खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 सितंबर 2026
आज भारत के पास तेज गेंदबाजों की पूरी फौज है
आज जब भारतीय क्रिकेट की बात तेज गेंदबाजी के साथ होती है, तो उमरान मलिक, मयंक यादव, जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी और अशोक शर्मा जैसे नाम सामने आते हैं। 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार छूने या उसके आसपास पहुंचने वाली गेंदें अब भारतीय क्रिकेट में कोई असंभव बात नहीं रह गई हैं। उमरान की तूफानी रफ्तार ने दुनिया को चौंकाया, मयंक यादव ने अपनी गति से तहलका मचाया, बुमराह ने रफ्तार के साथ सटीकता का बेजोड़ मेल दिखाया और शमी ने अपनी सीम और स्विंग से बल्लेबाजों को परेशान किया। लेकिन भारतीय तेज गेंदबाजी की यह कहानी आज से शुरू नहीं हुई। इसके पीछे कई दशकों की मेहनत, चोट, संघर्ष और कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने उस समय रास्ता बनाया, जब भारत को तेज गेंदबाजों की धरती नहीं माना जाता था।
जब भारत में तेज गेंदबाज होना ही बड़ी बात थी
आज की तरह उस दौर में भारत के पास तेज गेंदबाजों की लंबी सूची नहीं थी। पिचों को भी तेज गेंदबाजों के लिए आदर्श नहीं माना जाता था। ऐसे समय में 1990 के दशक की शुरुआत में एक लंबा, मजबूत और बेहद तेज गेंदबाज भारतीय क्रिकेट में आया। शुरुआत में उसका अंतरराष्ट्रीय करियर बहुत धमाकेदार नहीं रहा। ऑस्ट्रेलिया दौरे के पांच टेस्ट मैचों में उसके खाते में केवल 10 विकेट आए। लेकिन यह खिलाड़ी धीरे-धीरे अपनी रफ्तार और गेंदबाजी की धार बढ़ाता गया। 1992 के दक्षिण अफ्रीका दौरे में तीन टेस्ट में 12 विकेट लेकर उसने संकेत दे दिया कि वह लंबे समय तक भारतीय तेज गेंदबाजी का चेहरा बनने वाला है। यह खिलाड़ी था जवागल श्रीनाथ—‘मैसूर एक्सप्रेस’।
कपिल देव के बाद आई बड़ी जिम्मेदारी
श्रीनाथ ने भारतीय टीम में कपिल देव और मनोज प्रभाकर के दौर में जगह बनाई थी। शुरुआत में उन्हें मौके के लिए इंतजार करना पड़ा। लेकिन जैसे-जैसे कपिल देव और प्रभाकर का दौर ढलने लगा, श्रीनाथ ने भारतीय तेज गेंदबाजी की कमान अपने हाथ में ले ली। पहले वेंकटेश प्रसाद के साथ और बाद में अपने करियर के अंतिम दौर में जहीर खान जैसे युवा तेज गेंदबाजों के साथ उन्होंने भारत के पेस अटैक को नई पहचान दी।
श्रीनाथ सिर्फ तेज गेंद फेंकने वाले गेंदबाज नहीं थे। उनके पास इनस्विंग, कटर, सटीक लाइन और लेंथ तथा पिच पर जोर से टप्पा मारने की क्षमता थी। उनके मजबूत कंधे और लंबे कद से निकलती गेंद बल्लेबाजों के लिए लगातार खतरा बनी रहती थी।
डेब्यू पर ही हैट्रिक—शुरुआत ही धमाकेदार थी
कर्नाटक के लिए 1989-90 में प्रथम श्रेणी क्रिकेट में श्रीनाथ ने पदार्पण किया और पहले ही मैच में हैट्रिक लेकर अपनी मौजूदगी का ऐलान कर दिया। उन्होंने उस मुकाबले में 5/85 का शानदार प्रदर्शन किया और दूसरी पारी की शुरुआत भी लगातार दो गेंदों पर विकेट लेकर की। शुरुआती छह मैचों में 25 विकेट लेने के बाद उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज करना मुश्किल था।
