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सवालों से भागते योगी आदित्यनाथ और बीजेपी सरकार के मंत्री; उल्टा पत्रकार को 2 मिनट में देख लेने और घर पर बुलडोजर चलाने की धमकी!

राष्ट्रीय/उत्तर प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | लखनऊ | 13 सितंबर 2026

सवाल पूछा तो सत्ता बौखलाई?

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ा विवाद अब सिर्फ एक पत्रकार के सवाल का मामला नहीं रह गया है। यह मामला सीधे पत्रकारिता की स्वतंत्रता, सत्ता की जवाबदेही और सवाल पूछने के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ गया है। महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने दावा किया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सवाल पूछने का अवसर नहीं मिला और प्रेस कॉन्फ्रेंस में एकतरफा बयान दिया गया। इसके बाद दिव्या ने आरोप लगाया कि उन्हें बीजेपी कार्यालय में घेरा गया, धमकाया गया, एलआईयू की पूछताछ का सामना करना पड़ा और यहां तक कहा गया कि उनके घर पर बुलडोजर चल सकता है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है, लेकिन सवाल बेहद बड़ा है—अगर पत्रकार का काम ही सत्ता से सवाल पूछना है, तो सवाल पूछने के बाद पत्रकार को डराने-धमकाने की नौबत क्यों आनी चाहिए?

‘मैंने योगी से सिर्फ एक सवाल पूछा था’

दिव्या श्रीवास्तव ने अपने इंटरव्यू में अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सिर्फ एक सवाल पूछा था। उनके मुताबिक, इसके बाद उन्हें बीजेपी कार्यालय में घेर लिया गया और धमकाया गया। दिव्या ने दावा किया कि उन्हें घर पर बुलडोजर चलाने की धमकी दी गई, एलआईयू उनके पीछे पड़ गई और उन्हें अपने चैनल से भी निकाल दिया गया। उन्होंने बेहद भावुक होकर कहा कि वह बहुत डरी हुई हैं और अब वह कहीं नहीं हैं। एक महिला पत्रकार का यह कहना कि वह सवाल पूछने के बाद डर गई है, किसी भी लोकतंत्र के लिए सामान्य बात नहीं हो सकती। अगर आरोप सही हैं तो यह पता लगाना जरूरी है कि पत्रकार को धमकाने वाला कौन था, किसके इशारे पर दबाव बनाया गया और क्या किसी सरकारी या राजनीतिक तंत्र का इसमें कोई संबंध था।

मुख्यमंत्री से सवाल नहीं तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों?

प्रेस कॉन्फ्रेंस का सीधा मतलब है—पत्रकार सवाल करेंगे और सरकार जवाब देगी। सरकार के सामने आसान सवाल आएं तो जवाब देना कोई बड़ी चुनौती नहीं है। असली परीक्षा तब होती है जब पत्रकार कोई असहज सवाल पूछता है, सरकार की किसी नीति पर सवाल उठाता है या जनता की परेशानी को सीधे मुख्यमंत्री के सामने रखता है। ऐसे सवालों से नाराज होने के बजाय सरकार को जवाब देना चाहिए। अगर सवाल गलत है तो तथ्य रखिए, अगर आरोप गलत है तो उसे गलत साबित कीजिए, अगर पत्रकार की जानकारी अधूरी है तो सही जानकारी दीजिए—लेकिन सवाल पूछने वाले को ही निशाने पर क्यों लाया जाए? यही वह बिंदु है जहां उत्तर प्रदेश की इस घटना ने पत्रकारिता और सत्ता के रिश्ते को लेकर गंभीर बहस पैदा कर दी है।

अखिलेश यादव का तंज—‘प्रेस वार्ता’ नहीं, ‘प्रेस एकालाप’

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि नाम बदलने वालों को अब ‘प्रेस वार्ता’ का नाम बदलकर ‘प्रेस एकालाप’ कर देना चाहिए। उनका कहना है कि जब केवल बयान दिया जाना है और पत्रकारों को सवाल पूछने का अधिकार ही नहीं है, तो बिना वार्तालाप के ‘वार्ता’ शब्द का अर्थ क्या रह जाता है। अखिलेश ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में सवालों की भरमार है, लेकिन जवाब नहीं हैं और आरोप लगाया कि सरकार सवालों से मुंह मोड़ रही है। यह विपक्ष का राजनीतिक हमला है, लेकिन इसने एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों को सिर्फ सुनने के लिए बुलाया जाएगा या सवाल पूछने का अधिकार भी मिलेगा?

