ओपिनियन/ शिक्षा और रोजगार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026
परीक्षा पास करना मंजिल नहीं, असली सवाल उसके बाद शुरू होता है
भारत के युवाओं की सबसे बड़ी परेशानी अब सिर्फ परीक्षा में गड़बड़ी, पेपर लीक या भर्ती प्रक्रिया की खामियां नहीं हैं। ये समस्याएं जरूर गंभीर हैं, लेकिन इनके ठीक हो जाने के बाद भी एक बहुत बड़ा सवाल अपनी जगह खड़ा रहेगा—परीक्षा पास करने के बाद नौकरी कहां है? पिछले पांच सप्ताह से जंतर-मंतर पर चल रहे जेन-ज़ेड युवाओं के धरने ने इसी बड़े सवाल को सामने ला दिया है। सरकार की तरफ से परीक्षा व्यवस्था में बदलाव, परीक्षा प्रणाली सुधारने के लिए नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में टास्क फोर्स और परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त सजा की बात सामने आई है। लेकिन युवाओं की परेशानी सिर्फ परीक्षा के दरवाजे तक नहीं है। असली समस्या उस दरवाजे के बाहर खड़ी है, जहां लाखों पढ़े-लिखे युवा नौकरी की तलाश में वर्षों से भटक रहे हैं।
पेपर लीक खत्म हो जाए, फिर भी बेरोजगारी खत्म नहीं होगी
मान लीजिए देश की सभी प्रतियोगी परीक्षाएं पूरी तरह ईमानदार हो जाएं। पेपर लीक बंद हो जाएं, परीक्षा समय पर हो, परिणाम समय पर आए और भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो जाए। यह निश्चित रूप से बहुत जरूरी सुधार होगा। लेकिन इसके बाद भी सवाल रहेगा कि कुल कितनी नौकरियां हैं और उनके लिए कितने युवा आवेदन कर रहे हैं? अगर लाखों युवा एक सीमित संख्या वाली सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते रहेंगे, तो सिर्फ परीक्षा व्यवस्था सुधार देने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी। परीक्षा यह तय कर सकती है कि नौकरी के लिए किसका चयन होगा, लेकिन परीक्षा यह तय नहीं करती कि अर्थव्यवस्था में पर्याप्त अच्छी नौकरियां पैदा होंगी या नहीं।
युवा पढ़ रहा है, तैयारी कर रहा है, लेकिन आगे रास्ता कितना है?
आज देश का बड़ा युवा वर्ग वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। कोई सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है, कोई बैंकिंग, कोई रेलवे, कोई पुलिस, कोई शिक्षक भर्ती तो कोई दूसरी सरकारी परीक्षा के लिए। कई युवा एक परीक्षा से दूसरी परीक्षा तक अपना कीमती समय और पैसा लगा देते हैं। परिवार उनकी पढ़ाई और तैयारी का खर्च उठाता रहता है और युवा लगातार इस उम्मीद में रहता है कि एक दिन नौकरी मिलेगी और जिंदगी आगे बढ़ेगी। लेकिन जब भर्ती कम हो, परीक्षा में देरी हो, पेपर लीक हो या परिणाम अटक जाए, तो यह इंतजार और लंबा होता जाता है। यही इंतजार धीरे-धीरे निराशा में बदल सकता है।
भारत की स्किलिंग व्यवस्था में भी बड़ी कमी
इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्किलिंग यानी कौशल प्रशिक्षण है। युवाओं को प्रशिक्षण देने के लिए कई योजनाएं और संस्थाएं काम कर रही हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रशिक्षण किस जरूरत के हिसाब से दिया जा रहा है। अगर किसी इलाके में ऐसे युवाओं को ऐसी स्किल सिखाई जा रही है जिसकी स्थानीय या आसपास के बाजार में मांग ही नहीं है, तो प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भी नौकरी नहीं मिलेगी। यही कारण है कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि युवाओं को स्किल सिखाई जा रही है। असली सवाल होना चाहिए—कौन-सी स्किल, किस उद्योग के लिए और कितनी नौकरियों के लिए?
नौकरी जहां है, प्रशिक्षण वहां क्यों नहीं?
भारत की मौजूदा स्किलिंग व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या हम युवाओं को नौकरी की जरूरत के हिसाब से तैयार कर रहे हैं या सिर्फ उपलब्ध लोगों की संख्या के हिसाब से प्रशिक्षण दे रहे हैं। अगर किसी शहर में उद्योगों को तकनीकी कर्मचारियों की जरूरत है, लेकिन प्रशिक्षण केंद्र ऐसे पाठ्यक्रम चला रहे हैं जिनसे उस क्षेत्र में रोजगार की संभावना बहुत कम है, तो युवा प्रमाणपत्र तो हासिल कर लेगा, लेकिन नौकरी नहीं। इसलिए प्रशिक्षण व्यवस्था को नौकरी और उद्योग की वास्तविक जरूरत से जोड़ना बेहद जरूरी है। युवाओं को सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, ऐसा कौशल चाहिए जिसके लिए कोई कंपनी उन्हें वेतन देने को तैयार हो।
सरकारी नौकरी ही आखिरी विकल्प क्यों बनती जा रही है?