इंग्लैंड दौरे से पहले जब उन्होंने भारतीय टीम के नेट्स में गेंदबाजी की तो उनकी गति और उछाल ने सभी का ध्यान खींचा। इसके बाद भारतीय टेस्ट टीम में उनकी जगह बनती चली गई और वह जल्द ही भारत के मुख्य तेज गेंदबाज बन गए।
एक सीजन में 87 विकेट—इंग्लैंड में भी दिखाया दम
1995 में श्रीनाथ ने Gloucestershire के लिए काउंटी क्रिकेट खेलते हुए एक ही सीजन में 87 विकेट झटक दिए। यह प्रदर्शन साधारण नहीं था। उन्हें महान वेस्टइंडीज तेज गेंदबाज कर्टनी वॉल्श की सिफारिश पर काउंटी क्रिकेट में मौका मिला था और उन्होंने इस अवसर को शानदार प्रदर्शन में बदल दिया।
इसी दौरान उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी प्रदर्शन भी किया—एक पारी में 9 विकेट पर 76 रन। विदेशी परिस्थितियों में ऐसा प्रदर्शन बताता था कि श्रीनाथ की ताकत सिर्फ भारतीय पिचों तक सीमित नहीं थी।
1996-97 में ‘मैसूर एक्सप्रेस’ अपने चरम पर थी
1996 और 1997 का दौर श्रीनाथ के करियर का शायद सबसे रोमांचक दौर था। अहमदाबाद में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारत के सामने सिर्फ 170 रन का बचाव करने की चुनौती थी। श्रीनाथ ने गेंद को ऐसा हथियार बनाया कि दक्षिण अफ्रीका की पूरी टीम सिर्फ 105 रन पर ढेर हो गई।
उनकी गेंदबाजी इतनी प्रभावशाली थी कि तत्कालीन भारतीय कप्तान सचिन तेंदुलकर ने इसे लंबे समय बाद किसी भारतीय गेंदबाज की सबसे शानदार तेज गेंदबाजी प्रदर्शनों में से एक बताया। उस सीरीज में श्रीनाथ ने तीन टेस्ट मैचों में 18 विकेट लिए।
लेकिन इसी दौर में श्रीनाथ ने शायद अपनी सबसे तेज गेंद फेंकी—और विडंबना देखिए, वही गेंद आधिकारिक इतिहास में ठीक से दर्ज ही नहीं हो सकी।
156 KMPH की गेंद—रिकॉर्ड बना, लेकिन रिकॉर्ड बुक में नहीं
1996-97 के बीच श्रीनाथ की गेंदबाजी की रफ्तार कई बार 150 KMPH के पार बताई गई। उस समय वह दक्षिण अफ्रीका के एलन डोनाल्ड और लांस क्लूजनर जैसे तेज गेंदबाजों की गति के आसपास पहुंच चुके थे।
एक पुराने Cricinfo संदर्भ में श्रीनाथ की एक गेंद की रफ्तार 156 KMPH बताई गई थी। यह रफ्तार उस समय के बेहद तेज गेंदबाजों से भी अधिक थी। लेकिन कहानी में एक बड़ा पेच है—इस गेंद की गति का आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट में मैच और तारीख की भी पक्की पुष्टि नहीं हो पाई थी।
इसलिए 156 KMPH को आधिकारिक विश्व या भारतीय रिकॉर्ड कहना सही नहीं होगा। लेकिन अगर उस समय की रिपोर्ट सही थी, तो यह भारतीय क्रिकेट के इतिहास की सबसे तेज गेंदों में से एक थी। यही वजह है कि श्रीनाथ की 156 KMPH वाली गेंद आज भी क्रिकेट प्रेमियों के लिए एक रहस्य जैसी है—गेंद इतिहास में थी, लेकिन स्पीड गन की पक्की कहानी में नहीं।
एलन डोनाल्ड और क्लूजनर के बराबर रफ्तार
