नहीं होता कि शिकायतकर्ताओं को FIR के लिए थाने के बाहर धरने पर बैठने की जरूरत क्यों पड़ी।

अब पत्रकार बनाम पुलिस नहीं, सवाल है जवाबदेही का

जंतर-मंतर पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा था। प्रदर्शनकारियों की हिरासत, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित धक्का-मुक्की और पत्रकारों के साथ व्यवहार को लेकर सवाल उठ रहे थे। अब महिला पत्रकारों की शिकायत ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

पत्रकार पुलिस की कार्रवाई को रिकॉर्ड करता है। पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह पत्रकार को सुरक्षित वातावरण में काम करने दे। अगर पुलिस पर ही पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगे तो जांच ऐसी होनी चाहिए जिस पर पीड़ित और आम जनता दोनों भरोसा कर सकें।

यहां मामला किसी एक महिला पत्रकार की शिकायत से आगे बढ़ चुका है। पत्रकारों का सड़क पर उतरना बताता है कि मीडिया समुदाय इसे अपने पेशे की गरिमा और स्वतंत्रता का सवाल मान रहा है।

अब गेंद दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय के पाले में है। क्राइम ब्रांच जांच करेगी, आरोपों की सच्चाई सामने आएगी और जिम्मेदारी तय होगी। लेकिन लोकतंत्र में सबसे असहज सवाल यही रहेगा— जिस पुलिस से नागरिक न्याय और सुरक्षा की उम्मीद करता है, अगर उसी पुलिस के खिलाफ महिला पत्रकार को FIR के लिए सड़क पर उतरना पड़े, तो जवाबदेही आखिर किसकी है?

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