मंत्री से सवाल पूछा तो बोले—‘दो मिनट में ठीक कर दूंगा’

इसी विवाद के बीच उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार गिरीश चन्द्र से सवाल पूछने वाले एक पत्रकार का वीडियो भी सामने आया है। पत्रकार ने मंत्री से सवाल किया तो मंत्री ने कहा कि वह उसे ‘दो मिनट में ठीक कर देंगे।’ पत्रकार ने भी पलटकर जवाब दिया कि वह भी उन्हें ठीक कर देगा। यह बातचीत अपने आप में तीखी थी, लेकिन इससे एक और सवाल खड़ा हुआ—मंत्री का काम पत्रकार को ‘ठीक करना’ है या उसके सवाल का जवाब देना? पत्रकार और मंत्री के बीच बहस हो सकती है, सवाल-जवाब में तीखापन भी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में सवाल का जवाब सवाल पूछने वाले को डराने की भाषा में नहीं, बल्कि तथ्यों के साथ दिया जाना चाहिए।

सवालों से भागना क्यों? जवाब देने में डर कैसा?

विपक्षी दलों ने इस घटना को बीजेपी नेताओं के पत्रकारों से संवाद के तरीके से जोड़कर हमला तेज कर दिया है। आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि सवालों से भागना बीजेपी की पुरानी आदत है और तंज किया कि महिला पत्रकार के सवालों का सामना करने की हिम्मत नहीं हुई तो मुख्यमंत्री योगी वहां से चले गए। पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा से जुड़ी एक घटना का हवाला देते हुए भी राजनीतिक हमला किया और कहा—‘नॉर्वे में प्रधानमंत्री मोदी भागे थे, अब योगी जी की बारी है।’ यह विपक्ष की राजनीतिक टिप्पणी है, लेकिन इसके पीछे उठाया गया सवाल महत्वपूर्ण है—देश और प्रदेश के बड़े नेता पत्रकारों के स्वतंत्र और असहज सवालों का सामना करने से आखिर क्यों बचें?

मोदी पर भी विपक्ष का पुराना सवाल—स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस कहां?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मीडिया से संवाद को लेकर विपक्ष और आलोचक लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप रहा है कि प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ऐसी स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस बहुत कम हुई हैं जहां पत्रकार बिना पहले से तय सवालों के सीधे प्रधानमंत्री से सवाल कर सकें। विपक्ष इसी आधार पर सवाल उठाता है कि अगर सरकार अपने काम को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है, तो फिर कठिन सवालों से बचने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? सत्ता की मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि उसके सामने कोई सवाल न उठे; बल्कि यह है कि सत्ता हर कठिन सवाल का जवाब देने का साहस दिखाए।

पत्रकारिता का काम जय-जयकार करना नहीं

पत्रकारिता का काम सरकार की जय-जयकार करना नहीं है। पत्रकार जनता और सत्ता के बीच सवालों का पुल होता है। जनता के पास सड़क की समस्या है तो पत्रकार सवाल पूछेगा, बेरोजगारी है तो सवाल पूछेगा, महंगाई है तो सवाल पूछेगा, कानून-व्यवस्था पर सवाल उठेंगे, भ्रष्टाचार के आरोपों पर सवाल होंगे और सरकार की नीतियों पर भी सवाल होंगे। अगर पत्रकार हर सवाल से पहले यह सोचने लगे कि सत्ता नाराज हो जाएगी, पार्टी के कार्यकर्ता घेर लेंगे, जांच एजेंसी पूछताछ करेगी या नौकरी चली जाएगी, तो फिर जनता की आवाज सत्ता के दरवाजे तक कौन लेकर जाएगा?