उस समय के एक लेख में कहा गया था कि दिसंबर 1996 से फरवरी 1997 के बीच श्रीनाथ की गेंदों की रफ्तार लगातार 150 KMPH से ऊपर थी। उसी संदर्भ में यह भी बताया गया कि उनकी एक गेंद ने 156 KMPH का आंकड़ा छुआ था। लांस क्लूजनर की उस समय की अधिकतम रफ्तार 154 KMPH बताई गई थी और एलन डोनाल्ड भी दुनिया के सबसे खतरनाक तेज गेंदबाजों में थे।
अगर श्रीनाथ की वह 156 KMPH की गेंद आधिकारिक रूप से दर्ज होती, तो भारतीय क्रिकेट के तेज गेंदबाजी इतिहास में उसकी जगह और भी बड़ी होती। लेकिन तकनीक और रिकॉर्डिंग व्यवस्था आज जैसी विकसित नहीं थी। शायद इसी वजह से भारतीय क्रिकेट की एक संभावित ऐतिहासिक गेंद हमेशा के लिए ‘अनौपचारिक रिकॉर्ड’ बनकर रह गई।
कंधा टूटा, रफ्तार नहीं टूटी
तेज गेंदबाज का सबसे बड़ा हथियार उसका शरीर और खासकर उसका कंधा होता है। 1997 में श्रीनाथ के कंधे में गंभीर परेशानी हुई। उन्हें रोटेटर कफ की समस्या के लिए सर्जरी तक करानी पड़ी। किसी तेज गेंदबाज के लिए यह करियर खत्म करने वाली स्थिति भी हो सकती थी। लेकिन श्रीनाथ ने हार नहीं मानी।
उन्होंने वापसी की और 1998 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ घरेलू सीरीज में कई बार 148 KMPH के आसपास गेंदबाजी की। यानी चोट ने उनकी रफ्तार को धीमा जरूर किया, लेकिन उन्हें खत्म नहीं किया।
1999 विश्व कप में भी रफ्तार का जलवा
1999 विश्व कप में श्रीनाथ ने एक बार फिर दिखाया कि वह सिर्फ पुराने दौर के तेज गेंदबाज नहीं थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुकाबले में उनकी रफ्तार ग्लेन मैक्ग्रा से भी अधिक रही। पूरे विश्व कप में उनकी शीर्ष गति करीब 149 KMPH बताई गई।
वह उस विश्व कप के दूसरे सबसे तेज गेंदबाज रहे। उनसे आगे केवल पाकिस्तान के शोएब अख्तर थे, जिनकी शीर्ष गति 154.5 KMPH बताई गई। यानी उस समय दुनिया के सबसे तेज गेंदबाजों के बीच एक भारतीय गेंदबाज भी मजबूती से खड़ा था।
चार विश्व कप और 44 विकेट
श्रीनाथ ने भारत के लिए चार विश्व कप खेले और इन टूर्नामेंटों में 44 विकेट हासिल किए। 2003 विश्व कप में दक्षिण अफ्रीका में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और 16 विकेट लेकर अपने अंतरराष्ट्रीय करियर को सम्मानजनक विदाई दी।
वनडे क्रिकेट में उनके नाम 315 विकेट हैं। वह 300 वनडे विकेट का आंकड़ा पार करने वाले भारत के पहले तेज गेंदबाज बने और लंबे समय तक भारत के सबसे सफल तेज गेंदबाज रहे।
फिर 33 साल की उम्र में लगा ब्रेक
33 साल की उम्र में श्रीनाथ ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया। चोटें लगातार परेशान कर रही थीं और शरीर पहले जैसा साथ नहीं दे रहा था। उन्होंने 2002 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया और बाद में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर वनडे क्रिकेट खेलने की इच्छा भी जताई, लेकिन पूरी फिटनेस हासिल नहीं कर पाए।
