राष्ट्रीय/ मध्य प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | उज्जैन | 28 सितंबर 2026
उज्जैन की शाही मस्जिद इन दिनों सिर्फ सड़क चौड़ीकरण का मामला नहीं रह गई है। एक तरफ प्रशासन इसे 2028 के सिंहस्थ की तैयारियों के तहत जरूरी सड़क विस्तार बता रहा है, दूसरी तरफ मस्जिद प्रबंधन और स्थानीय लोग इसे सदियों पुरानी धार्मिक विरासत और वक्फ संपत्ति से जुड़े अधिकारों का सवाल मान रहे हैं। सोमवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव, पथराव, आंसू गैस और लाठीचार्ज तक की स्थिति बनी। पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया है। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भावनात्मक नारों से आगे कानून की किताब में छिपा है—अगर किसी मस्जिद की जमीन वक्फ के तौर पर दर्ज है, तो क्या सरकार सड़क चौड़ीकरण के नाम पर उसका हिस्सा हटा सकती है? इसका जवाब सीधा “नहीं” भी नहीं है और सीधा “हां” भी नहीं। उज्जैन के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहले ही प्रशासन के पक्ष में फैसला दे चुका है।
सबसे पहले उस दावे को समझना जरूरी है कि यह मस्जिद करीब 600 साल पुरानी है। उपलब्ध रिपोर्टों में इसकी उम्र को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। मस्जिद से जुड़े लोगों की ओर से इसे सदियों पुरानी संरचना बताया गया है और कुछ रिपोर्टों में इसकी उम्र करीब 636 वर्ष, यानी 1390 के आसपास से जुड़ी बताई गई है। लेकिन 9 सितंबर 2026 के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश में अदालत ने इसकी सटीक ऐतिहासिक उम्र को अपने फैसले का आधार नहीं बनाया। अदालत के सामने मुख्य तथ्य यह था कि शाही मस्जिद वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है और नगर निगम उसके एक हिस्से को हटाकर सड़क को 15 मीटर चौड़ा करना चाहता है। प्रस्तावित हिस्से में नमाज का हिस्सा, करीब 120 फुट ऊंची मीनार और सामने का मजहर चौक शामिल बताया गया था।
यहीं से मामला दिलचस्प और कानूनी रूप से जटिल हो जाता है। मस्जिद प्रबंधन की तरफ से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि संपत्ति वक्फ में दर्ज है, इसलिए वक्फ बोर्ड को उचित नोटिस दिए बिना कार्रवाई नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300A का हवाला दिया। उनका कहना था कि नमाज की जगह को हटाना धार्मिक अधिकारों को प्रभावित करेगा और आसपास मौजूद दूसरी जमीनों, बगीचे या सड़क के सामने की संपत्तियों का इस्तेमाल करके वैकल्पिक रास्ता निकाला जा सकता है। यहां तक कि मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के वकील ने भी याचिकाकर्ताओं के तर्कों का समर्थन किया था।
लेकिन नगर निगम का पक्ष बिल्कुल अलग था। उसका कहना था कि उज्जैन विकास योजना 2035 के तहत कांठाल चौराहे से गोपाल मंदिर तक 15 मीटर चौड़ी सड़क प्रस्तावित है। यह सड़क गोपाल मंदिर, महाकाल मंदिर और क्षिप्रा नदी की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण मार्ग से जुड़ी है और सिंहस्थ 2028 के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही होगी। निगम के अनुसार लगभग 1.5 किलोमीटर के इस हिस्से में सड़क चौड़ीकरण के लिए बाधा बन रहे कई निर्माण पहले ही हटाए जा चुके हैं। निगम ने अदालत में यह भी कहा कि शहर में लगभग 80 धार्मिक संरचनाओं को सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाया या स्थानांतरित किया जा रहा है और संबंधित सड़क पर 10 मंदिरों तथा 1 मस्जिद के हिस्से पहले ही हटाए जा चुके हैं।
अब आता है सबसे अहम सवाल—वक्फ में दर्ज होना क्या किसी संपत्ति को सड़क चौड़ीकरण या सार्वजनिक परियोजना से पूरी तरह अछूता बना देता है? मौजूदा वक्फ कानून का जवाब है—ऐसा पूर्ण संरक्षण नहीं है। वक्फ अधिनियम की धारा 51 में सामान्य तौर पर वक्फ संपत्ति के हस्तांतरण पर कड़े प्रतिबंध हैं, लेकिन कानून सार्वजनिक उद्देश्य के लिए वक्फ संपत्ति के अधिग्रहण की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं करता। कानून में सार्वजनिक उद्देश्य, उपयुक्त वैकल्पिक जमीन उपलब्ध न होने और वक्फ के हितों की पर्याप्त सुरक्षा तथा मुआवजे जैसी शर्तों का उल्लेख है। इसलिए केवल “यह वक्फ संपत्ति है” कह देना अपने आप में हर सरकारी सड़क परियोजना को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनता।
