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₹3.87 करोड़ का काम, वर्क ऑर्डर गायब! Prasar Bharati के Waves OTT में एजेंसियों की भूमिका पर बड़े सवाल

राष्ट्रीय/ मीडिया/ प्रशासन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026

 

Waves OTT के करोड़ों के काम ने खड़े किए सवाल

 

प्रसार भारती के नए ओटीटी प्लेटफॉर्म Waves को लेकर एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जिसने सरकारी कामकाज, टेंडर प्रक्रिया और करोड़ों रुपये के भुगतान की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। न्यूज़लॉन्ड्री की जांच के अनुसार, Waves के लिए थंबनेल, मेटाडेटा, पोस्टर, इन्फोग्राफिक्स और दूसरे डिजिटल “चाइल्ड एसेट्स” तैयार करने के काम की अनुमानित लागत करीब ₹3.87 करोड़ रही। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस एजेंसी VidUnit ने काम किया, वह उन पांच मल्टीमीडिया एजेंसियों में शामिल नहीं थी जिन्हें इस काम के लिए चुना गया था। इतना ही नहीं, रिपोर्ट के अनुसार इस काम के लिए आज तक कोई औपचारिक वर्क ऑर्डर भी सामने नहीं आया है।

पहले पांच एजेंसियों का चयन, फिर सामने आई VidUnit

रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 2024 में प्रसार भारती मैनेजमेंट कमेटी ने Waves के लिए चाइल्ड एसेट्स तैयार कराने की प्रक्रिया को मंजूरी दी थी। इस काम के लिए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ कम्युनिकेशन यानी सीबीसी से सूचीबद्ध पांच मल्टीमीडिया एजेंसियों का चयन किया गया था। कुल लागत करीब ₹3.87 करोड़ तक पहुंची और इसमें लगभग 74 प्रतिशत राशि एक एजेंसी Ankur Media के हिस्से में निर्धारित की गई थी।

लेकिन दस्तावेजों की न्यूज़लॉन्ड्री द्वारा की गई जांच में दावा किया गया कि वास्तविक काम में VidUnit की भूमिका सामने आई। समस्या यह है कि VidUnit सीबीसी की मल्टीमीडिया श्रेणी में सूचीबद्ध एजेंसी नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार वह ऑडियो-विजुअल श्रेणी में सूचीबद्ध थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर काम पांच चुनी हुई एजेंसियों को दिया गया था, तो VidUnit वहां कैसे आई?

वर्क ऑर्डर नहीं, फिर करोड़ों का काम कैसे हुआ?

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू वर्क ऑर्डर को लेकर है। न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार, इस काम के लिए काम शुरू होने से पहले कोई औपचारिक वर्क ऑर्डर जारी नहीं किया गया था। रिपोर्ट यह भी कहती है कि प्लेटफॉर्म लॉन्च होने के बाद भी ऐसा दस्तावेज सामने नहीं आया और जांच के समय तक भी वर्क ऑर्डर मौजूद नहीं था।

सरकारी खर्च की प्रक्रिया में सामान्य तौर पर यह सवाल महत्वपूर्ण होता है कि किस संस्था को काम दिया गया, किस शर्त पर दिया गया, कितनी राशि तय हुई और काम शुरू करने की अनुमति कब मिली। यहां जब करोड़ों रुपये के काम की बात हो और वर्क ऑर्डर को लेकर ही सवाल खड़ा हो जाए, तो पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

₹2.30 करोड़ से ₹4.63 करोड़ और फिर ₹3.87 करोड़

 

मामला सिर्फ एजेंसी के चयन तक सीमित नहीं है। दस्तावेजों के अनुसार, जनवरी 2025 में करीब 5,000 शीर्षकों के लिए चाइल्ड एसेट्स की लागत लगभग ₹2.30 करोड़ बताई गई थी, जीएसटी अलग। इसके बाद जून 2025 में संशोधित अनुमान करीब ₹4.63 करोड़ तक पहुंच गया।

इस संशोधित हिसाब में Ankur Media के लिए करीब ₹2.30 करोड़ के 20,000 थंबनेल और लगभग ₹1.39 करोड़ के 7,736 ग्राफिक्स का उल्लेख था। बाकी चार एजेंसियों के हिस्से में करीब ₹1 करोड़ का काम बताया गया। इसके बाद अधिकारियों ने वास्तविक काम की मात्रा को दोबारा जांचने को कहा।

₹75 लाख का अंतर—आखिर आंकड़ा बदला कैसे?