कई तेज गेंदबाजों की तरह उनका शरीर भी उनकी रफ्तार की कीमत चुका चुका था। लेकिन उन्होंने क्रिकेट से दूरी नहीं बनाई। संन्यास के बाद वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक सफल मैच रेफरी के रूप में भी स्थापित हुए।
श्रीनाथ से बुमराह और शमी तक—कहानी आगे बढ़ती गई
भारतीय तेज गेंदबाजी की यात्रा को देखें तो श्रीनाथ एक महत्वपूर्ण पुल की तरह नजर आते हैं। उनके दौर में तेज गेंदबाजी का मतलब था कुछ चुनिंदा गेंदबाजों पर निर्भर रहना। उनके बाद जहीर खान और आशीष नेहरा जैसे गेंदबाजों ने भारतीय पेस अटैक को और मजबूत किया। फिर मोहम्मद शमी ने अपनी सीम और रिवर्स स्विंग से नई पहचान बनाई, जबकि जसप्रीत बुमराह ने असामान्य एक्शन, सटीक यॉर्कर और अलग तरह की रफ्तार से दुनिया के बल्लेबाजों को परेशान किया।
और फिर आए उमरान मलिक और मयंक यादव जैसे गेंदबाज, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट में रफ्तार को फिर से सुर्खियों में ला दिया। उमरान ने 150 KMPH से ऊपर की गेंदों को लगातार चर्चा में रखा, जबकि मयंक ने अपनी तेज गति से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। आज भारत में तेज गेंदबाजी को लेकर जो आत्मविश्वास दिखाई देता है, वह अचानक पैदा नहीं हुआ है।
श्रीनाथ ने रास्ता बनाया, अगली पीढ़ियों ने उसे चौड़ा किया
आज भारतीय क्रिकेट के पास ऐसे गेंदबाज हैं जो गति के साथ स्विंग, सीम, यॉर्कर, बाउंसर और विविधता का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन इस बदलाव की नींव उन दिनों पड़ी थी, जब एक भारतीय तेज गेंदबाज का 145 KMPH के आसपास पहुंचना भी बड़ी खबर माना जाता था।
श्रीनाथ ने उस दौर में भारत को यह भरोसा दिया कि भारतीय तेज गेंदबाज भी दुनिया के सबसे तेज बल्लेबाजों को अपनी रफ्तार से चुनौती दे सकता है। उन्होंने दिखाया कि भारतीय क्रिकेट सिर्फ स्पिन और बल्लेबाजी तक सीमित नहीं है।
और वह 156 KMPH आज भी एक सवाल है
श्रीनाथ के करियर की सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि उनके आंकड़े खुद उनकी महानता साबित करते हैं—315 वनडे विकेट, चार विश्व कप, 44 विश्व कप विकेट, एक सीजन में 87 प्रथम श्रेणी विकेट, टेस्ट में लगातार प्रभाव और वर्षों तक भारत के पेस अटैक की अगुवाई।
लेकिन इन सबके बीच वह 156 KMPH की गेंद एक अलग कहानी कहती है। अगर वह रफ्तार वास्तव में सही थी, तो श्रीनाथ ने उस समय ऐसी गति हासिल कर ली थी, जब भारत में आधुनिक स्पीड गन और आज जैसी तेज गेंदबाजी की सुविधाएं भी नहीं थीं।
आज उमरान मलिक, मयंक यादव, बुमराह और शमी को देखकर भारतीय क्रिकेट अपनी तेज गेंदबाजी की ताकत पर गर्व करता है। लेकिन इस कहानी की शुरुआत में एक नाम को भूलना मुश्किल है—जवागल श्रीनाथ, द ‘मैसूर एक्सप्रेस’।
हो सकता है उनकी 156 KMPH वाली गेंद रिकॉर्ड बुक में दर्ज न हो, लेकिन भारतीय तेज गेंदबाजी के इतिहास में उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है।




