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मोदी-योगी राज में अफसरों का मोहभंग? 20 IAS और 7 IPS के इस्तीफे ने खोली ‘सिस्टम’ की पोल—क्या दबाव में काम कर रही है नौकरशाही?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 सितंबर 2026

जिस UPSC को पास करना लाखों युवाओं का सपना, उसी नौकरी को छोड़ने पर मजबूर क्यों हो रहे अधिकारी?

देश में UPSC को सबसे कठिन और प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में गिना जाता है। लाखों युवा वर्षों तक दिन-रात मेहनत करते हैं, कई बार असफल होते हैं और आखिरकार कुछ चुनिंदा लोग IAS और IPS जैसी सेवाओं में पहुंचते हैं। यह केवल नौकरी हासिल करना नहीं, बल्कि देश के प्रशासन, कानून-व्यवस्था और नीति-निर्माण की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेना होता है। ऐसे में जब कोई अधिकारी इस प्रतिष्ठित सेवा को कुछ वर्षों के भीतर ही छोड़ने का फैसला करता है तो यह सिर्फ उसका निजी फैसला नहीं रह जाता, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जिसमें उसने काम किया। उपलब्ध DoPT आंकड़ों के अनुसार 2015 से मई 2025 के बीच 20 IAS अधिकारियों ने इस्तीफा दिया, जबकि 2010 से 2014 के बीच यह संख्या 11 थी। दूसरी तरफ 2026 में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार पिछले 14 महीनों में 7 IPS अधिकारियों ने इस्तीफा दिया, जिनमें 6 की उम्र 40 वर्ष से कम बताई गई।

20 IAS और 7 IPS—आंकड़े खुद सवाल पूछ रहे हैं

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 20 IAS और 7 IPS के आंकड़े अलग-अलग समय-सीमाओं से आते हैं, इसलिए इन्हें आधिकारिक रूप से “2014 से 2026 के बीच कुल 27 इस्तीफे” कहना सही नहीं होगा। लेकिन दोनों आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो एक गंभीर तस्वीर जरूर सामने आती है—देश की सर्वोच्च प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं में इस्तीफों का सिलसिला लगातार चर्चा में है। सरकार यह कह सकती है कि हर अधिकारी ने राजनीतिक कारणों से इस्तीफा नहीं दिया, और यह बात सही भी है। कुछ मामलों में निजी कारण, करियर परिवर्तन, राजनीति या बेहतर अवसर सामने आए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार ने कभी गंभीरता से यह जानने की कोशिश की कि आखिर ऐसे अधिकारी, जिन्होंने UPSC जैसी कठिन परीक्षा पास करने के बाद देश सेवा का रास्ता चुना, वे बीच रास्ते में सेवा छोड़ने का फैसला क्यों कर रहे हैं?

आरोप है—नौकरशाही से पेशेवर स्वतंत्रता छीनी जा रही है

मोदी और बीजेपी सरकारों पर विपक्ष तथा आलोचकों का लगातार आरोप रहा है कि नौकरशाही पर राजनीतिक नियंत्रण और दबाव बढ़ा है। आलोचना का मूल सवाल यह है कि IAS और IPS अधिकारी संविधान, कानून और अपने पेशेवर विवेक के अनुसार फैसले लें या फिर सत्ता में बैठी सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं के मुताबिक काम करें। किसी अधिकारी के इस्तीफे का व्यक्तिगत कारण होना संभव है, लेकिन यदि अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग सेवाओं में समय से पहले सेवा छोड़ने के मामले लगातार सामने आते रहें, तो यह पूछना जायज है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों की स्वतंत्रता, निर्णय लेने की क्षमता और पेशेवर गरिमा पर्याप्त रूप से सुरक्षित है?

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यही वह बिंदु है जहां मोदी-योगी सरकारों के कामकाज पर सबसे तीखा सवाल उठता है। आलोचकों का आरोप है कि सरकारें ऐसे अधिकारियों को अधिक पसंद करती हैं जो सत्ता की राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ कदम मिलाकर चलें, जबकि स्वतंत्र राय रखने वाले अधिकारी असहज स्थिति में पहुंच सकते हैं। अगर किसी अधिकारी का जमीर किसी फैसले को सही नहीं मानता और फिर भी उससे उस फैसले को लागू कराने का दबाव हो, तो उसके सामने समझौता करने या व्यवस्था से बाहर निकलने के अलावा क्या विकल्प बचता है? यह आरोप हर इस्तीफे के बारे में सिद्ध नहीं है, लेकिन इस्तीफों के बढ़ते मामलों के बीच इस सवाल को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

