राष्ट्रीय / स्वास्थ्य | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 सितंबर 2026
रेबीज वैक्सीन पर उठे गंभीर सवाल
रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन को लेकर देश में गंभीर चिंता पैदा हो गई है। जांच के दायरे में आई ‘अभयरैब’ रेबीज वैक्सीन की कुछ शीशियों को अनिवार्य गुणवत्ता जांच में मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया है। मामला इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि दिल्ली में एक बिना लाइसेंस वाले परिसर से ऐसी शीशियां बरामद की गईं, जिन पर वास्तविक वैक्सीन की एक असली खेप के बैच नंबर और विवरण दर्ज थे। इसके बाद केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कसौली ने जांचे गए नमूनों को “मानक गुणवत्ता की नहीं” और “गलत लेबल वाली” श्रेणी में रखा। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कहीं असली वैक्सीन के बैच की पहचान का इस्तेमाल नकली उत्पाद तैयार करने या बाजार में पहुंचाने के लिए तो नहीं किया गया।
रेबीज में गलती की कोई गुंजाइश नहीं
इस मामले को सामान्य दवा गुणवत्ता विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता। रेबीज के लक्षण एक बार शुरू होने के बाद यह बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा होती है। इसके विपरीत, किसी संक्रमित या संदिग्ध जानवर के काटने के बाद समय पर और सही गुणवत्ता वाली पोस्ट-एक्सपोजर वैक्सीन देने से बीमारी को रोकने में मदद मिलती है। यही वजह है कि जांच में सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि संदिग्ध शीशियां कहां बनीं या कहां से मिलीं, बल्कि यह भी है कि क्या किसी ऐसे व्यक्ति को यह उत्पाद दिया गया जिसने कुत्ते या किसी दूसरे संभावित संक्रमित जानवर के काटने के बाद रेबीज से बचाव के लिए वैक्सीन लगवाई थी?
सबसे बड़ा खतरा—इलाज हुआ या सिर्फ इलाज का भ्रम?
रेबीज के मामले में नकली या कम प्रभावी वैक्सीन का खतरा बेहद गंभीर हो सकता है। किसी व्यक्ति को अगर यह विश्वास हो जाए कि उसे सही वैक्सीन मिल चुकी है, तो वह अतिरिक्त चिकित्सा सलाह या वैकल्पिक उपचार लेने में देरी कर सकता है। यही वह स्थिति है जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ सबसे ज्यादा चिंताजनक मानेंगे। एक असली और प्रभावी वैक्सीन व्यक्ति को जीवन बचाने वाला संरक्षण दे सकती है, लेकिन नकली या मानक से कम उत्पाद सुरक्षा मिलने का सिर्फ भ्रम पैदा कर सकता है। इसलिए अब यह पता लगाना बेहद जरूरी है कि जांच में आए नमूनों का इस्तेमाल किन लोगों पर हुआ और क्या किसी मरीज को दोबारा टीकाकरण की जरूरत है।
असली बैच नंबर संदिग्ध शीशियों पर कैसे पहुंचा?
इस पूरे मामले का सबसे रहस्यमय और महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। अधिकारियों को ऐसे शीशी और पैकिंग विवरण मिले जिन पर एक वास्तविक अभयरैब बैच की पहचान दर्ज थी। अब जांचकर्ताओं के सामने सवाल है कि यह बैच नंबर और उससे जुड़े विवरण संदिग्ध उत्पाद पर कैसे पहुंचे। क्या किसी असली बैच की पैकेजिंग या लेबल की नकल की गई? क्या असली और नकली उत्पाद को मिलाने की कोशिश हुई? या फिर किसी और तरीके से इन शीशियों पर असली बैच की पहचान इस्तेमाल की गई? इस सवाल का जवाब मिलना पूरे नेटवर्क का पता लगाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
बिना लाइसेंस वाले परिसर ने बढ़ाया संदेह
दिल्ली में जिस स्थान से संदिग्ध शीशियां बरामद हुईं, वह लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन निर्माण या वितरण केंद्र नहीं था। यही तथ्य जांच को और गंभीर बनाता है। वैक्सीन जैसी संवेदनशील दवा के उत्पादन, भंडारण और वितरण के लिए कड़े नियम होते हैं। ऐसे में किसी बिना लाइसेंस वाले परिसर से संदिग्ध वैक्सीन मिलना इस बात की जांच की मांग करता है कि वहां क्या गतिविधि चल रही थी, उत्पाद कहां से आया और उसे आगे कहां भेजा जाना था। जांच केवल बरामद शीशियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनके पीछे मौजूद पूरी आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंचना जरूरी है।
केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला की रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