फरवरी 2026 में तैयार किए गए एक और प्रस्ताव में पूरे किए गए काम की लागत करीब ₹3.87 करोड़ बताई गई, लेकिन वित्तीय मंजूरी के लिए ₹4.63 करोड़ की राशि मांगी गई। यानी दोनों आंकड़ों में करीब ₹75.11 लाख का अंतर था।

मार्च 2026 में वित्त विभाग की अधिकारी प्रतिष्ठा सिंह ने इस अंतर पर सवाल उठाए। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या प्रसार भारती मैनेजमेंट कमेटी ने इस काम को मंजूरी दी थी? क्या वर्क ऑर्डर और एंगेजमेंट दस्तावेज मौजूद हैं? और क्या इस काम पर सीबीसी की रेट कार्ड व्यवस्था लागू होती है?

बाद में इस अंतर को एक “टाइपोग्राफिकल एरर” यानी टाइपिंग की गलती बताया गया। लेकिन सवाल यही है कि करोड़ों रुपये के सरकारी काम में ₹75 लाख से ज्यादा का अंतर आखिर सिर्फ टाइपिंग की गलती कैसे सामने आया?

VidUnit का नाम करीब आठ महीने बाद सामने आया

रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में VidUnit का नाम पहली बार 8 जून 2025 को सामने आया। प्रसार भारती की संविदा विशेषज्ञ उमा अय्यर रावला ने एजेंसियों के हिसाब से काम का विवरण साझा किया और Ankur Media के नीचे कोष्ठक में VidUnit का नाम लिखा।

इसके कई महीने बाद मार्च 2026 में पांच चयनित एजेंसियों से किए गए काम की जानकारी मांगी गई। उस ईमेल में VidUnit को भी कॉपी किया गया। जवाब भी VidUnit की ओर से आया, जिसमें उसके प्रमुख सौरभ कुमार ने कहा कि एजेंसी सभी चाइल्ड एसेट्स—मेटाडेटा, थंबनेल, पोस्टर, इन्फोग्राफिक्स और संबंधित रिकॉर्ड—सत्यापन के लिए तैयार रखेगी।

VidUnit ने काम करने की बात मानी, फिर जवाब नहीं दिया

न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में VidUnit के प्रमुख ने यह पुष्टि की कि उनकी एजेंसी ने प्रसार भारती के लिए मेटाडेटा और थंबनेल पर काम किया था। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि उनकी एजेंसी को यह काम औपचारिक रूप से दिया गया था या नहीं, तो उन्होंने बाद में बात करने की बात कही। रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद उनके फोन कॉल का जवाब नहीं मिला।

Ankur Media के प्रमुख से भी प्रतिक्रिया मांगी गई, लेकिन उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार किया। यानी इस पूरे मामले में काम करने वाली एजेंसी की भूमिका तो सामने आती है, लेकिन उस भूमिका का औपचारिक आधार क्या था, यह सवाल अभी भी बना हुआ है।

प्रसार भारती के अधिकारी ने सब-कॉन्ट्रैक्टिंग का सवाल उठाया

न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में प्रसार भारती के वेब ऑपरेशंस से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर इसे सब-कॉन्ट्रैक्टिंग का मामला बताया और कहा कि यह नियमों के खिलाफ हो सकता है। हालांकि रिपोर्ट ने यह भी संभावना बताई कि समय की कमी के कारण नियमों में छूट दी गई हो सकती है।

