ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | इंदौर | 20 सितंबर 2026
इंदौर में राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम खत्म हो गया, लेकिन इसकी गूंज कार्यक्रम स्थल तक सीमित नहीं है। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी बात भीड़ या मंच पर दिए गए राजनीतिक बयानों से कहीं आगे जाती है। असली बात यह है कि छात्रों को मंच मिला, उन्होंने अपनी समस्याएं सामने रखीं और शिक्षा, भर्ती, परीक्षा, रोजगार, छात्रावास और अपने भविष्य को लेकर सीधे सवाल किए। राहुल गांधी ने इन्हीं सवालों को देश की बड़ी व्यवस्था से जोड़ते हुए अपनी बात रखी। यही वजह है कि ‘छात्रों की गूंज’ को केवल एक राजनीतिक सभा के रूप में देखना इस पूरे कार्यक्रम की तस्वीर को छोटा कर देना होगा।
इंदौर का कार्यक्रम इस अभियान की पांचवीं कड़ी था। इससे पहले कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में छात्रों के साथ राहुल गांधी संवाद कर चुके हैं। यानी यह कोई अचानक किया गया एक कार्यक्रम नहीं था। पिछले कुछ समय से प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच लगातार संवाद की एक श्रृंखला आगे बढ़ाई जा रही है। इंदौर में भी उसी सिलसिले को आगे बढ़ाया गया। फर्क यह रहा कि इस बार कार्यक्रम का दायरा बड़ा था और छात्रों के सवालों के साथ राहुल गांधी ने देश की राजनीतिक और संस्थागत व्यवस्था पर भी अपनी बात ज्यादा स्पष्टता से रखी।
राहुल गांधी के पूरे संबोधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था—छात्र सवाल क्यों पूछता है? उन्होंने कहा कि जिज्ञासा छात्र की सबसे बड़ी ताकत है। छात्र किसी बात को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करता कि उसे ऐसा करने के लिए कहा गया है। वह पूछता है कि ऐसा क्यों हो रहा है, नियम किसके लिए हैं, अवसर किसे मिल रहे हैं और उसके भविष्य का फैसला कौन कर रहा है। यही विचार राहुल गांधी ने ‘सिस्टम बनाम छात्र’ की थीम के जरिए छात्रों के सामने रखा।
यहीं से उनके भाषण का राजनीतिक हिस्सा शुरू हुआ। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और उद्योगपतियों गौतम अडानी तथा मुकेश अंबानी का नाम लेते हुए देश की मौजूदा व्यवस्था को लेकर अपने आरोप और सवाल रखे। उन्होंने कहा कि एक ऐसा ढांचा बन गया है जिसमें कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका बहुत बड़ी हो गई है और सवाल पूछने वाले युवाओं की आवाज व्यवस्था के लिए असहज है। उन्होंने अमित शाह के बेटे जय शाह के क्रिकेट प्रशासन में पहुंचने और बड़े कारोबारी समूहों के प्रभाव जैसे सवाल भी छात्रों के सामने रखे। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप और उनकी व्याख्या हैं।
राहुल गांधी ने अपने भाषण में “अंधभक्त” शब्द का भी इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि छात्र और अंधभक्त में सबसे बड़ा अंतर सवाल पूछने का है। उनके अनुसार छात्र जिज्ञासु होता है, जवाब तलाशता है और अलग-अलग विचारों को समझने की कोशिश करता है। यह बात केवल राजनीतिक नारे के तौर पर नहीं, बल्कि उनके पूरे छात्र संवाद अभियान की केंद्रीय सोच के रूप में सामने आई।
लेकिन अगर कार्यक्रम को केवल मोदी और शाह पर राहुल गांधी के बयानों तक सीमित कर दिया जाए तो छात्रों की असली आवाज पीछे छूट जाएगी। मंच पर जिन समस्याओं की बात हुई, वे कहीं ज्यादा बड़ी हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, सरकारी भर्तियों का इंतजार, छात्रावासों की कमी, छात्रवृत्ति, शिक्षकों के खाली पद और पढ़ाई के दौरान आने वाली दूसरी परेशानियां सीधे युवाओं के भविष्य से जुड़ी हैं।
मध्य प्रदेश के छात्रों ने भर्ती से जुड़े सवाल उठाए। एक छात्रा ने भर्ती परीक्षाओं में 13 प्रतिशत कोटे से जुड़ी समस्या का मुद्दा सामने रखा। शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों की परेशानी भी कार्यक्रम में पहुंची। राहुल गांधी ने शिक्षक भर्ती के लिए आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों के बीच जाने की पेशकश की। एक आदिवासी छात्रा ने इंदौर में आदिवासी छात्रों के लिए छात्रावासों की कमी का सवाल उठाया। इन सवालों ने यह साफ किया कि छात्र की परेशानी सिर्फ परीक्षा हॉल तक नहीं रहती। परीक्षा के बाद नौकरी, नौकरी के बाद अवसर और पढ़ाई के दौरान रहने की व्यवस्था—हर स्तर पर समस्याएं हैं।
