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उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रद्द, NLSIU में कानून और अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस

शिक्षा/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु | 20 सितंबर 2026

बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) में कार्यकर्ता उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘प्रिजनर नंबर 626710 इज़ प्रेजेंट’ की प्रस्तावित स्क्रीनिंग अब नहीं होगी। विश्वविद्यालय की लॉ एंड सोसायटी कमेटी ने शुक्रवार शाम छात्र बार एसोसिएशन, विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षकों के साथ चर्चा के बाद स्क्रीनिंग को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया। फिल्मकार ललित वाचानी की बनाई यह डॉक्यूमेंट्री उमर खालिद की गिरफ्तारी, जेल में उनके समय और उनके मामले से जुड़े घटनाक्रम को केंद्र में रखती है। स्क्रीनिंग रद्द होने के बाद यह मामला केवल एक फिल्म के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि विश्वविद्यालयों में कानून के पालन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति और संवेदनशील राजनीतिक विषयों पर चर्चा की गुंजाइश को लेकर भी बहस शुरू हो गई है।

इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को लेकर विवाद पिछले कुछ दिनों से चल रहा था। लॉ एंड सोसायटी कमेटी ने फिल्म को दिखाने की योजना बनाई थी। कार्यक्रम का संबंध राजनीतिक कैदियों के दिन और उमर खालिद की गिरफ्तारी के छह वर्ष पूरे होने से जोड़ा गया था। योजना के मुताबिक फिल्म के प्रदर्शन के बाद छात्रों और विशेषज्ञों के बीच हिरासत, जमानत, असहमति, नागरिक अधिकार और कानून से जुड़े मुद्दों पर बातचीत होनी थी। लेकिन कार्यक्रम से पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने स्क्रीनिंग का विरोध किया। संगठन की ओर से फिल्म को लेकर आपत्ति जताई गई और इसे विश्वविद्यालय परिसर में एकतरफा राजनीतिक दृष्टिकोण को जगह देने के रूप में बताया गया। इसके बाद स्क्रीनिंग को पहले टाल दिया गया था। उस समय सुरक्षा और आयोजन से जुड़ी चिंताओं की भी चर्चा सामने आई थी।

इसके बाद इस पूरे मामले में एक नया कानूनी पहलू जुड़ गया। हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में भी इसी डॉक्यूमेंट्री की प्रस्तावित स्क्रीनिंग को लेकर विवाद सामने आया था। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने सार्वजनिक प्रदर्शन में फिल्म प्रमाणन से जुड़े नियमों की ओर ध्यान दिलाया। बोर्ड का कहना था कि बिना प्रमाणपत्र वाली फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग सिनेमैटोग्राफ कानून के तहत कानूनी समस्या पैदा कर सकती है, जब तक कि कानून के तहत किसी विशेष छूट का प्रावधान लागू न हो। इसके बाद हैदराबाद में प्रस्तावित स्क्रीनिंग भी रद्द कर दी गई। इस घटनाक्रम के बाद सवाल उठने लगा कि विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों या छात्र संगठनों की ओर से आयोजित फिल्म प्रदर्शन पर प्रमाणन संबंधी नियम किस तरह लागू होते हैं।

NLSIU में भी अब यही सवाल महत्वपूर्ण हो गया। छात्रों से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की ओर से इस बात पर ध्यान दिलाया गया था कि ‘प्रिजनर नंबर 626710 इज़ प्रेजेंट’ को प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं है। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र बार एसोसिएशन और लॉ एंड सोसायटी कमेटी के सामने यह सवाल था कि बिना जरूरी प्रमाणन या लागू कानूनी छूट के फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग करने की स्थिति क्या होगी। शुक्रवार शाम हुई चर्चा में इन पहलुओं पर विचार किया गया और आखिरकार स्क्रीनिंग को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला लिया गया। इस तरह कार्यक्रम को रद्द करने का तत्काल कारण केवल छात्र विरोध नहीं रहा, बल्कि फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन से जुड़े कानूनी सवाल भी महत्वपूर्ण बन गए।

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रद्द होना और उस डॉक्यूमेंट्री की सामग्री पर कोई अंतिम कानूनी फैसला होना दो अलग-अलग बातें हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार NLSIU ने स्क्रीनिंग को प्रशासनिक और कानूनी स्थिति को देखते हुए आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी अदालत ने डॉक्यूमेंट्री की सामग्री को सही या गलत घोषित कर दिया है। इसी तरह स्क्रीनिंग रद्द होने का उमर खालिद से जुड़े अदालत में लंबित मामले पर भी कोई सीधा कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता। फिल्म की सामग्री, उसके दावे और अदालत में चल रही कानूनी प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।

फिल्मकार ललित वाचानी लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर वृत्तचित्र बनाते रहे हैं। ‘प्रिजनर नंबर 626710 इज़ प्रेजेंट’ में उमर खालिद की गिरफ्तारी और जेल में उनके समय से जुड़े पहलुओं को सामने रखा गया है। फिल्म में उनके दो मित्रों के माध्यम से उनकी गिरफ्तारी और उसके बाद की परिस्थितियों पर भी चर्चा की गई है। यह डॉक्यूमेंट्री पहले भी अलग-अलग मंचों पर दिखाई जा चुकी है और भारत के साथ-साथ विदेशों में भी इसके प्रदर्शन की जानकारी सामने आई है। हालांकि किसी फिल्म का पहले कहीं प्रदर्शित होना अपने आप में किसी दूसरे स्थान पर उसके सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जरूरी कानूनी अनुमति का विकल्प नहीं बनता।

