ओपिनियन/ अर्थव्यवस्था/ व्यापार | सुनील कुमार सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 सितंबर 2026
7.8% की चमक, लेकिन आंकड़ों की बुनियाद पर बड़ा सवाल
मोदी सरकार अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था के 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ने का दावा कर रही है। सरकार के लिए यह आंकड़ा आर्थिक मजबूती का प्रमाण है और इसे देश की तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन अब इसी 7.8 प्रतिशत के आंकड़े की बुनियाद को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP की गणना में इस्तेमाल किए गए आधार और पिछले साल के आंकड़ों में हुए बड़े बदलाव पर सवाल खड़े किए हैं। सबसे चुभता हुआ सवाल यही है—पहले अप्रैल-जून 2025 की GDP करीब ₹86 लाख करोड़ बताई गई थी, फिर वही आंकड़ा नई GDP श्रृंखला में करीब ₹80 लाख करोड़ कैसे हो गया? करीब ₹6 लाख करोड़ की यह भारी कमी आखिर किस आधार पर की गई?
₹86 लाख करोड़ से ₹80 लाख करोड़—यही है असली कहानी
पूरे विवाद को समझना बहुत आसान है। अप्रैल-जून 2025 की तिमाही के लिए पुरानी GDP श्रृंखला में मौजूदा कीमतों पर GDP करीब ₹86.05 लाख करोड़ बताई गई थी। इसके बाद सरकार ने GDP की नई श्रृंखला जारी की और आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया। नई श्रृंखला में उसी अवधि का आंकड़ा करीब ₹80.3 लाख करोड़ हो गया। यानी एक ही आर्थिक अवधि के लिए पुराने और नए आंकड़े में लगभग ₹6 लाख करोड़ का अंतर दिखाई दिया। सरकार का कहना है कि यह नई पद्धति, नए आंकड़ों और संशोधन की वजह से हुआ। लेकिन यहीं से सवाल उठता है—अगर अर्थव्यवस्था का वास्तविक आकार इतना बदल गया, तो सरकार ने जनता को यह साफ-साफ क्यों नहीं बताया कि ₹86 लाख करोड़ में से करीब ₹6 लाख करोड़ आखिर कहां चले गए?
गर्ग का निशाना 7.8% पर नहीं, उसके बदले हुए आधार पर
सुभाष चंद्र गर्ग की पूरी आपत्ति को समझना जरूरी है। उनका सवाल यह नहीं है कि ₹80 लाख करोड़ से ₹88.27 लाख करोड़ करने पर 7.8 प्रतिशत का गणित बनता है या नहीं। उनका सवाल इससे पहले का है। उनका कहना है कि पहले जिस आधार पर अर्थव्यवस्था को ₹86 लाख करोड़ बताया गया था, उसी अवधि का आंकड़ा बाद में करीब ₹80 लाख करोड़ क्यों कर दिया गया? अगर पिछले साल का आधार ही नीचे चला गया, तो अगले साल की वृद्धि दर अपने आप ज्यादा बड़ी दिखाई दे सकती है। इसलिए गर्ग चाहते हैं कि सरकार सिर्फ अंतिम 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा न बताए, बल्कि यह भी बताए कि पुराने आंकड़े में इतनी बड़ी कटौती क्यों की गई।
2.6% का दावा—सरकार के लिए सबसे असहज सवाल
गर्ग की गणना के अनुसार, अगर Q1 2025-26 के पहले जारी करीब ₹86.05 लाख करोड़ के आंकड़े की तुलना Q1 2026-27 के करीब ₹88.27 लाख करोड़ से की जाए, तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि लगभग 2.6 प्रतिशत बैठती है। नई श्रृंखला में पिछले साल का आधार करीब ₹80 लाख करोड़ किए जाने के बाद वृद्धि का आंकड़ा काफी ऊंचा दिखाई देता है। हालांकि यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2.6 प्रतिशत को आधिकारिक वास्तविक GDP वृद्धि दर कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि पुरानी और नई GDP श्रृंखलाओं के आंकड़ों को सीधे मिलाकर तुलना करना उचित नहीं माना जाता। लेकिन गर्ग का मूल सवाल फिर भी अपनी जगह खड़ा है—पुराने आधार में इतनी बड़ी कमी क्यों हुई?