बुलडोजर की धमकी पर होनी चाहिए निष्पक्ष जांच

दिव्या श्रीवास्तव के आरोपों में घर पर बुलडोजर चलाने की धमकी का दावा सबसे गंभीर है। उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई पहले से ही राजनीतिक और कानूनी बहस का बड़ा विषय रही है। इसलिए अगर किसी पत्रकार को सचमुच ऐसी धमकी दी गई है तो मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। धमकी किसने दी? बीजेपी कार्यालय में पत्रकार को किसने घेरा? क्या वहां मौजूद लोगों की पहचान की गई? क्या कोई रिकॉर्डिंग या अन्य सबूत मौजूद है? एलआईयू ने किस आधार पर पूछताछ की? इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए। आरोप सही हैं तो दोषी पर कार्रवाई हो और आरोप गलत हैं तो तथ्य भी सार्वजनिक किए जाएं।

एलआईयू की पूछताछ पर भी जवाब चाहिए

दिव्या ने एलआईयू द्वारा पूछताछ किए जाने का भी दावा किया है। अगर उनके खिलाफ कोई कानूनी मामला था या कोई स्पष्ट सुरक्षा संबंधी कारण था, तो उसका आधार सामने आना चाहिए। लेकिन अगर उन्हें केवल इसलिए पूछताछ का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल पूछा था, तो यह बेहद चिंताजनक होगा। लोकतंत्र में पत्रकार से पूछताछ उसके अपराध के आधार पर होनी चाहिए, उसके सवाल के आधार पर नहीं। इसलिए इस पूरे मामले में पारदर्शिता जरूरी है।

पत्रकार डर गया तो जनता की आवाज कौन उठाएगा?

आज मामला दिव्या श्रीवास्तव का है, कल किसी दूसरे पत्रकार का हो सकता है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस पत्रकार ने किस नेता से क्या पूछा। सवाल यह है कि क्या पत्रकार सत्ता के सामने खड़े होकर बिना डर के सवाल पूछ सकता है? अगर पत्रकारों को यह डर सताने लगे कि सरकार या सत्ताधारी दल नाराज हुआ तो उनके खिलाफ दबाव बनाया जा सकता है, तो सबसे पहले कमजोर होगी जनता की आवाज। क्योंकि पत्रकार को चुप कराने का असर सिर्फ न्यूज़रूम तक नहीं रहता, उसकी आवाज उन लाखों लोगों तक जाती है जिनकी शिकायत और सवाल सत्ता तक पहुंचना चाहिए।

कानून तोड़ने का आरोप है तो कार्रवाई कीजिए

यह भी स्पष्ट है कि अगर किसी पत्रकार ने कोई कानून तोड़ा है, कोई अपराध किया है या उसके खिलाफ कोई वैध शिकायत है, तो कानून को अपना काम करना चाहिए। पत्रकार होना किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाता। लेकिन कानून और डराने-धमकाने में फर्क है। अगर अपराध है तो प्राथमिकी दर्ज कीजिए, जांच कीजिए, सबूत रखिए और कानून के मुताबिक कार्रवाई कीजिए। लेकिन अगर मामला केवल सत्ता से सवाल पूछने का है, तो सवाल पूछने वाले को निशाना बनाना लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।

सत्ता के पास ताकत है, पत्रकार के पास सवाल

मुख्यमंत्री के पास प्रशासन है, मंत्री के पास सरकारी तंत्र है, सत्ताधारी दल के पास संगठन की ताकत है। पत्रकार के पास सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसका सवाल है। यही सवाल जनता की समस्या को सामने लाता है और यही सवाल सरकार को जवाबदेह बनाता है। इसलिए लोकतंत्र में सवाल को दुश्मन नहीं, व्यवस्था को मजबूत करने वाला हथियार माना जाना चाहिए। सरकार सवालों का सामना करेगी तो जनता का भरोसा बढ़ेगा; सवालों से बचने की कोशिश होगी तो संदेह और बढ़ेगा।

अब योगी सरकार और बीजेपी से सीधे सवाल

अगर दिव्या श्रीवास्तव का सवाल गलत था तो उसका जवाब क्यों नहीं दिया गया? अगर पत्रकार के खिलाफ कोई शिकायत थी तो वह क्या थी? बीजेपी कार्यालय में उन्हें किसने घेरा? उन्हें धमकाने वाला कौन था? घर पर बुलडोजर चलाने की बात किसने कही? एलआईयू ने किस आधार पर पूछताछ की? और अगर इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है तो सरकार सामने आकर पूरी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करती?

सवालों का जवाब सवाल दबाकर नहीं, जवाब देकर दिया जाता है।प्रधानमंत्री हों मुख्यमंत्री हों या मंत्री—पत्रकार सवाल पूछेगा तो जवाब देना पड़ेगा। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह नहीं है। गुनाह तब होगा, जब सत्ता सवाल सुनना ही बंद कर दे। सवालों से तानाशाह भागता है, जनसेवक नहीं।

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