अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काहिरा | 3 सितंबर 2026
10 साल बाद मिस्र पहुंचे शी, अमेरिका के सामने चीन की बड़ी कूटनीतिक चाल
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब 10 साल बाद मिस्र पहुंचे हैं और उनकी यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब मध्य-पूर्व पहले से ही युद्ध, तनाव और टूटते व्यापारिक रास्तों की मार झेल रहा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध, लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और दुनिया के कारोबार पर पड़ रहे असर के बीच चीन का मिस्र के साथ रिश्ते मजबूत करना सिर्फ दो देशों की सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा। इसके पीछे चीन की मध्य-पूर्व में अपनी पकड़ बढ़ाने की बड़ी रणनीति दिखाई दे रही है।
मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी लंबे समय से अमेरिका के साथ अपने पुराने रिश्ते बनाए रखते हुए चीन, रूस और दूसरे देशों के साथ भी संबंध मजबूत कर रहे हैं। इसे काहिरा की ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का हिस्सा माना जा रहा है। यानी मिस्र किसी एक खेमे पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग ताकतों के साथ संबंध बनाकर अपने विकल्प बढ़ाना चाहता है।
मिस्र चीन के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
मिस्र चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है। सबसे बड़ी वजह है स्वेज नहर। यह नहर भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। खासकर ऐसे समय में जब लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते युद्ध और तनाव से प्रभावित हैं, स्वेज नहर का महत्व और बढ़ जाता है।
चीन के लिए मिस्र सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं है। मिस्र की करीब 11 करोड़ की आबादी, अफ्रीका और अरब दुनिया में उसका प्रभाव और स्वेज नहर पर उसका नियंत्रण उसे चीन के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है। यही कारण है कि बीजिंग मिस्र में व्यापार, उद्योग, तकनीक, परिवहन और बुनियादी ढांचे में लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है।
शी और सीसी की बैठक में क्या होगा?
शी जिनपिंग की तीन दिन की यात्रा में मिस्र के राष्ट्रपति सीसी के साथ बातचीत में मध्य-पूर्व का युद्ध, समुद्री व्यापार की सुरक्षा और चीन के निवेश जैसे बड़े मुद्दे प्रमुख रहने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता, परिवहन और विनिर्माण सहित कई क्षेत्रों में आर्थिक समझौते होने की संभावना है।
यह यात्रा ऐसे समय भी हो रही है जब चीन और मिस्र अपने राजनयिक संबंधों के 70 साल पूरे होने का अवसर मना रहे हैं। मिस्र चीन के साथ व्यावहारिक सहयोग को और बढ़ाने की इच्छा जता चुका है, जबकि काहिरा ने ताइवान के मुद्दे पर चीन की स्थिति के समर्थन को भी दोहराया है।
अब रिश्ते सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, सेना तक पहुंचे
चीन और मिस्र की बढ़ती नजदीकी का एक और महत्वपूर्ण पहलू सैन्य सहयोग है। अगस्त में दोनों देशों ने संयुक्त हवाई अभ्यास किया था, जिसमें चीन के जे-16 लड़ाकू विमान और मिस्र के फ्रांस में बने राफेल लड़ाकू विमान शामिल हुए थे। यह पहली बार था जब चीनी जे-16 विमानों ने राफेल विमानों के साथ इस तरह के सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया।
इसका मतलब साफ है—बीजिंग और काहिरा के रिश्ते अब केवल कारोबार और निवेश तक सीमित नहीं रह गए हैं। रक्षा और सुरक्षा का क्षेत्र भी तेजी से इस रिश्ते का हिस्सा बन रहा है।
चीन की नजर अमेरिका की सबसे मजबूत जगह पर
मध्य-पूर्व में कई दशकों से अमेरिका की सैन्य और रणनीतिक पकड़ मजबूत रही है। मिस्र भी अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी है और उसे अमेरिका से बड़ी मात्रा में सैन्य सहायता मिलती है। ऐसे में चीन का मिस्र के साथ लगातार नजदीक आना वाशिंगटन के लिए नजरअंदाज करने वाली बात नहीं है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मिस्र अचानक अमेरिका से रिश्ता तोड़कर चीन के खेमे में नहीं जा रहा। इसके बजाय सीसी की रणनीति को ‘संतुलन’ और ‘रणनीतिक स्वतंत्रता’ के तौर पर देखा जा रहा है। यानी मिस्र अमेरिका को नाराज किए बिना चीन से पैसा, निवेश, तकनीक और रक्षा सहयोग हासिल करना चाहता है।
स्वेज नहर पर चीन की नजर कितनी बड़ी है?
यह सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक देशों में से एक है और उसकी अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार से गहराई से जुड़ी है। स्वेज नहर एशिया और यूरोप के बीच सामान पहुंचाने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक है।
अगर लाल सागर या होर्मुज में तनाव बढ़ता है, समुद्री जहाजों के रास्ते बदलते हैं या तेल और दूसरे सामान की आवाजाही प्रभावित होती है, तो स्वेज नहर का रणनीतिक महत्व और बढ़ जाता है। इसलिए मिस्र में चीन का बढ़ता निवेश केवल आर्थिक फायदा नहीं, बल्कि भविष्य के व्यापारिक और रणनीतिक रास्तों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश भी हो सकता है।
मिस्र-चीन व्यापार 20 अरब डॉलर के पार
दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते पहले ही काफी मजबूत हो चुके हैं। मिस्र के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 के अंत तक दोनों देशों के बीच गैर-पेट्रोलियम वस्तुओं का व्यापार करीब 20.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। 2026 की पहली छमाही में मिस्र का चीन को निर्यात भी तेजी से बढ़ा, जबकि चीन से मिस्र का आयात इससे कई गुना ज्यादा रहा।
चीन मिस्र में 10 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश कर चुका है। इसमें नई प्रशासनिक राजधानी के आसपास की परियोजनाएं, औद्योगिक क्षेत्र, बिजली और परिवहन से जुड़ी योजनाएं शामिल हैं। चीन की कंपनियां बंदरगाह, हरित हाइड्रोजन, इस्पात, टायर और उपग्रह जैसे क्षेत्रों में भी काम कर रही हैं।
बेल्ट एंड रोड से जुड़ा बड़ा फायदा
मिस्र में चीन का बड़ा निवेश स्वेज नहर क्षेत्र और ऐन सोखना के चीन-मिस्र टेडा सहयोग क्षेत्र में केंद्रित है। यह चीन की बेल्ट एंड रोड पहल से जुड़ा महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है। मिस्र के सरकारी मीडिया के अनुसार यहां करीब 200 कंपनियां काम कर रही हैं और निवेश अरबों डॉलर में है।
यानी चीन केवल मिस्र में सामान बेचने नहीं आया है। वह वहां कारखाने, बंदरगाह, रेल, तकनीक और औद्योगिक ढांचा तैयार करने में पैसा लगा रहा है। इससे आने वाले वर्षों में दोनों देशों की आर्थिक निर्भरता और बढ़ सकती है।
मध्य-पूर्व में अमेरिका बनाम चीन की नई तस्वीर
शी जिनपिंग की मिस्र यात्रा ऐसे समय हो रही है जब मध्य-पूर्व में अमेरिका की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं। ईरान के साथ युद्ध, लाल सागर में तनाव और समुद्री व्यापार में रुकावट ने क्षेत्र के कई देशों को अपनी विदेश नीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है।
चीन ऐसे समय खुद को एक ऐसे देश के रूप में पेश कर रहा है जो आर्थिक निवेश, कूटनीति और व्यापार के रास्ते प्रभाव बढ़ाना चाहता है। वह अमेरिका की तरह बड़े सैन्य गठबंधनों पर निर्भर दिखाई देने के बजाय आर्थिक रिश्तों के जरिए अपनी जगह मजबूत कर रहा है।
क्या मिस्र चीन के खेमे में जा रहा है? जवाब है—अभी नहीं
सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि शी की यात्रा को सीधे तौर पर ‘मिस्र का अमेरिका से चीन की ओर जाना’ कहना जल्दबाजी होगी। अमेरिका के साथ मिस्र के पुराने सैन्य और रणनीतिक संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं। काहिरा इन रिश्तों को खत्म करने की स्थिति में नहीं है।
असल खेल शायद कुछ और है—मिस्र सभी बड़े देशों से संबंध रखकर अपना फायदा बढ़ाना चाहता है। अमेरिका से सुरक्षा और सैन्य सहयोग, चीन से निवेश और तकनीक, रूस तथा दूसरे देशों से अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग। यही रणनीतिक स्वतंत्रता मिस्र को बदलती दुनिया में ज्यादा विकल्प देती है।
शी की काहिरा यात्रा का असली संदेश
शी जिनपिंग का मिस्र दौरा केवल 70 साल पुराने राजनयिक रिश्तों का उत्सव नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की तस्वीर है जिसमें मध्य-पूर्व के देश अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय चीन, रूस और दूसरे वैश्विक ताकतवर देशों के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत कर रहे हैं।
और चीन के लिए मिस्र कोई सामान्य साझेदार नहीं है। स्वेज नहर, अरब दुनिया में प्रभाव, अफ्रीका का प्रवेश द्वार, बड़ा बाजार और बढ़ता सैन्य सहयोग—इन सबका मेल मिस्र को बीजिंग के लिए बेहद अहम बनाता है।
सवाल इसलिए बड़ा है—क्या चीन मध्य-पूर्व में अमेरिका की जगह लेने जा रहा है? शायद अभी नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि बीजिंग अब इस इलाके में अमेरिका के लिए एक गंभीर आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती बनकर तेजी से अपनी जगह बना रहा है।