सिर्फ ‘नई सीरीज’ कह देने से सवाल खत्म नहीं होता
GDP की आधार वर्ष श्रृंखला बदलना अपने आप में कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है। सरकार समय-समय पर नई जानकारी, नए स्रोत और बेहतर गणना पद्धति को शामिल कर सकती है। लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब नई श्रृंखला आने के बाद पुराने आंकड़ों में इतनी बड़ी गिरावट दिखाई दे। अगर सरकार का दावा है कि नई गणना ज्यादा सटीक है, तो उसे जनता के सामने क्षेत्रवार पूरा हिसाब रखना चाहिए। विनिर्माण में कितना बदलाव हुआ? खपत के आंकड़े कितने बदले? निवेश में कितना संशोधन हुआ? सेवाओं के आंकड़ों में क्या बदलाव हुआ? आखिर करीब ₹6 लाख करोड़ की कमी किन हिस्सों से आई? यही वह जानकारी है जिसके बिना आम आदमी के लिए GDP की पूरी तस्वीर समझना मुश्किल है।
‘फैब्रिकेटेड GDP’ का आरोप और बढ़ता विवाद
इसी वजह से विपक्ष और आलोचक अब GDP के आंकड़ों को लेकर सरकार पर तीखा हमला कर रहे हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी GDP के आंकड़ों में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए सरकार से सवाल पूछे हैं। वहीं सोशल मीडिया पर इसे “फैब्रिकेटेड GDP” तक कहा जा रहा है। हालांकि यह कहना कि सरकार ने जानबूझकर GDP के आंकड़े गढ़े हैं, अभी स्थापित तथ्य नहीं है। लेकिन आंकड़ों में हुए बड़े संशोधन, आधार वर्ष बदलने और गणना की पद्धति को लेकर उठ रहे सवाल इतने गंभीर हैं कि उन्हें केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज करना भी आसान नहीं है।
रघुराम राजन का सवाल—अगर इतनी तेज वृद्धि है तो नौकरियां कहां हैं?
GDP विवाद को और धार देते हुए पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने आर्थिक वृद्धि की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। उनका सवाल है कि अगर भारत इतनी तेज गति से बढ़ रहा है तो पर्याप्त अच्छी नौकरियां क्यों नहीं बन रही हैं? निजी निवेश में अपेक्षित तेजी क्यों नहीं दिखाई दे रही? विदेशी निवेश को लेकर भी चिंता क्यों बनी हुई है? यह सवाल GDP की गणना से अलग है, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि आम आदमी के लिए अर्थव्यवस्था का मतलब केवल कागज पर बढ़ता प्रतिशत नहीं है। उसके लिए अर्थव्यवस्था का मतलब है नौकरी, आमदनी, कारोबार, मांग और परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार।
सूरत का कपड़ा उद्योग पूछ रहा है—7.8% की तेजी आखिर कहां है?
जयराम रमेश ने सूरत के कपड़ा उद्योग की स्थिति को भी GDP के दावे के सामने रखकर सवाल उठाया है। उनके अनुसार सूरत का कपड़ा उद्योग मांग में कमजोरी, बढ़ती उत्पादन लागत और मजदूरों की कमी से जूझ रहा है। कारोबारियों के अनुसार धागे, रसायन, डाई, बिजली और दूसरी लागत बढ़ गई है, जबकि बाजार में तैयार कपड़े की मांग कमजोर हुई है। उत्पादन लागत में 20 से 25 प्रतिशत तक वृद्धि और बिक्री में कमजोरी की शिकायतें भी सामने आई हैं। सवाल यह है कि अगर अर्थव्यवस्था सचमुच इतनी तेज गति से दौड़ रही है, तो देश के बड़े उत्पादन केंद्रों में कारोबारियों को मांग और लागत का इतना दबाव क्यों महसूस हो रहा है?