लेकिन उज्जैन मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी पेच है। यहां प्रशासन ने कार्रवाई को सामान्य भूमि अधिग्रहण के बजाय मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 305 और विकास योजना में निर्धारित सड़क की लाइन से जोड़ा। हाईकोर्ट ने इसी आधार को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि विकास योजना के अनुसार निर्धारित सार्वजनिक सड़क की लाइन बाध्यकारी है और यदि कोई निर्माण उस नियमित सड़क लाइन के बाहर प्रोजेक्ट करता है, तो संबंधित प्रावधानों के तहत उसे हटाया या पीछे किया जा सकता है। अदालत ने पुराने न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए यह भी माना कि ऐसी स्थिति में हर बार सामान्य भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाना जरूरी नहीं है।
यानी अदालत का फैसला यह नहीं कहता कि “वक्फ संपत्ति का कोई महत्व नहीं है”। अदालत ने उलटे धार्मिक अधिकारों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों पर भी विचार किया। लेकिन उसने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में सड़क चौड़ीकरण सार्वजनिक हित से जुड़ा है, प्रस्तावित हटाया जाने वाला हिस्सा कुल संपत्ति का छोटा हिस्सा है और नगर निगम ने सुनवाई तथा नोटिस की प्रक्रिया अपनाई है। अदालत ने यह भी कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कार्रवाई को अनुच्छेद 14, 25, 26 या 300A का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। दोनों याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
फिर भी यहां एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल बचता है—क्या सचमुच कोई बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं था? मस्जिद प्रबंधन ने अदालत के सामने दावा किया था कि पास का बगीचा और सड़क के दूसरी तरफ की कुछ जमीन इस्तेमाल करके मस्जिद को बचाया जा सकता है। अदालत ने इस दलील को उपलब्ध परिस्थितियों में स्वीकार नहीं किया और माना कि उस जगह सड़क के लिए आवश्यक विस्तार के लिहाज से यह वैकल्पिक रास्ता व्यवहारिक नहीं है। इसलिए अब बहस का असली केंद्र यह होना चाहिए कि मास्टर प्लान, जमीन की वास्तविक स्थिति और वैकल्पिक विकल्पों का तकनीकी मूल्यांकन कितना पारदर्शी था। यह सवाल अदालत में उठाया जा चुका है, लेकिन अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इसे प्रशासन के पक्ष में तय किया है।
एक और महत्वपूर्ण बात—क्या प्रशासन ने मस्जिद को निशाना बनाकर अलग नियम अपनाया? उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में प्रशासन ने इससे इनकार किया और कहा कि सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि सड़क की निर्धारित लाइन के आधार पर हो रही है। नगर निगम ने अदालत को बताया कि इसी सड़क पर 10 मंदिर और 1 मस्जिद के हिस्से हटाए गए हैं तथा पूरे शहर में करीब 80 धार्मिक संरचनाओं पर कार्रवाई की जा रही है। अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसे भेदभावपूर्ण कार्रवाई नहीं माना। इसलिए “सिर्फ मस्जिद को निशाना बनाया जा रहा है” कहना अभी स्थापित तथ्य नहीं है; लेकिन यह भी सच है कि इस कार्रवाई से एक ऐतिहासिक मुस्लिम धार्मिक स्थल प्रभावित हो रहा है, इसलिए प्रशासन के लिए पारदर्शिता और दस्तावेज सार्वजनिक करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज के विवाद को इसलिए सिर्फ “मस्जिद बनाम सड़क” कहना भी अधूरा होगा। एक तरफ उज्जैन को सिंहस्थ 2028 के लिए यातायात, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही के हिसाब से तैयार करने का सार्वजनिक हित है। दूसरी तरफ सदियों पुराने धार्मिक स्थलों और वक्फ संपत्तियों के संरक्षण का सवाल है। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह अधिकार भी सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। दूसरी ओर संपत्ति से वंचित करने की कार्रवाई भी कानून के अधिकार के बिना नहीं हो सकती। इसलिए असली कसौटी यही है कि कार्रवाई कानून के तहत, समान रूप से, उचित प्रक्रिया के साथ और वास्तविक विकल्पों की जांच के बाद हुई या नहीं।
और यही वजह है कि उज्जैन की शाही मस्जिद का मामला आने वाले दिनों में सिर्फ सड़क चौड़ीकरण की खबर नहीं रहेगा। वक्फ में दर्ज संपत्ति होने से किसी भूमि को हर सार्वजनिक परियोजना से स्थायी छूट नहीं मिलती, लेकिन सार्वजनिक उद्देश्य का नाम भी अपने आप किसी धार्मिक या वक्फ संपत्ति को हटाने का लाइसेंस नहीं बन जाता। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई को वैध माना है और उसके खिलाफ दायर याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अब यदि कोई पक्ष आगे की न्यायिक चुनौती देता है, तो सवाल यही होंगे—वक्फ कानून और नगर निगम कानून के बीच सही कानूनी संबंध क्या है, वैकल्पिक जमीन की जांच कितनी ठोस थी, प्रक्रिया में वक्फ बोर्ड की भूमिका क्या होनी चाहिए थी और मुआवजे/वैकल्पिक व्यवस्था की पर्याप्त सुरक्षा हुई या नहीं। यही वे तथ्य हैं जिनके आधार पर इस पूरे विवाद को देखा जाना चाहिए—न कि केवल धार्मिक भावनाओं या राजनीतिक नारों के आधार पर।