योगी सरकार में भी अफसरों के एग्जिट ने बढ़ाई चिंता

उत्तर प्रदेश में भी IAS अधिकारियों के इस्तीफे और VRS चर्चा में रहे हैं। अगस्त 2026 में 2013 बैच की IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने 13 वर्ष की सेवा के बाद इस्तीफा देने की घोषणा की। उनके मामले में सार्वजनिक रूप से राजनीतिक दबाव को इस्तीफे का कारण नहीं बताया गया है, इसलिए उनके इस्तीफे को सीधे योगी सरकार के दबाव का परिणाम कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन उनके मामले ने यह बहस जरूर तेज कर दी कि आखिर IIT और IIM जैसी संस्थाओं से पढ़े, निजी क्षेत्र का करियर छोड़कर सिविल सेवा में आए अधिकारी भी वर्षों बाद सरकारी सेवा से बाहर क्यों जा रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उत्तर प्रदेश कैडर में पिछले वर्षों में 4 IAS अधिकारियों ने इस्तीफा और 9 ने VRS लिया, यानी कुल 13 अधिकारी सेवा से बाहर हुए। यह आंकड़ा पूरे देश का नहीं, बल्कि यूपी कैडर का है।

IPS में युवा अधिकारियों का बाहर निकलना और भी बड़ा सवाल

IPS के मामले में चिंता इसलिए अधिक गंभीर दिखाई देती है क्योंकि 2026 की रिपोर्टों में पिछले 14 महीनों में 7 अधिकारियों के इस्तीफे की बात सामने आई और इनमें 6 अधिकारियों की उम्र 40 वर्ष से कम बताई गई। इनमें अलग-अलग अधिकारियों के अलग-अलग कारण रहे हैं—इसलिए सभी मामलों को मोदी या किसी राज्य सरकार के दबाव से जोड़ना सही नहीं होगा। लेकिन एक युवा अधिकारी जिसने कठिन चयन प्रक्रिया, प्रशिक्षण और सेवा के शुरुआती वर्षों में सरकारी व्यवस्था में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हों, अगर अपेक्षाकृत कम उम्र में बाहर निकलने का फैसला करता है तो सरकार को कम-से-कम यह समझने की कोशिश जरूर करनी चाहिए कि क्या पुलिस सेवा की कार्य-संस्कृति, राजनीतिक हस्तक्षेप, काम का दबाव, करियर की संभावनाएं और पेशेवर स्वायत्तता पर्याप्त हैं?

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505 IPS पद खाली और दूसरी तरफ अधिकारी इस्तीफा दे रहे हैं

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फरवरी 2026 में लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार IPS के 505 पद रिक्त थे। एक तरफ देश पुलिस अधिकारियों की कमी का सामना कर रहा है, दूसरी तरफ युवा IPS अधिकारी सेवा छोड़ रहे हैं। ऐसे में सरकार की मानव संसाधन नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि व्यवस्था को प्रशिक्षित और अनुभवी अधिकारियों की आवश्यकता है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अधिकारी केवल नियुक्त ही न हों, बल्कि उन्हें लंबे समय तक सम्मानजनक और पेशेवर वातावरण भी मिले।

जनता के बीच बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक की बेचैनी

यह संकट केवल सरकारी अधिकारियों तक सीमित नहीं है। देश के युवाओं में सरकारी नौकरियों को लेकर असंतोष भी लगातार चर्चा में है। परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं में पेपर लीक तथा अनियमितताओं की खबरों ने लाखों अभ्यर्थियों को प्रभावित किया है। हालांकि “7 साल में 80 से ज्यादा पेपर लीक” को केंद्र सरकार का आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा बताना सही नहीं होगा, क्योंकि केंद्र सरकार ऐसा कोई एकीकृत राष्ट्रीय आंकड़ा नहीं रखती। उपलब्ध रिपोर्टों में 2021 के बाद बड़ी संख्या में पेपर-लीक घटनाओं का उल्लेख जरूर मिलता है। नतीजा यह है कि जिस युवा को नौकरी पाने के लिए वर्षों तक तैयारी करनी पड़ती है, उसके सामने परीक्षा की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं।