यहीं पूरा मामला और पेचीदा हो जाता है। अगर समय की कमी के कारण किसी विशेष व्यवस्था या छूट की अनुमति दी गई थी, तो उसका लिखित रिकॉर्ड क्या है? और अगर छूट दी गई थी तो क्या उसी के आधार पर VidUnit को काम मिला? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी है।

 

शुरुआत में नियमों में छूट की मंजूरी जरूर मिली थी

दस्तावेजों के अनुसार, Waves के लिए चाइल्ड एसेट्स उपलब्ध कराने में कंटेंट बनाने वाली कंपनियों को दिक्कत हो रही थी। इसके बाद प्रसार भारती के अधिकारियों ने नियमों में छूट का प्रस्ताव रखा। 3 अक्टूबर 2024 की मैनेजमेंट कमेटी की बैठक के मिनट्स में सीएसपी-2024 की कुछ धाराओं के तहत चाइल्ड एसेट्स से संबंधित छूट का प्रस्ताव स्वीकार किया गया था।

लेकिन यह मंजूरी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि बाद में VidUnit को बिना वर्क ऑर्डर काम देने की अनुमति थी। यही वह बिंदु है जिस पर दस्तावेजी स्पष्टता सबसे जरूरी है।

 

भुगतान अभी तक नहीं हुआ, लेकिन काम हो चुका था

मामले की जांच के लिए एक समिति भी बनाई गई। इसमें प्रसार भारती के अधिकारियों और Waves से जुड़े कर्मचारियों को शामिल किया गया और उमा रावला को समिति का संयोजक बनाया गया। समिति को तैयार किए गए डिजिटल एसेट्स की मात्रा और गुणवत्ता की जांच करनी थी।

रिपोर्ट के अनुसार समिति की बैठक हो चुकी है, लेकिन अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। इसका मतलब यह मामला अंतिम भुगतान के चरण तक पहुंचने से पहले ही सवालों के घेरे में आ गया है।

प्रसार भारती से सीधे पूछे गए कई सवाल

न्यूज़लॉन्ड्री ने प्रसार भारती के सीईओ गौरव द्विवेदी और Waves के प्रमुख आदित्य चतुर्वेदी से कई सवाल पूछे। इनमें यह भी शामिल था कि काम शुरू होने से पहले जरूरी मंजूरियां क्यों नहीं ली गईं, ₹3.87 करोड़ और ₹4.63 करोड़ के आंकड़ों में अंतर क्यों आया, VidUnit किस आधार पर काम कर रही थी और वर्क ऑर्डर अब तक क्यों मौजूद नहीं है।

रिपोर्ट के प्रकाशन तक दोनों की ओर से जवाब नहीं दिया गया था। इसलिए इन सवालों पर प्रसार भारती का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

अब असली सवाल जवाबदेही का है

Waves भारत के सार्वजनिक प्रसारक का नया डिजिटल प्लेटफॉर्म है। ऐसे प्लेटफॉर्म पर करोड़ों रुपये खर्च होना अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन सरकारी पैसे के खर्च में प्रक्रिया और दस्तावेजों की पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण होती है। अगर एजेंसी चयन, काम की अनुमति, लागत और वर्क ऑर्डर जैसे बुनियादी सवालों पर स्थिति साफ नहीं है, तो जवाबदेही तय करना जरूरी हो जाता है।

₹3.87 करोड़ का काम हुआ, एजेंसी को लेकर सवाल उठे, ₹75 लाख का आंकड़ा बदला, वर्क ऑर्डर दिखाई नहीं दिया और भुगतान भी अभी रुका हुआ है—तो आखिर इस पूरे मामले में निर्णय किस स्तर पर हुआ और नियमों का पालन किस तरह किया गया?

अब नजर इस बात पर है कि प्रसार भारती इन सवालों का दस्तावेजों के साथ क्या जवाब देता है—क्योंकि सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म सिर्फ कंटेंट और तकनीक से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रिया और जवाबदेही से भी भरोसा हासिल करते हैं।

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