अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 8 सितंबर 2026
कल तक मंच पर नाच रहे थे, अब युद्ध के लिए तैयार किए जा रहे हैं
चीन में पिछले महीने हुए विश्व ह्यूमनॉइड रोबोट खेलों में इंसानों जैसे रोबोट दौड़ते, मुक्केबाजी करते और नाचते दिखाई दिए। दर्शकों के लिए यह तकनीक और मनोरंजन का शानदार प्रदर्शन था, लेकिन खेल खत्म होने के सिर्फ दो दिन बाद चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के आधिकारिक अखबार ने इस तकनीक को युद्ध से जोड़ते हुए प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक को सैन्य प्रशिक्षण तक तेजी से पहुंचाने की जरूरत बताई। रॉयटर्स की 100 से ज्यादा सैन्य खरीद सूचनाओं, शोध पत्रों, पेटेंट, सरकारी दस्तावेजों और रक्षा कंपनियों की सामग्री की समीक्षा के अनुसार चीन अब ह्यूमनॉइड रोबोटों के संभावित सैन्य इस्तेमाल पर तेजी से काम कर रहा है।
चीन का अगला सैन्य हथियार इंसान जैसा रोबोट?
चीन में सैन्य संस्थान ऐसे रोबोट और उनसे जुड़ी तकनीक हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल सैनिकों के साथ मिलकर किया जा सके। शोध का फोकस केवल रोबोट का शरीर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी देखने-समझने की क्षमता, वस्तुओं को पकड़ने और इस्तेमाल करने की क्षमता, जमीन को समझने और युद्ध जैसी परिस्थितियों के लिए प्रशिक्षण पर भी है। रॉयटर्स के अनुसार इस दिशा में गतिविधियां 2025 और 2026 में तेज हुई हैं। चीन के निर्माताओं की वैश्विक ह्यूमनॉइड रोबोट आपूर्ति में करीब 95 प्रतिशत हिस्सेदारी होने का अनुमान भी सामने आया है, जिससे देश के पास तेजी से बढ़ते औद्योगिक आधार को सैन्य जरूरतों से जोड़ने का बड़ा अवसर मौजूद है।
शहर में कमरा-दर-कमरा लड़ेंगे रोबोट?
चीन के सैन्य शोध में भविष्य के युद्ध का एक बेहद चौंकाने वाला मॉडल भी सामने आया है। 2025 के एक शोध पत्र में चीन की राष्ट्रीय रक्षा प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ऐसे शहरी हमले की कल्पना की जिसमें छह ‘कॉम्बैट रोबोट’ दो सैन्य टीमों के साथ काम करेंगे। इनमें ह्यूमनॉइड, रोबोट कुत्ते और बिना चालक वाले वाहन शामिल हो सकते हैं। उनका काम दुश्मन के कब्जे वाली इमारत में सैनिकों के साथ प्रवेश करना और मंजिल-दर-मंजिल तथा कमरे-दर-कमरे अभियान में मदद करना होगा। अभी यह एक शोध आधारित भविष्य की परिकल्पना है, किसी सक्रिय युद्धक इकाई के इस्तेमाल का प्रमाण नहीं है।
दुश्मन की सीमा में घुसपैठ से लेकर निगरानी तक
चीन के सैन्य शोध में ह्यूमनॉइड रोबोटों के लिए सिर्फ हमला करने की भूमिका नहीं सोची जा रही। 2025 में एक सैन्य विश्वविद्यालय की प्रतियोगिता में रोबोटों के लिए ‘दुश्मन की सीमा के पीछे घुसपैठ’ जैसा अभ्यास रखा गया था, जिसमें उन्हें किसी क्षेत्र में प्रवेश कर उसका नक्शा तैयार करना और लक्ष्यों का पता लगाना था। दूसरे प्रयोगों में सैन्य ठिकानों पर पहचान जांच, सुरक्षा गश्त और अनुशासन संबंधी निगरानी जैसे कामों की कल्पना की गई। यानी भविष्य में ऐसे रोबोट सिर्फ हथियार उठाने वाले मशीन नहीं, बल्कि युद्ध क्षेत्र में सैनिकों के साथ काम करने वाले बहुउद्देश्यीय सिस्टम के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
पीएलए ने रोबोट खरीदने पर भी पैसा लगाया
चीन की सैन्य खरीद सूचनाएं इस दिशा में बढ़ती दिलचस्पी का संकेत देती हैं। मई 2025 में पीएलए ने एक ह्यूमनॉइड रोबोट खरीदने के लिए निविदा जारी की थी, जिसमें स्थापना और तकनीकी प्रशिक्षण भी शामिल था। कुछ महीनों बाद एक दूसरी खरीद सूचना में ह्यूमनॉइड रोबोट के लिए बुद्धिमान धारणा और कुशल संचालन प्रणाली मांगी गई। जून 2026 में पीएलए ने करीब 3 लाख डॉलर ऐसे सिस्टम के लिए बजट किया, जिसका इस्तेमाल ह्यूमनॉइड रोबोटों के लिए कैमरा, रडार और गति संबंधी आंकड़े इकट्ठा करने और उन्हें प्रशिक्षण के लिए तैयार करने में किया जाना था। हालांकि रॉयटर्स यह पता नहीं लगा सका कि इन निविदाओं को किस कंपनी ने हासिल किया और वास्तव में कौन से रोबोट सेना को मिले।
