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J&K में Statehood की वापसी का प्रस्ताव पास, BJP का विरोध; Omar बोले—“मांगा सिर्फ राज्य का दर्जा”

राष्ट्रीय/ जम्मू-कश्मीर | ABC NATIONAL NEWS | श्रीनगर | 28 सितंबर 2026

जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में सोमवार को एक बार फिर राज्य के दर्जे की बहाली का मुद्दा केंद्र में आ गया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की ओर से पेश किया गया पूर्ण Statehood बहाल करने का प्रस्ताव विधानसभा ने पारित कर दिया। प्रस्ताव को कांग्रेस समेत अधिकांश प्रमुख दलों का समर्थन मिला, जबकि BJP विधायकों ने इसका विरोध किया और कार्यवाही के दौरान सदन से बाहर चले गए। इस पूरे घटनाक्रम ने 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद से चले आ रहे उस राजनीतिक और संवैधानिक सवाल को फिर सामने ला दिया है कि केंद्रशासित प्रदेश के रूप में चल रहे जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा कब और किस प्रक्रिया के तहत वापस मिलेगा।

सबसे पहले मूल तथ्य समझना जरूरी है। 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून के तहत तत्कालीन राज्य को 2 केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में पुनर्गठित किया गया था। जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया, जबकि लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। केंद्र के गृह मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश के रूप में 31 अक्टूबर 2019 को अस्तित्व में आया। यानी आज की विधानसभा जिस Statehood की मांग कर रही है, वह उसी संवैधानिक-प्रशासनिक स्थिति को बदलने की मांग है जो 2019 के कानून से बनी थी।

उमर अब्दुल्ला का मौजूदा प्रस्ताव केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं आया है, बल्कि विधानसभा के औपचारिक प्रस्ताव के रूप में सामने आया है। इसमें केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर को “तत्काल और शीघ्र” पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का आग्रह किया गया है। प्रस्ताव में 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को विधानसभा द्वारा पारित पुराने प्रस्तावों का भी संदर्भ दिया गया है। यही संदर्भ BJP के विरोध का एक बड़ा कारण बना, क्योंकि BJP विधायकों ने आरोप लगाया कि 2000 के प्रस्ताव में अधिक स्वायत्तता की बात थी और मौजूदा प्रस्ताव के साथ उसे जोड़ना सिर्फ Statehood तक सीमित नहीं है।

यहीं विवाद का सबसे अहम राजनीतिक बिंदु सामने आता है। उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में BJP नेताओं से कहा कि मौजूदा प्रस्ताव में उनसे Article 370 या 35A की बहाली के लिए वोट नहीं मांगा गया है। उनका कहना था कि प्रस्ताव का मुख्य विषय सिर्फ Statehood की बहाली है। दूसरी ओर BJP ने प्रस्ताव में पुराने प्रस्तावों के संदर्भ को लेकर आपत्ति जताई। यानी दोनों पक्ष एक ही दस्तावेज को अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों में देख रहे हैं—उमर इसे राज्य के दर्जे की मांग के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि BJP पुराने स्वायत्तता और विशेष दर्जे के मुद्दों के संदर्भ को लेकर सवाल उठा रही है।

एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विधानसभा का यह प्रस्ताव अपने आप जम्मू-कश्मीर का संवैधानिक दर्जा नहीं बदल देता। यह केंद्र सरकार से की गई राजनीतिक और विधायी मांग है। मौजूदा व्यवस्था संसद द्वारा बनाए गए जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून के तहत कायम है। इसलिए Statehood बहाल करने के लिए केंद्र स्तर पर आगे की संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया की जरूरत होगी। विधानसभा का प्रस्ताव उस प्रक्रिया के लिए राजनीतिक मांग और सदन की राय को दर्ज करता है, लेकिन अकेले इस प्रस्ताव से 2019 का कानून समाप्त नहीं होता।

इस मुद्दे का एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ सुप्रीम कोर्ट का दिसंबर 2023 का फैसला भी है। Article 370 से जुड़े फैसले में अदालत ने 2019 में जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने के सवाल पर उस समय विस्तार से निर्णय देना आवश्यक नहीं समझा, क्योंकि केंद्र की ओर से अदालत के सामने यह आश्वासन रखा गया था कि चुनाव होने के बाद जम्मू-कश्मीर का Statehood “निकट भविष्य” में बहाल किया जाएगा। यानी Statehood की बहाली का मुद्दा 2023 में भी न्यायिक रिकॉर्ड पर मौजूद था, लेकिन उसकी अंतिम राजनीतिक और विधायी प्रक्रिया केंद्र के स्तर पर ही रहनी थी।

अब 2026 में विधानसभा का यह प्रस्ताव उसी पुराने वादे और राजनीतिक बहस को फिर सक्रिय कर रहा है। खास बात यह है कि अब जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित विधानसभा मौजूद है और मुख्यमंत्री स्वयं सदन के भीतर Statehood की मांग रख रहे हैं। इसलिए मामला केवल राजनीतिक दलों के बयान तक सीमित नहीं है; यह निर्वाचित विधानसभा की औपचारिक मांग बन चुका है। हालांकि अंतिम निर्णय अभी भी केंद्र और संसद की संवैधानिक-वैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा रहेगा।

विधानसभा के भीतर हुई बहस यह भी दिखाती है कि Statehood और Article 370 के मुद्दों को अलग-अलग रखने की कोशिश के बावजूद दोनों के बीच राजनीतिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 2000 के प्रस्ताव में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने अधिक स्वायत्तता से जुड़े मुद्दे उठाए थे, जबकि नवंबर 2024 में विधानसभा ने विशेष दर्जे की बहाली को लेकर अलग प्रस्ताव पारित किया था। मौजूदा प्रस्ताव में इन दोनों पुराने प्रस्तावों का संदर्भ होने के कारण BJP को यह आशंका जताने का राजनीतिक आधार मिला कि Statehood के साथ पुराने संवैधानिक मुद्दे भी बहस में वापस लाए जा रहे हैं। वहीं उमर अब्दुल्ला का तर्क है कि मौजूदा प्रस्ताव का सीधा उद्देश्य Statehood की बहाली है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है और Statehood बहाली की दिशा में कोई ठोस विधायी कदम कब उठाया जाता है। फिलहाल विधानसभा ने अपनी मांग स्पष्ट कर दी है, लेकिन उसके बाद की संवैधानिक प्रक्रिया केंद्र के हाथ में है। इसलिए सोमवार का प्रस्ताव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे Statehood की तत्काल बहाली के बराबर समझना सही नहीं होगा।

जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने अपना पक्ष दर्ज कर दिया है—पूर्ण Statehood वापस चाहिए। BJP ने इसका विरोध किया है और पुराने स्वायत्तता-संबंधी संदर्भों पर सवाल उठाए हैं। उमर अब्दुल्ला का कहना है कि मौजूदा प्रस्ताव सिर्फ Statehood की मांग करता है। अब असली परीक्षा विधानसभा के प्रस्ताव की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की अगली कार्रवाई की है—क्या 2019 में बदला गया जम्मू-कश्मीर का दर्जा फिर बदलेगा, और अगर बदलेगा तो किस संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया से।

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