महंगाई के आंकड़े ने भी बढ़ाई बेचैनी
GDP की वास्तविक वृद्धि निकालते समय महंगाई के असर को अलग किया जाता है। इसी जगह GDP डिफ्लेटर की भूमिका आती है। आलोचकों ने इस बात पर भी सवाल उठाए हैं कि GDP में दिखाई जा रही वास्तविक वृद्धि और आम लोगों द्वारा महसूस की जाने वाली महंगाई के बीच कितना अंतर है। जब रसोई, उत्पादन लागत और बाजार की कीमतों का अनुभव अलग दिखाई दे और दूसरी तरफ GDP में बहुत तेज वास्तविक वृद्धि दिखाई जाए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आंकड़ों की गणना और जमीन की आर्थिक गतिविधि के बीच इतना अंतर क्यों है?
सरकार के लिए अब असली परीक्षा—आलोचकों को चुप कराना नहीं, आंकड़ों को खोलना
मोदी सरकार के पास इस विवाद का सबसे मजबूत जवाब राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि पूरा और पारदर्शी डेटा है। अगर ₹86.05 लाख करोड़ से करीब ₹80 लाख करोड़ की गिरावट पूरी तरह नई गणना पद्धति का नतीजा है, तो सरकार को एक-एक क्षेत्र का हिसाब सामने रखना चाहिए। यह बताना चाहिए कि पुराने आंकड़ों में क्या-क्या बदला, किस वजह से बदला और नई श्रृंखला पुराने मुकाबले कितनी अधिक सटीक है। अगर सरकार ऐसा करती है तो बहस काफी हद तक खत्म हो सकती है। लेकिन अगर जवाब सिर्फ इतना हो कि “नई सीरीज है, इसलिए आंकड़ा बदल गया”, तो सवाल और गहरे होंगे।
GDP कोई चुनावी जुमला नहीं, देश की आर्थिक सच्चाई का आईना है
GDP का आंकड़ा सरकार की उपलब्धि बताने का साधन जरूर हो सकता है, लेकिन वह किसी राजनीतिक प्रचार का नारा नहीं होना चाहिए। 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा तभी जनता के भरोसे का आंकड़ा बनेगा, जब उसके पीछे का पूरा गणित भी जनता के सामने साफ हो। केवल बड़ा प्रतिशत दिखाकर यह साबित नहीं किया जा सकता कि देश की हर आर्थिक समस्या खत्म हो गई है। बेरोजगारी, निजी निवेश, औद्योगिक मांग, छोटे कारोबारों की स्थिति और लोगों की आय—इन सभी को साथ देखकर ही अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर बनती है।
सुभाष चंद्र गर्ग को गलत कह देना आसान, ₹6 लाख करोड़ का हिसाब देना मुश्किल
गर्ग की 2.6 प्रतिशत वाली गणना पर तकनीकी सवाल उठाए जा सकते हैं और पुरानी तथा नई GDP श्रृंखला को मिलाकर आधिकारिक विकास दर निकालना उचित नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे उनका सबसे बड़ा सवाल खत्म नहीं हो जाता। ₹86 लाख करोड़ से करीब ₹80 लाख करोड़ का बदलाव क्यों हुआ? यही वह सवाल है जिसका साफ, विस्तृत और आंकड़ों सहित जवाब देश को चाहिए।
अब सरकार से सीधा सवाल
1. अगर 7.8 प्रतिशत की GDP पूरी तरह सही है, तो पूरा हिसाब सामने रखिए।
2. पहले ₹86 लाख करोड़ क्यों बताया गया था?
3. फिर वही आंकड़ा करीब ₹80 लाख करोड़ क्यों हुआ?
4. करीब ₹6 लाख करोड़ की कमी किन क्षेत्रों में हुई?
5. नई पद्धति ने ऐसा क्या बदला कि पिछले साल की अर्थव्यवस्था का आकार ही इतना नीचे चला गया?
6. और सबसे बड़ा सवाल—अगर कागज पर अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की रफ्तार से दौड़ रही है, तो रोजगार, निजी निवेश, उद्योग और बाजार की मांग में उसकी रफ्तार उसी ताकत से क्यों दिखाई नहीं दे रही?
देश को जुमला नहीं, GDP का पूरा हिसाब चाहिए।