अब रक्षा कंपनियां भी मैदान में
2026 तक यह तकनीक चीन की सैन्य अकादमिक दुनिया से निकलकर रक्षा उद्योग तक पहुंचती दिखाई दे रही है। चीन की सरकारी रक्षा कंपनी नोरिन्को ने ‘फूशी’ नाम का पूर्ण आकार का ह्यूमनॉइड रोबोट पेश किया है। कंपनी की सामग्री के अनुसार इसे सुरक्षा ड्यूटी, हर मौसम में निगरानी, गश्त और खतरनाक परिस्थितियों में काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी एक खास क्षमता दूर बैठे इंसान द्वारा इसे नियंत्रित करना है। यही व्यवस्था फिलहाल एक बड़ी तकनीकी समस्या को कम कर सकती है—यानी हर महत्वपूर्ण फैसला रोबोट को खुद लेने की जरूरत नहीं होगी।
लेकिन अभी ये रोबोट युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं
यह तस्वीर जितनी भविष्य की लगती है, उतनी ही महत्वपूर्ण इसकी सीमाएं भी हैं। रॉयटर्स को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि चीन ने किसी हथियारबंद ह्यूमनॉइड रोबोट को पीएलए की किसी सक्रिय सैन्य इकाई में तैनात कर दिया है। वर्तमान ह्यूमनॉइड रोबोट ऊर्जा की भारी जरूरत, सीमित भरोसेमंद क्षमता और नियंत्रित परिस्थितियों से बाहर अस्थिर प्रदर्शन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। युद्ध का मैदान प्रयोगशाला या प्रतियोगिता के मंच से कहीं अधिक कठिन होता है—मलबा, धुआं, मौसम, गोलाबारी, असमान जमीन और अचानक बदलती परिस्थितियां रोबोट के लिए बड़ी चुनौती हैं।
अमेरिका भी पीछे नहीं, लेकिन चीन की बढ़त बड़ी
यह दौड़ सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है। अमेरिका की सेना भी सैनिकों के साथ काम करने वाले सैन्य ह्यूमनॉइड रोबोट विकसित करने की दिशा में प्रतियोगिता शुरू कर चुकी है। इनके संभावित इस्तेमाल में निगरानी, सुरक्षा, बाधाएं हटाना, खतरनाक पदार्थों से जुड़े अभियान और शहरी इलाके में आक्रामक तथा रक्षात्मक मिशन शामिल हैं। लेकिन दो पैरों और चार पैरों वाले रोबोटों के विकास और उत्पादन में चीन इस समय अमेरिका से काफी आगे दिखाई देता है। यही वजह है कि चीन की विशाल रोबोट निर्माण क्षमता अब उसके सैन्य शोध के लिए भी महत्वपूर्ण रणनीतिक ताकत बन सकती है।
सबसे बड़ा सवाल—जब मशीन को युद्ध में भेजेंगे, फैसला कौन करेगा?
ह्यूमनॉइड रोबोटों को युद्ध के मैदान में भेजने की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी भी है। युद्ध के नियमों के अनुसार सैनिकों को लड़ाकों और आम नागरिकों के बीच अंतर करना होता है और घायल या आत्मसमर्पण कर चुके व्यक्ति पर हमला नहीं किया जा सकता। अगर किसी मशीन को लक्ष्य पहचानने और हमला करने की क्षमता दी जाती है, तो सवाल उठता है कि गलती होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी और आत्मसमर्पण के संकेत जैसी जटिल मानवीय परिस्थितियों को मशीन कैसे समझेगी। चीन के रक्षा मंत्रालय ने भी मार्च में कहा था कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित हथियार मानव नियंत्रण में रहने चाहिए।
चीन के वैज्ञानिक का दावा—शर्तें पूरी हुईं तो रोबोट युद्ध में उतरेंगे
चीन की सैन्य विज्ञान अकादमी के शोधकर्ता वांग योंगहुआ ने नवंबर की एक टिप्पणी में माना था कि ह्यूमनॉइड रोबोटों के सामने अभी चलने-फिरने, वातावरण को समझने और बुद्धिमत्ता से जुड़ी कई अनसुलझी समस्याएं हैं। लेकिन अगर तकनीकी सफलता मिलती है, लागत घटती है और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होता है, तो भविष्य में ह्यूमनॉइड रोबोट बड़ी संख्या में युद्ध के मैदान तक पहुंच सकते हैं। यानी आज जो रोबोट खेल के मैदान में दौड़ रहा है, वह जरूरी नहीं कि कल सैनिकों के बीच खड़ा हो—लेकिन चीन जिस तेजी से इस दिशा में निवेश और शोध कर रहा है, उससे भविष्य की जंग में इंसान के साथ मशीन के उतरने की संभावना अब विज्ञान-कथा भर नहीं रह गई है।




