ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 अक्टूबर 2026
महात्मा गांधी को समझना सिर्फ उनके जीवन की घटनाओं को याद करना नहीं है। गांधी को समझने का अर्थ है उस विचार को समझना, जिसने सत्य, अहिंसा, प्रेम और इंसानियत को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाया। गांधी की हत्या को 78 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनके विचारों को लेकर बहस आज भी जारी है—भारत में भी और भारत के बाहर भी।
हिंदुस्तान टाइम्स के गांधी जयंती विशेषांक में प्रकाशित लेखों में गांधी की विरासत को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा गया है। इनमें एक सवाल बार-बार सामने आता है—आखिर बदलती दुनिया में गांधी आज भी इतने प्रासंगिक क्यों हैं?
गांधी सिर्फ अहिंसा का नाम नहीं
भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी ने 1968 में लिखे अपने लेख में गांधी के विचारों की एक महत्वपूर्ण व्याख्या की थी। उनके अनुसार गांधी की अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा से दूर रहने की तकनीक मानना उनके विचार को सीमित कर देना है।
राजगोपालाचारी ने लिखा कि गांधी के लिए अहिंसा का आधार सत्य और प्रेम था। केवल हाथ में हथियार न उठाना अहिंसा नहीं है। मन में नफरत और बदले की भावना रखते हुए हिंसा से बचना भी गांधी की कल्पना वाली अहिंसा नहीं मानी जा सकती।
यही गांधी के विचार की सबसे कठिन परीक्षा है—जिस व्यक्ति से संघर्ष हो रहा हो, उसके प्रति भी मन में मानवता बनाए रखना।
गांधी को ‘तकनीक’ मानना बड़ी भूल?
राजगोपालाचारी की व्याख्या में गांधी किसी राजनीतिक तकनीक के आविष्कारक नहीं थे। सत्याग्रह और अहिंसा उनके लिए कोई ऐसा उपकरण नहीं था, जिसे जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जाए।
उनका विश्वास था कि सत्य और प्रेम भीतर से पैदा होने वाली नैतिक शक्ति हैं। इसी कारण गांधी का संघर्ष केवल सत्ता बदलने का संघर्ष नहीं था। वह व्यक्ति और समाज के नैतिक परिवर्तन की भी बात करता था।
सत्याग्रह की ताकत इसी विचार से निकलती थी कि अन्याय का विरोध किया जाए, लेकिन विरोध करने वाला स्वयं नफरत और हिंसा का हिस्सा न बन जाए।
पाकिस्तान में भी गांधी की जटिल विरासत
हिंदुस्तान टाइम्स में पत्रकार और लेखक हसन मुज्तबा ने पाकिस्तान में गांधी की स्मृति और प्रभाव को लेकर लिखा कि पाकिस्तान में गांधी को लेकर दृष्टिकोण एक जैसा नहीं है।
पाकिस्तान में गांधी का नाम कई स्थानों और ऐतिहासिक संदर्भों में आज भी मौजूद है। खान अब्दुल गफ्फार खान को ‘फ्रंटियर गांधी’ कहा गया। सिंध के सामाजिक कार्यकर्ता मस्कीन जहां खान खोसो को भी उनके जनसेवा कार्यों के कारण गांधी की उपाधि से जोड़ा गया।
लेकिन पाकिस्तान की आधिकारिक और राजनीतिक स्मृति में गांधी की स्थिति अधिक जटिल रही। इसका एक कारण यह भी रहा कि गांधी ने भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया था।
इसके बावजूद गांधी के अहिंसक संघर्ष और मानवतावादी दृष्टिकोण ने पाकिस्तान के कई सामाजिक, साहित्यिक और राजनीतिक हलकों को प्रभावित किया।
विभाजन के समय गांधी का रास्ता
गांधी की सबसे कठिन परीक्षा भारत के विभाजन के समय हुई। जब देश सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा था, तब गांधी का जोर बदले पर नहीं बल्कि हिंसा रोकने और इंसानी जान बचाने पर था।
लेख में यह भी याद किया गया कि गांधी ने पाकिस्तान को उसके हिस्से की 55 करोड़ रुपये की राशि देने के समर्थन में आवाज उठाई थी। यह फैसला उस समय भारत में विवाद और विरोध का कारण भी बना।
यानी गांधी का राजनीतिक नैतिकता का सिद्धांत केवल भाषणों तक सीमित नहीं था। जब उनके अपने समर्थकों और देशवासियों के बीच भी किसी फैसले को लेकर असहमति थी, तब भी उन्होंने अपने घोषित सिद्धांत के अनुसार खड़े रहने की कोशिश की।
गांधी की हत्या और वह विचार जो नहीं मरा
लेखिका रक्षंदा जलाल ने गांधी की हत्या और उनकी विरासत को उर्दू साहित्य के संदर्भ में देखा है। उनके मुताबिक गांधी की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी; उसके साथ जुड़े विचारों को भी खत्म करने की कोशिश की गई थी।
लेकिन गांधी की हत्या के बाद भी सत्य, अहिंसा, प्रेम और सांप्रदायिक सद्भाव के विचार समाप्त नहीं हुए।
लेख में गुलजार की कविता का संदर्भ देते हुए यह सवाल उठाया गया है कि गांधी को गोली मारने वाली सोच क्या वास्तव में खत्म हुई? यही सवाल गांधी की विरासत को आज के समय से जोड़ता है।
गांधी की असली विरासत क्या है?
गांधी की विरासत को केवल चरखा, चश्मा, लाठी और धोती तक सीमित कर देना उनके विचारों को छोटा कर देना होगा।
उनकी विरासत का एक बड़ा हिस्सा यह सवाल है कि समाज में असहमति होने पर हम क्या रास्ता चुनते हैं? विरोधी के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होता है? क्या राजनीतिक संघर्ष नफरत के बिना संभव है? क्या सत्य को सत्ता, भीड़ या लोकप्रियता से ऊपर रखा जा सकता है?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं।
गांधी की प्रासंगिकता शायद इसी वजह से बनी हुई है कि उनका विचार हमें कोई आसान रास्ता नहीं देता। वह व्यक्ति से आत्मसंयम, समाज से सहिष्णुता और राजनीति से नैतिकता की मांग करता है।
गांधी की हत्या 1948 में हुई थी, लेकिन गांधी के विचार पर बहस आज भी जारी है। यही शायद किसी विचार की सबसे बड़ी परीक्षा भी है—वह अपने समय से आगे निकलकर अगली पीढ़ियों को सवाल पूछने के लिए मजबूर करता रहे।



