ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 सितंबर 2026
SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद अब सिर्फ मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। मामला इससे आगे बढ़कर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, उसकी कार्यप्रणाली और राजनीतिक दलों के साथ उसके रिश्तों को लेकर सवालों तक पहुंच गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, तो उसका जवाब खुद चुनाव आयोग देने के बजाय बीजेपी के नेता और प्रवक्ता क्यों देने लगते हैं?
मंगलवार को आंध्र प्रदेश बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता जाल्ली मधुसूदन ने राहुल गांधी पर SIR को लेकर जनता के बीच भ्रम पैदा करने और चुनाव आयोग की संवैधानिक संस्था को बदनाम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष को जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए और चुनाव आयोग पर उनके हमले उनके पद के अनुरूप नहीं हैं।
यहीं से एक राजनीतिक सवाल पैदा होता है। चुनाव आयोग देश की एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के रूप में दर्ज किया गया है। ऐसे में जब विपक्ष आयोग के फैसलों या SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक अपेक्षा यही होती है कि आयोग अपने निर्णय, नियम और प्रक्रिया के आधार पर जवाब दे।
लेकिन मौजूदा विवाद में तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। बीजेपी लगातार कांग्रेस और राहुल गांधी के आरोपों का राजनीतिक जवाब दे रही है। बीजेपी की ओर से यह भी कहा गया है कि विपक्ष चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन में संदेह पैदा कर रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रही है। यानी एक तरफ आयोग है, दूसरी तरफ राजनीतिक दल हैं और इनके बीच लगातार बढ़ता हुआ सार्वजनिक विवाद है।
यही स्थिति उस राजनीतिक मुहावरे की याद दिलाती है—“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।” हालांकि यह एक राजनीतिक व्याख्या है, तथ्य यह है कि चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष के सवालों के जवाब में बीजेपी के नेताओं की सक्रियता लगातार दिखाई दे रही है। इससे एक और सवाल उठता है—चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच यह रिश्ता क्या कहलाता है?
क्या यह केवल राजनीतिक जवाब देने की सामान्य प्रक्रिया है या फिर इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों को और बल मिलता है? इसका जवाब किसी राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता और सार्वजनिक रिकॉर्ड को देना होगा।
SIR को लेकर चुनाव आयोग का अपना पक्ष भी सामने आया है। आयोग ने प्रक्रिया को लेकर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि संबंधित फैसले आयोग ने सर्वसम्मति से लिए। कांग्रेस ने आयोग के इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया और अपनी आपत्तियां दोहराईं।
विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग खुद राजनीतिक दलों को चुनाव प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हितधारक मानता है। आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों में कहा गया है कि राजनीतिक दलों की भागीदारी चुनाव प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में महत्वपूर्ण है और उन्हें दावे तथा आपत्तियां दर्ज कराने के अवसर मिलते हैं।
इस पूरे विवाद का असली सवाल किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने का नहीं है। सवाल यह है कि भारत की चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहे। यदि विपक्ष को SIR पर आपत्ति है, तो उसे तथ्य, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के जरिए अपनी बात रखने का अधिकार है। यदि बीजेपी उन आरोपों को गलत मानती है, तो वह राजनीतिक रूप से उनका जवाब दे सकती है। लेकिन चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता का आधार राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट नियम और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्य होने चाहिए।
आज सबसे जरूरी सवाल यही है—जब चुनाव आयोग पर सवाल उठें, तो जवाब राजनीतिक दल दें या खुद चुनाव आयोग? लोकतंत्र में इस सवाल का जवाब जितना स्पष्ट होगा, चुनावी संस्थाओं पर जनता का भरोसा उतना ही मजबूत रहेगा।