इस मामले में केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला, कसौली की जांच रिपोर्ट बेहद अहम है। प्रयोगशाला ने जांच किए गए नमूनों को मानक गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाया और उन्हें गलत लेबलिंग से भी जोड़ा। इसका अर्थ यह है कि नमूने निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। हालांकि इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि बाजार में मौजूद हर ‘अभयरैब’ वैक्सीन नकली है। जांच विशेष रूप से बरामद और जांचे गए नमूनों तथा उनसे जुड़े बैच और आपूर्ति श्रृंखला पर केंद्रित है। इसलिए लोगों को घबराने के बजाय अपने वैक्सीन रिकॉर्ड, बैच नंबर और डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
कंपनी की असली वैक्सीन और जांच में मिले उत्पाद को अलग-अलग देखना जरूरी
‘अभयरैब’ का निर्माण ह्यूमन बायोलॉजिकल्स इंस्टीट्यूट करता है। जांच का केंद्र यह पता लगाना है कि असली निर्माता द्वारा तैयार उत्पाद और दिल्ली में मिले संदिग्ध उत्पाद के बीच क्या संबंध है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी ने वास्तविक बैच की पहचान का इस्तेमाल करके अलग उत्पाद बाजार में उतारा, तो यह बेहद गंभीर आपराधिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला होगा। लेकिन जब तक पूरी जांच सामने नहीं आती, तब तक पूरे ब्रांड या निर्माता की सभी वैक्सीन को नकली बताना भी सही नहीं होगा।
जिन लोगों ने हाल में वैक्सीन लगवाई है, उनके लिए क्या महत्वपूर्ण है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन लोगों को हाल में कुत्ते, बिल्ली, बंदर या किसी अन्य संभावित रेबीज संक्रमित जानवर ने काटा या खरोंचा है और उन्होंने पोस्ट-एक्सपोजर वैक्सीन ली है, वे अपने वैक्सीन कार्ड, अस्पताल की रसीद और शीशी या पैकेट पर दर्ज बैच नंबर को सुरक्षित रखें। अगर किसी को अपनी वैक्सीन के बैच को लेकर संदेह है तो उसे स्वयं निर्णय लेने के बजाय तुरंत डॉक्टर या संबंधित स्वास्थ्य विभाग से संपर्क करना चाहिए। रेबीज के मामले में टीकाकरण का कार्यक्रम बीच में छोड़ना या अपने स्तर पर बदलना सुरक्षित नहीं है।
अब सरकार को सिर्फ नकली वैक्सीन ढूंढने से आगे जाना होगा
सरकार और नियामक एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ा काम पूरे नेटवर्क को पकड़ना है। संदिग्ध उत्पाद कहां तैयार हुआ, कच्चा माल कहां से आया, पैकेजिंग और लेबल कहां तैयार हुए, उत्पाद किन वितरकों या अस्पतालों तक पहुंचा और कितने मरीजों तक इसकी पहुंच हुई—इन सभी सवालों का जवाब जरूरी है। साथ ही संदिग्ध बैच की देशभर में आपूर्ति और उपयोग की ट्रेसिंग की जानी चाहिए। यदि किसी मरीज को ऐसा उत्पाद दिया गया है जिसकी पोटेंसी मानक से कम पाई गई है, तो उसे समय पर चिकित्सकीय सलाह मिलनी चाहिए।
मरीजों की सूची और बैच की पहचान अब सबसे अहम
जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि संदिग्ध बैच की कितनी शीशियां बनीं या बाजार में पहुंचीं और किन स्थानों पर उनकी आपूर्ति हुई। अस्पतालों और वैक्सीन केंद्रों से बैच रिकॉर्ड मिलान करना इस जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। अगर संदिग्ध उत्पाद किसी अस्पताल या क्लीनिक तक पहुंचा है तो वहां से मरीजों की पहचान करना जरूरी होगा। एक-एक शीशी और एक-एक मरीज का रिकॉर्ड मिलाना इस मामले में जान बचाने वाला कदम साबित हो सकता है।
नकली दवा का कारोबार सिर्फ कानून-व्यवस्था नहीं, जीवन-मृत्यु का मामला है
नकली दवाओं का कारोबार पहले भी चिंता का विषय रहा है, लेकिन रेबीज वैक्सीन के मामले में जोखिम और भी गंभीर है। यहां नकली या कम प्रभावी उत्पाद किसी व्यक्ति को यह भरोसा दे सकता है कि उसे बीमारी से सुरक्षा मिल चुकी है, जबकि वास्तविक सुरक्षा शायद मिली ही न हो। यही कारण है कि इस मामले में दोषियों की पहचान और गिरफ्तारी के साथ-साथ मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
अंतिम सवाल—कितने लोगों तक पहुंची संदिग्ध वैक्सीन?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल अभी अनुत्तरित है—दिल्ली में मिले संदिग्ध अभयरैब उत्पाद की कितनी शीशियां थीं और क्या उनमें से कोई मरीजों को दी जा चुकी थी? जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, चिंता बनी रहेगी। केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला की रिपोर्ट ने जांच का रास्ता खोल दिया है, लेकिन अब असली चुनौती यह पता लगाना है कि संदिग्ध उत्पाद कहां से आया और कितनी दूर तक पहुंचा। रेबीज जैसी बीमारी के मामले में समय की कीमत जीवन है। इसलिए इस जांच में देरी नहीं, बल्कि तेज कार्रवाई, पूरी ट्रेसिंग और हर प्रभावित मरीज तक तत्काल चिकित्सा जानकारी पहुंचाना सबसे जरूरी है।