उमर खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून के तहत आरोप लगाए गए हैं और उनका मामला अदालत में लंबित है। इस मामले में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाए जाना और अदालत द्वारा दोष सिद्ध किया जाना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए उमर खालिद से जुड़े किसी भी कार्यक्रम, फिल्म या सार्वजनिक चर्चा में गिरफ्तारी, जांच, आरोप और अदालत के अंतिम फैसले के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

NLSIU का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश के प्रमुख कानून विश्वविद्यालयों में शामिल है। ऐसे संस्थान में किसी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग केवल फिल्म दिखाने का कार्यक्रम नहीं होती। उससे कानून, नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति, हिरासत और न्याय व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अकादमिक चर्चा भी जुड़ सकती है। यही कारण है कि स्क्रीनिंग को लेकर विश्वविद्यालय समुदाय के भीतर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए। एक पक्ष का मानना था कि फिल्म दिखाने के बाद उस पर खुली चर्चा की जा सकती है, जबकि विरोध करने वाले छात्रों और संगठनों ने फिल्म और उसके प्रदर्शन पर आपत्ति जताई।

इस पूरे विवाद में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी है। एक तरफ सार्वजनिक प्रदर्शन से जुड़े कानून और प्रमाणन के नियम हैं, तो दूसरी तरफ विश्वविद्यालयों में अकादमिक चर्चा और विचारों की स्वतंत्रता का सवाल है। दोनों पहलुओं को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी विषय पर छात्रों को चर्चा करने का अवसर मिलना और किसी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन करना हमेशा एक जैसी कानूनी स्थिति नहीं रखता। अगर किसी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणन या विशेष कानूनी छूट जरूरी है, तो संस्थान को उस प्रक्रिया का पालन करना होगा। दूसरी ओर, किसी संवेदनशील विषय पर चर्चा के लिए कानून के दायरे में उपलब्ध शैक्षणिक रास्तों को तलाशना भी विश्वविद्यालय के वातावरण का हिस्सा हो सकता है।

इस मामले में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की आपत्ति और दूसरी ओर फिल्म की स्क्रीनिंग के पक्ष में मौजूद छात्रों की राय ने विश्वविद्यालय परिसर में विचारों के टकराव को सामने ला दिया है। विरोध करने वाले पक्ष ने फिल्म की विषयवस्तु और उसके संभावित राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाए, जबकि स्क्रीनिंग के पक्ष में रहने वालों के लिए यह कार्यक्रम असहमति, नागरिक स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया पर बातचीत का अवसर था। इन दोनों पक्षों के बीच मतभेद के बावजूद अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय की संबंधित समिति और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लिया गया।

हैदराबाद और बेंगलुरु के इन घटनाक्रमों ने एक व्यापक सवाल भी सामने रखा है। विश्वविद्यालयों में संवेदनशील और विवादित विषयों पर बनी फिल्मों को दिखाने के लिए कानूनी नियमों का पालन कैसे किया जाए और साथ ही छात्रों के बीच स्वतंत्र अकादमिक चर्चा के लिए जगह कैसे बनाई जाए? यह सवाल केवल किसी एक फिल्म या किसी एक व्यक्ति से जुड़ा नहीं है। आने वाले समय में अलग-अलग राजनीतिक, सामाजिक और मानवाधिकार विषयों पर बनने वाली फिल्मों और विश्वविद्यालयों में उनके प्रदर्शन को लेकर भी इसी तरह की स्थितियां सामने आ सकती हैं।

फिलहाल NLSIU में इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग नहीं होगी। लेकिन स्क्रीनिंग का रद्द होना अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। एक सवाल कानून के पालन का है, दूसरा विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का और तीसरा यह कि विवादित विषयों पर छात्रों को अलग-अलग दृष्टिकोण सुनने और उन पर बहस करने के लिए किस तरह का सुरक्षित और कानूनी मंच उपलब्ध कराया जाए। इन सवालों का जवाब किसी एक फिल्म की स्क्रीनिंग से नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की नीतियों, कानून और अकादमिक संवाद की प्रक्रिया से तय होगा।

NLSIU में डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग भले ही रद्द हो गई हो, लेकिन उससे जुड़े सवाल खत्म नहीं हुए हैं। उमर खालिद का मामला अदालत में लंबित है, डॉक्यूमेंट्री अपनी जगह मौजूद है और विश्वविद्यालयों में कानून तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस जारी है। अब असली सवाल यह है कि कानूनी सीमाओं का पालन करते हुए विश्वविद्यालय ऐसे कठिन और असहज विषयों पर छात्रों के लिए खुली, तथ्य आधारित और अलग-अलग विचारों वाली चर्चा की जगह कैसे बनाएंगे।

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