एक और बड़ा सवाल है कि भारत में सरकारी नौकरी को लेकर इतनी ज्यादा प्रतिस्पर्धा क्यों है। इसका एक कारण यह है कि सरकारी नौकरी युवाओं को अपेक्षाकृत स्थिर रोजगार, नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा का भरोसा देती है। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में कई नौकरियां कम वेतन, अस्थायी रोजगार और सीमित सुरक्षा के साथ आती हैं। इसलिए लाखों युवा सरकारी नौकरी के पीछे वर्षों तक लगे रहते हैं। अगर निजी क्षेत्र में बड़ी संख्या में सम्मानजनक वेतन, स्थायी अवसर और आगे बढ़ने की स्पष्ट संभावना वाली नौकरियां पैदा हों, तो प्रतियोगी परीक्षाओं पर दबाव भी कम हो सकता है।
सिर्फ नौकरी की संख्या नहीं, नौकरी की गुणवत्ता भी जरूरी
भारत जैसे बड़े युवा देश के सामने चुनौती सिर्फ इतनी नहीं है कि कितने लोगों को रोजगार मिला। सवाल यह भी है कि उन्हें किस तरह का रोजगार मिला। अगर किसी पढ़े-लिखे युवा को उसकी योग्यता से बहुत नीचे का काम करना पड़ रहा है या उसे इतना कम वेतन मिल रहा है कि शहर में सामान्य जीवन जीना मुश्किल है, तो इसे पूरी तरह सफल रोजगार व्यवस्था कैसे माना जाए? युवाओं को ऐसी नौकरियां चाहिए जिनमें आय, सम्मान, सीखने का अवसर और भविष्य में आगे बढ़ने की संभावना हो।
जंतर-मंतर का आंदोलन सिर्फ परीक्षा का आंदोलन नहीं
यही वजह है कि जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं की मांग को सिर्फ परीक्षा व्यवस्था तक सीमित करके देखना समस्या को छोटा करके देखना होगा। परीक्षा की ईमानदारी जरूरी है, लेकिन उसके बाद रोजगार की गारंटी जैसी व्यापक आर्थिक चुनौती सामने है। युवा यह जानना चाहता है कि वह पढ़ाई क्यों करे, सालों तैयारी क्यों करे और अपनी जवानी प्रतियोगी परीक्षाओं में क्यों लगाए—अगर अंत में उपलब्ध अवसर बहुत कम हों।
भारत को अब ‘परीक्षा सुधार’ से आगे बढ़ना होगा
परीक्षा व्यवस्था को साफ और मजबूत करना जरूरी है। लेकिन इसके साथ-साथ देश को रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। ऐसे उद्योग चाहिए जो बड़ी संख्या में लोगों को काम दें। छोटे और मध्यम कारोबारों को बढ़ने का अवसर चाहिए। नए उद्यमों को निवेश और बाजार चाहिए। युवाओं की स्किल को उद्योग की जरूरत से जोड़ना होगा। और सबसे जरूरी बात—सरकार को यह देखना होगा कि आर्थिक विकास का फायदा रोजगार के रूप में युवाओं तक कितना पहुंच रहा है।
युवा सिर्फ नौकरी नहीं, भविष्य मांग रहा है
आज का युवा सिर्फ सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र नहीं मांग रहा। वह चाहता है कि उसकी पढ़ाई का मतलब हो, उसकी स्किल की कीमत हो और उसकी मेहनत उसे आगे ले जाए। परीक्षा व्यवस्था में सुधार उस दिशा में पहला कदम हो सकता है, लेकिन अंतिम समाधान नहीं। अगर परीक्षा की व्यवस्था बेदाग हो जाए लेकिन रोजगार के अवसर पर्याप्त न हों, तो युवाओं की बेचैनी खत्म नहीं होगी।
भारत के सामने असली चुनौती अब यही है—क्या हम युवाओं को सिर्फ परीक्षाओं के लिए तैयार करेंगे या उन्हें ऐसी अर्थव्यवस्था भी देंगे जहां परीक्षा पास करने के बाद उनके लिए सम्मानजनक नौकरी मौजूद हो? क्या स्किलिंग को वास्तविक रोजगार से जोड़ा जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल—अगर भारत दुनिया की सबसे युवा आबादियों में से एक है, तो इस युवा शक्ति के लिए पर्याप्त अच्छी नौकरियां कब और कैसे पैदा होंगी?



