[the_ad id="179"]
Home » National » पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी साइबर ठगी के शिकार, IIT मद्रास की स्टडी में बड़ा खुलासा

पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी साइबर ठगी के शिकार, IIT मद्रास की स्टडी में बड़ा खुलासा

राष्ट्रीय/ साइबर अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 सितंबर 2026

ऑनलाइन ठगी को लेकर आम धारणा रही है कि साइबर अपराध का शिकार वही व्यक्ति होता है, जिसे डिजिटल तकनीक की ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन IIT मद्रास की एक नई स्टडी इस धारणा को चुनौती देती है। अध्ययन में सामने आया है कि भारत में वित्तीय साइबर अपराध के शिकार लोग जरूरी नहीं कि डिजिटल रूप से अनजान या अनुभवहीन हों। इसके उलट, बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं जो उच्च शिक्षित हैं और डिजिटल तकनीक का नियमित इस्तेमाल करते हैं। शोधकर्ताओं ने 33 साइबर अपराध पीड़ितों का अध्ययन किया और पाया कि IT सेक्टर में काम करने वाले प्रोफेशनल, बैंककर्मी, डॉक्टर, वित्त और प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े लोग, सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकारी और यहां तक कि साइबर सुरक्षा से संबंधित प्रमाणपत्र रखने वाले लोग भी ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी की चपेट में आ सकते हैं। अध्ययन का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि केवल डिजिटल साक्षरता किसी व्यक्ति को साइबर अपराध से पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाती।

शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑनलाइन ठगी करने वाले अपराधी केवल तकनीकी कमजोरियों का फायदा नहीं उठाते, बल्कि कई बार पीड़ित की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को निशाना बनाते हैं। साइबर अपराधी ऐसे समय का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं जब कोई व्यक्ति तनाव, पारिवारिक परेशानी या जीवन में किसी बड़े बदलाव से गुजर रहा हो। परिवार में बीमारी, नौकरी की तलाश, सेवानिवृत्ति, कार्यस्थल का दबाव या आर्थिक चिंता जैसी परिस्थितियां व्यक्ति को मानसिक रूप से अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। ऐसे समय में अपराधी फोन कॉल, मैसेज, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जिसमें पीड़ित को तुरंत कोई निर्णय लेने के लिए मजबूर महसूस हो। शोधकर्ताओं ने इस स्थिति को “इंजीनियर्ड ब्रेन फ्रीज” या “माइंड अरेस्ट” जैसे शब्दों से समझाया है। इसका आशय ऐसी मानसिक स्थिति से है जिसमें अचानक पैदा किए गए डर, दबाव या जल्दबाजी के कारण व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों की तरह सोच-विचार नहीं कर पाता।

स्टडी में यह भी बताया गया कि भारत में साइबर अपराधी स्थानीय परिस्थितियों और आम लोगों की परिचित सेवाओं का इस्तेमाल करके धोखाधड़ी को अधिक विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं। इनमें आधार से जुड़ी धमकियां, UPI के जरिए पैसे ट्रांसफर कराने के तरीके, SEBI में पंजीकृत होने का दावा करने वाले फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म और डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध शामिल हैं। ठग कई बार सरकारी संस्थाओं, बैंक, पुलिस, जांच एजेंसी या वित्तीय नियामक संस्थाओं का नाम लेकर पीड़ित पर भरोसा करने का दबाव बनाते हैं। डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में अपराधी वीडियो कॉल या फोन के जरिए व्यक्ति को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है और बचने के लिए तत्काल पैसे देने होंगे। इसी तरह फर्जी निवेश प्लेटफॉर्म ऊंचे रिटर्न का लालच देकर लोगों से पैसा जमा करा सकते हैं और खुद को वैध दिखाने के लिए किसी नियामक संस्था से पंजीकरण का झूठा दावा कर सकते हैं।

इस अध्ययन का एक अहम पहलू यह है कि साइबर सुरक्षा को केवल तकनीकी ज्ञान का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। कोई व्यक्ति डिजिटल बैंकिंग, UPI, ऑनलाइन निवेश या इंटरनेट के इस्तेमाल में काफी अनुभवी हो सकता है, लेकिन यदि अपराधी उसके सामने अचानक डर, समय का दबाव या आर्थिक नुकसान का खतरा खड़ा कर दे तो उसकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि साइबर ठगी से बचाव में तकनीकी सावधानी के साथ-साथ यह समझना भी जरूरी है कि अपराधी किस तरह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर तुरंत पैसे भेजना, OTP या बैंक संबंधी जानकारी साझा करना, संदिग्ध लिंक पर क्लिक करना या किसी अधिकारी के नाम पर किए गए फोन कॉल को बिना स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए मान लेना जोखिम पैदा कर सकता है।

IIT मद्रास के शोध से सामने आया संदेश यह है कि साइबर अपराध से बचाव की पहली शर्त केवल ज्यादा पढ़ा-लिखा या तकनीक-समझ रखने वाला होना नहीं है, बल्कि दबाव की स्थिति में निर्णय लेने से पहले रुकना और जानकारी की पुष्टि करना भी है। अगर कोई व्यक्ति अचानक कानूनी कार्रवाई, बैंक खाता बंद होने, आधार से जुड़ी समस्या, निवेश में बड़े मुनाफे या किसी तत्काल भुगतान का दबाव बनाता है, तो ऐसे दावे की स्वतंत्र रूप से जांच करना जरूरी है। खासकर सरकारी एजेंसी, बैंक या वित्तीय संस्था के नाम पर आए किसी संदेश या कॉल को उसी माध्यम से सत्यापित नहीं करना चाहिए, जो ठग उपलब्ध करा रहा हो।

साइबर अपराध का बदलता स्वरूप यह दिखाता है कि ठगी अब केवल फर्जी लिंक या संदिग्ध वेबसाइट तक सीमित नहीं रह गई है। अपराधी तकनीक के साथ-साथ मानवीय व्यवहार, डर, लालच, तनाव और जल्दबाजी का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। IIT मद्रास की यह स्टडी इसी पहलू पर ध्यान खींचती है कि डिजिटल दुनिया में सावधानी का मतलब केवल तकनीकी जानकारी रखना नहीं, बल्कि दबाव में भी सोचने और निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना है। पढ़े-लिखे प्रोफेशनल और साइबर सुरक्षा की जानकारी रखने वाले लोग भी इससे अछूते नहीं हैं। ऐसे में साइबर ठगी के खिलाफ जागरूकता का दायरा तकनीकी प्रशिक्षण से आगे बढ़ाकर मनोवैज्ञानिक दबाव और सोशल इंजीनियरिंग को पहचानने तक ले जाना जरूरी हो जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *