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NRI के डॉलर से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर, FCNR योजना में 100 अरब डॉलर से ज्यादा की आमद

RBI की विशेष योजना को मिला उम्मीद से कहीं बड़ा रिस्पॉन्स; विदेशी मुद्रा भंडार 729.33 अरब डॉलर तक पहुंचा, रुपये को भी मिला सहारा

बिजनेस | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 सितंबर 2026

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने की कोशिश में भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष योजना को जबरदस्त सफलता मिली है। गैर-निवासी भारतीयों यानी एनआरआई से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए शुरू की गई विशेष एफसीएनआर(बी) जमा योजना के तहत 31 अगस्त तक 100 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम जुटाई गई। यह आंकड़ा आरबीआई की शुरुआती उम्मीद से काफी अधिक है। ताजा उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी रिकॉर्ड 729.33 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और रुपये पर दबाव बना हुआ है, डॉलर की यह बड़ी आमद भारत के बाहरी वित्तीय मोर्चे के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

आरबीआई को 80 अरब डॉलर की उम्मीद थी, आंकड़ा 100 अरब डॉलर पार

आरबीआई ने जून 2026 में विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विशेष स्वैप सुविधा शुरू की थी। एफसीएनआर(बी) के तहत विदेशी मुद्रा जमा जुटाने की प्रक्रिया 23 जून से शुरू हुई। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुरुआत में तीनों विशेष रास्तों से करीब 80 अरब डॉलर जुटने की उम्मीद जताई थी, लेकिन एफसीएनआर(बी) में अकेले जुटाई गई रकम ही 31 अगस्त तक 100 अरब डॉलर के पार पहुंच गई। यह आरबीआई के अनुमान से कहीं ज्यादा प्रतिक्रिया है।

एफसीएनआर(बी) क्या है और एनआरआई इसमें पैसा क्यों रखते हैं?

एफसीएनआर(बी) यानी फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक खाते में एनआरआई अपनी विदेशी मुद्रा को भारत के बैंकों में जमा कर सकते हैं। इसकी खासियत यह है कि जमा रकम और उस पर मिलने वाला ब्याज विदेशी मुद्रा में रहता है, जिससे एनआरआई को रुपये में उतार-चढ़ाव के जोखिम से कुछ सुरक्षा मिलती है। इस बार आरबीआई ने विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विशेष स्वैप व्यवस्था के जरिए बैंकों को अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया, जिससे डॉलर की आमद तेजी से बढ़ी।

सिर्फ एफसीएनआर(बी) ही नहीं, दूसरे रास्तों से भी आया पैसा

आरबीआई की विशेष व्यवस्था में केवल एफसीएनआर(बी) जमा शामिल नहीं थे। इसमें ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग यानी ओएफसीबी और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग यानी ईसीबी भी शामिल थे। 21 अगस्त तक तीनों रास्तों से कुल 72.85 अरब डॉलर जुटे थे। इसमें एफसीएनआर(बी) का योगदान 65.4 अरब डॉलर, ओएफसीबी का करीब 4.86 अरब डॉलर और ईसीबी का लगभग 2.59 अरब डॉलर था। अगस्त के अंतिम दिनों में एफसीएनआर(बी) में आमद और तेज हुई और 31 अगस्त तक यह 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गई।

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आरबीआई ने योजना समय से एक महीने पहले बंद की

इस योजना को इतनी तेज प्रतिक्रिया मिली कि आरबीआई ने एफसीएनआर(बी) के लिए विशेष स्वैप विंडो को तय समय से करीब एक महीने पहले बंद कर दिया। इसे मूल रूप से सितंबर के अंत तक चलना था, लेकिन इसे 31 अगस्त को बंद कर दिया गया। हालांकि जिन एफसीएनआर(बी) जमाओं के लिए स्वैप पहले ही तय हो चुके हैं, उनके संबंध में आरबीआई की सुविधा 11 सितंबर तक उपलब्ध रहने की जानकारी दी गई है।

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस फैसले को सोच-समझकर लिया गया, संतुलित और आंकड़ों पर आधारित निर्णय बताया है। इसका एक कारण यह भी है कि बहुत ज्यादा डॉलर आने के बाद आरबीआई को घरेलू बैंकिंग व्यवस्था में पैदा होने वाली अतिरिक्त रुपये की तरलता को संभालना पड़ता है।

विदेशी मुद्रा भंडार 729.33 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण परिणाम भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में दिखाई दिया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 21 अगस्त को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 729.33 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह आंकड़ा भारत की बाहरी वित्तीय क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार होने से वैश्विक बाजार में अचानक पैदा होने वाले दबाव के समय आरबीआई के पास रुपये को संभालने के लिए ज्यादा विकल्प रहते हैं।

रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तर से संभला

डॉलर की आमद और आरबीआई के विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप का असर रुपये पर भी दिखाई दिया है। मई 2026 में रुपया करीब 96.96 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक चला गया था। इसके बाद इसमें सुधार हुआ और 1 सितंबर को रुपया करीब 94.95 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया। रिपोर्टों के अनुसार मंगलवार को इसमें लगातार चौथे कारोबारी सत्र में मजबूती आई और आरबीआई के बाजार हस्तक्षेप ने भी इसमें भूमिका निभाई।

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हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल एफसीएनआर(बी) की वजह से रुपया पूरी तरह मजबूत हो गया। वैश्विक डॉलर की स्थिति, कच्चे तेल की कीमत, विदेशी निवेश और पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति समेत कई कारक रुपये की दिशा तय करते हैं।

भारत को सबसे बड़ा फायदा बाहरी सुरक्षा कवच का

विशेषज्ञों के अनुसार इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत के पास अब बाहरी भुगतान और डॉलर की जरूरत पूरी करने के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच है। बड़े विदेशी मुद्रा प्रवाह से देश के भुगतान संतुलन को मजबूती मिल सकती है और चालू खाते के घाटे को वित्तपोषित करना आसान हो सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार चालू वित्त वर्ष में पूंजी खाते में 65 अरब डॉलर से ज्यादा का अधिशेष हो सकता है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भी एफसीएनआर जमा से मिली बड़ी रकम को भुगतान संतुलन के लिए मजबूत सहारा बताया है और कहा है कि इससे रुपये के लिए भी एक आधार तैयार होता है।

लेकिन 100 अरब डॉलर का मतलब मुफ्त पैसा नहीं

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। एफसीएनआर(बी) में आया पैसा भारत के लिए मुफ्त विदेशी मुद्रा नहीं है। यह बैंकिंग प्रणाली में जमा या विदेशी मुद्रा जुटाने की व्यवस्था का हिस्सा है और इससे भविष्य में संबंधित दायित्व भी जुड़े होते हैं। आरबीआई को इस विदेशी मुद्रा को रुपये की तरलता के साथ संतुलित करना पड़ता है। यानी विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक है, लेकिन इस पूरी व्यवस्था की लागत और भविष्य के दायित्वों को भी ध्यान में रखना होगा।

बड़ी चुनौती—अचानक आने वाले डॉलर को संभालना

विशेषज्ञों ने यह भी ध्यान दिलाया है कि इतनी बड़ी विदेशी मुद्रा आमद से घरेलू बैंकिंग प्रणाली में रुपये की तरलता बढ़ सकती है। आरबीआई को इस अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए रिवर्स रेपो जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया है कि हर अतिरिक्त डॉलर को स्वैप करने का फायदा धीरे-धीरे कम होता है, जबकि उस अतिरिक्त तरलता को लंबे समय तक संभालने की लागत बढ़ सकती है।

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2013 से तुलना भी महत्वपूर्ण

एफसीएनआर(बी) के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाने की भारत की पिछली बड़ी कवायद 2013 में हुई थी। तब अमेरिका की ओर से ब्याज दरों में बदलाव की आशंका के कारण उभरते बाजारों पर भारी दबाव था और भारत का रुपया तेजी से गिरा था। उस समय एफसीएनआर(बी) योजना के जरिए करीब 26 अरब डॉलर जुटाए गए थे। इस बार जुटाई गई रकम उससे कई गुना ज्यादा है।

हालांकि दोनों परिस्थितियां पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। आज भारत के पास 2013 की तुलना में कहीं बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है और अर्थव्यवस्था का आकार भी काफी बड़ा है। इसलिए इस बार एफसीएनआर(बी) का उद्देश्य केवल रुपये को अचानक संभालना नहीं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत रखना भी है।

एनआरआई के भरोसे का भी संकेत

इतनी बड़ी राशि का भारत आना इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में एनआरआई भारत की बैंकिंग व्यवस्था में विदेशी मुद्रा रखने के लिए तैयार हुए हैं। सरकार ने भी इस तेज आमद को भारतीय बैंकिंग प्रणाली और अर्थव्यवस्था में प्रवासी भारतीयों के भरोसे का संकेत बताया है। हालांकि निवेश के फैसले केवल भरोसे से नहीं बल्कि ब्याज दर, मुद्रा जोखिम और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों से भी प्रभावित होते हैं।

कुल तस्वीर क्या है?

तस्वीर साफ है—भारत ने कुछ ही महीनों में विदेशी मुद्रा जुटाने की बड़ी क्षमता दिखाई है। एफसीएनआर(बी) में 100 अरब डॉलर से ज्यादा की आमद, 729.33 अरब डॉलर का रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये का रिकॉर्ड निचले स्तर से ऊपर आना भारत के बाहरी क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन इसे अर्थव्यवस्था की हर समस्या का समाधान मानना सही नहीं होगा।

कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया का युद्ध, अमेरिकी ब्याज दरें, विदेशी निवेश की दिशा और रुपये पर वैश्विक दबाव आगे भी चुनौती बने रहेंगे। इसलिए 100 अरब डॉलर की यह आमद भारत को मजबूत सुरक्षा कवच जरूर देती है, लेकिन असली परीक्षा इस विदेशी मुद्रा को स्थिरता, विकास और वित्तीय मजबूती में बदलने की होगी।

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