राहुल गांधी ने शिक्षकों के खाली पद और स्कूलों के बंद होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि देश को मजबूत बनाना है तो छात्रों को मजबूत करना होगा। यह बात सुनने में सामान्य लग सकती है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की असली चुनौती यहीं है। किसी देश की युवा आबादी तभी ताकत बनती है जब उसे अच्छी शिक्षा, रोजगार और आगे बढ़ने का मौका मिले। केवल युवा आबादी बड़ी होने से देश का भविष्य सुरक्षित नहीं हो जाता।
कार्यक्रम की एक खास बात यह भी रही कि छात्रों को केवल सुनने वाले दर्शक की भूमिका में नहीं रखा गया। उनसे सवाल लिए गए, उनकी समस्याएं सुनी गईं और उन्हें मंच पर अपनी बात रखने का मौका मिला। यही वह हिस्सा है जो ‘छात्रों की गूंज’ को सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम से अलग करता है। राजनीति में युवा अक्सर भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, लेकिन यहां कम से कम कार्यक्रम की संरचना में उन्हें अपनी बात रखने की जगह दी गई।
कार्यक्रम से पहले भी इंदौर में इसे लेकर काफी चर्चा हुई। आयोजन स्थल बदला गया, सुरक्षा से जुड़ी कई शर्तें सामने आईं और आयोजन को लेकर कांग्रेस तथा स्थानीय प्रशासन के बीच सवाल-जवाब हुए। कांग्रेस ने कुछ शर्तों और कोचिंग संस्थानों से जुड़े मामलों पर सवाल उठाए। प्रशासन की ओर से सुरक्षा को इसका कारण बताया गया। कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही यह पूरा घटनाक्रम ‘छात्रों की गूंज’ को खबरों में ला चुका था।
अब सवाल है कि इस कार्यक्रम को सफल क्यों माना जा सकता है? इसका जवाब सिर्फ भीड़ में नहीं है। किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम की असली परीक्षा यह होती है कि वह जिस मुद्दे को लेकर आयोजित किया गया है, क्या उस मुद्दे को व्यापक चर्चा में ला पाया या नहीं। इंदौर में छात्रों की शिक्षा, भर्ती और रोजगार से जुड़ी समस्याएं सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनीं। राहुल गांधी ने इन समस्याओं को देश की राजनीतिक व्यवस्था से जोड़कर अपना पक्ष रखा। छात्रों ने अपनी समस्याएं सामने रखीं। इस अर्थ में कार्यक्रम ने अपना उद्देश्य जरूर हासिल किया।
लेकिन इसकी दूसरी परीक्षा अभी बाकी है। किसी मंच से सवाल उठ जाना आसान है, उनका समाधान निकलना कठिन। अगर ‘छात्रों की गूंज’ को वास्तव में एक लंबे अभियान में बदलना है तो इन छात्रों के सवालों को लगातार उठाना होगा। शिक्षक भर्ती का क्या हुआ? छात्रावास की समस्या का क्या हुआ? परीक्षा और भर्ती में देरी का क्या हुआ? छात्रवृत्ति समय पर मिली या नहीं? प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था में क्या बदला? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब इस अभियान की असली ताकत तय करेंगे।
राहुल गांधी के लिए यह अभियान राजनीतिक रूप से युवाओं से संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनता दिखाई दे रहा है। लेकिन छात्रों के लिए इसकी कीमत तभी होगी जब मंच से उठी आवाज मंच के बाद भी सुनी जाए। युवा केवल तालियां बजाने वाली भीड़ नहीं हैं। वे सवाल पूछने वाले नागरिक हैं और उनके सवालों में उनके परिवारों की उम्मीदें, वर्षों की मेहनत और अपने भविष्य की चिंता छिपी होती है।
इंदौर की ‘छात्रों की गूंज’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि राहुल गांधी ने छात्रों को सिर्फ भाषण सुनाने के बजाय उनकी आवाज को कार्यक्रम का केंद्र बनाया। मोदी-शाह और व्यवस्था को लेकर राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक व्याख्या सामने रखी, लेकिन उससे भी बड़ा संदेश छात्रों से था—अपने सवाल बचाकर रखो, अपनी बात कहो और अपने भविष्य से जुड़े फैसलों पर जवाब मांगो।
क्योंकि किसी भी देश का भविष्य केवल संसद में नहीं बनता। वह उन कक्षाओं, छात्रावासों, परीक्षा केंद्रों और रोजगार की कतारों में भी बनता है, जहां आज का छात्र अपने कल के लिए संघर्ष कर रहा है।