इसी के साथ बेरोजगारी, महंगाई और आम परिवारों की आर्थिक परेशानी को लेकर विपक्ष लगातार मोदी सरकार पर हमला करता रहा है। ऐसे माहौल में जब एक तरफ करोड़ों युवा सरकारी नौकरी की तलाश में हैं और दूसरी तरफ प्रतिष्ठित सरकारी सेवाओं के कुछ अधिकारी खुद सेवा छोड़ रहे हैं, तो यह विरोधाभास सरकार के लिए गंभीर राजनीतिक सवाल पैदा करता है।

अडानी और बड़े कॉरपोरेट पर विपक्ष का हमला

मोदी सरकार पर विपक्ष का एक बड़ा आरोप यह भी है कि उसकी आर्थिक नीतियों से चुनिंदा बड़े कॉरपोरेट समूहों को disproportionate फायदा मिला है। इस राजनीतिक बहस में अडानी समूह का नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है। विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि एयरपोर्ट, बंदरगाह, ऊर्जा, गैस और दूसरे बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में बड़े कॉरपोरेट समूहों की भूमिका बढ़ी है और इससे सत्ता तथा बड़े कारोबार के बीच संबंधों को लेकर सवाल उठे हैं। सरकार और संबंधित कारोबारी समूह इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।

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यही वजह है कि आलोचक पूछते हैं—क्या सरकार की प्राथमिकता आम नागरिक, किसान, मजदूर और बेरोजगार युवा हैं या बड़े कॉरपोरेट समूह? रेलवे से लेकर एयरपोर्ट, ऊर्जा से लेकर बंदरगाह तक निजी भागीदारी बढ़ने को लेकर देश में व्यापक राजनीतिक बहस है। इस बहस को सीधे “सब कुछ अडानी को दे दिया गया” जैसे पूर्ण दावे में बदलना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन सत्ता और बड़े उद्योग समूहों के रिश्तों पर सवाल लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा जरूर हैं।

क्या सरकार को इस्तीफों का श्वेतपत्र जारी करना चाहिए?

अगर मोदी सरकार को लगता है कि नौकरशाही पूरी तरह संतुष्ट है और इस्तीफों के पीछे केवल व्यक्तिगत कारण हैं, तो सबसे आसान रास्ता है कि वह 2014 से अब तक IAS और IPS अधिकारियों के इस्तीफों का पूरा वर्षवार, कैडरवार और कारणवार आंकड़ा सार्वजनिक करे। इससे देश को पता चलेगा कि कितने अधिकारियों ने निजी कारणों से इस्तीफा दिया, कितने निजी क्षेत्र में गए, कितने राजनीति में गए, कितने दूसरी सरकारी सेवाओं में गए और कितने वास्तव में प्रशासनिक या कार्य-परिस्थितियों से असंतुष्ट थे।

लोकतंत्र में पारदर्शिता से सरकार मजबूत होती है, कमजोर नहीं। अगर सरकार के पास जवाब है तो उसे आंकड़ों के साथ सामने आना चाहिए।

सवाल सिर्फ 20 IAS और 7 IPS का नहीं—सवाल व्यवस्था के चरित्र का है

20 IAS और 7 IPS के आंकड़े अपने-आप में सरकार की तानाशाही साबित नहीं करते। लेकिन वे ऐसे सवाल जरूर पैदा करते हैं जिन्हें सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने वाले अधिकारी अगर सेवा के बीच में रास्ता बदल रहे हैं, युवा IPS अधिकारी कम उम्र में बाहर निकल रहे हैं, IPS के सैकड़ों पद खाली हैं और दूसरी तरफ भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं, तो सरकार को यह बताना होगा कि प्रशासनिक व्यवस्था में आखिर समस्या कहां है।

मोदी-योगी सरकार पर आलोचकों का आरोप है कि सत्ता का केंद्रीकरण, राजनीतिक दबाव और गैर-पेशेवर कार्यशैली ने संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर किया है। इन आरोपों का अंतिम फैसला तथ्यों और स्वतंत्र जांच से होना चाहिए, लेकिन सरकार से यह सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है कि क्या नौकरशाही को संविधान के प्रति जवाबदेह रहने की स्वतंत्रता है या सत्ता के प्रति आज्ञाकारी रहने का दबाव?

क्योंकि IAS-IPS अधिकारी सरकार के कर्मचारी भर नहीं हैं—वे संविधान और जनता के प्रति जवाबदेह प्रशासनिक व्यवस्था के स्तंभ हैं। अगर इस व्यवस्था के स्तंभ ही समय से पहले बाहर निकलने लगें, तो सरकार को आलोचकों को चुप कराने के बजाय यह पूछना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है।

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