अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 अगस्त 2026
कुवैत के साथ पाकिस्तान का नया रक्षा समझौता
पाकिस्तान और कुवैत के बीच गुरुवार को सैन्य सहयोग बढ़ाने के लिए द्विपक्षीय समझौता हुआ। इसे आधिकारिक तौर पर ‘प्रोटोकॉल एग्रीमेंट-2026’ नाम दिया गया है। इस पर इस्लामाबाद में कुवैत के रक्षा मंत्री शेख अब्दुल्ला अली अब्दुल्ला अल-सालेम अल-सबाह और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने हस्ताक्षर किए।
समझौता पांच वर्षों के लिए लागू रहेगा। निर्धारित अवधि के बाद यदि दोनों में से कोई देश इससे बाहर निकलने का औपचारिक फैसला नहीं करता है तो इसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
क्या-क्या होगा सहयोग?
नए समझौते के तहत पाकिस्तान और कुवैत के बीच सैन्य सहयोग को अधिक व्यवस्थित और सक्रिय बनाने की योजना है। इसमें दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण और अभ्यास, सैन्य शिक्षा एवं विशेषज्ञता का आदान-प्रदान, खुफिया सूचनाओं को साझा करना और लॉजिस्टिक्स सहयोग बढ़ाना शामिल है।
इसके अलावा पाकिस्तान की सेना कुवैती सैन्यकर्मियों को प्रशिक्षण देने में भी भूमिका निभाएगी। यानी समझौता केवल औपचारिक सैन्य संपर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों की सैन्य क्षमताओं और संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की दिशा में है।
ईरान-अमेरिका तनाव के बीच क्यों अहम?
इस समझौते का समय इसे और महत्वपूर्ण बनाता है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष का असर खाड़ी के देशों की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। कुवैत की भौगोलिक स्थिति उसे क्षेत्रीय तनाव के बीच विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है।
तेल निर्यात और समुद्री व्यापार के लिए खाड़ी क्षेत्र तथा होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण हैं। क्षेत्र में किसी भी लंबे सैन्य तनाव से ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री परिवहन और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
ऐसे माहौल में कुवैत का पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाना अपनी सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा माना जा सकता है।
खाड़ी में पाकिस्तान की नई रणनीति?
पाकिस्तान पिछले कुछ समय से खाड़ी और पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को तेजी से सक्रिय कर रहा है। सऊदी अरब के साथ उसके पुराने रक्षा संबंध हैं और हाल में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और मजबूत किया है। तुर्की के साथ भी पाकिस्तान का सैन्य सहयोग लगातार बढ़ा है।
अब कुवैत के साथ नया समझौता इस तस्वीर में एक और महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ता है। इससे पाकिस्तान को खाड़ी के कई देशों के साथ सैन्य संपर्क, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग का व्यापक नेटवर्क बनाने का अवसर मिल सकता है।
इस्लामाबाद के लिए इसका एक फायदा यह भी है कि आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के बीच वह खुद को क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में एक उपयोगी सैन्य साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
क्या इसे ‘इस्लामिक NATO’ कहना सही होगा?
पाकिस्तान के सऊदी और तुर्की के साथ बढ़ते रक्षा संबंधों के बाद कुछ विश्लेषणों में इसे किसी संभावित ‘इस्लामिक NATO’ की दिशा में कदम के तौर पर देखा गया है। हालांकि ऐसी तुलना को लेकर सावधानी जरूरी है।
कुवैत के साथ मौजूदा समझौते में ऐसा कोई प्रावधान सामने नहीं आया है जिसके तहत एक देश पर हमला दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। इसलिए इसे सामूहिक रक्षा संधि मानना फिलहाल सही नहीं होगा।
अभी इसका मुख्य जोर प्रशिक्षण, सैन्य क्षमता, विशेषज्ञता, खुफिया सहयोग और लॉजिस्टिक्स पर है।
भारत के लिए कितनी चिंता?
फिलहाल कुवैत-पाकिस्तान रक्षा समझौता भारत के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सैन्य गठबंधन नहीं है। इसलिए इसे तत्काल भारत के लिए सैन्य खतरा मानना अतिशयोक्ति होगी।
लेकिन भारत को पाकिस्तान के खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य और रणनीतिक संपर्कों को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए। खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए आर्थिक, ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लाखों भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में रहते और काम करते हैं तथा भारत का बड़ा व्यापारिक और ऊर्जा हित इस क्षेत्र से जुड़ा है।
पाकिस्तान यदि अलग-अलग खाड़ी देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को लगातार मजबूत करता है तो भविष्य में इसका इस्तेमाल क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इसलिए भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान की सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि उसके बढ़ते रणनीतिक नेटवर्क पर नजर रखना भी है।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत को इस घटनाक्रम का जवाब किसी अनावश्यक सैन्य प्रतिस्पर्धा से देने के बजाय खाड़ी देशों के साथ अपने पहले से मजबूत रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को और गहरा करना होगा।
भारतीय नौसेना के लिए अरब सागर से लेकर खाड़ी क्षेत्र तक समुद्री मार्गों की निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी। साथ ही भारत को सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और अन्य साझेदार देशों के साथ समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग और रक्षा संपर्क बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।
पाकिस्तान की चाल या बदलता क्षेत्रीय समीकरण?
कुवैत के साथ यह समझौता पाकिस्तान की एक सोची-समझी कूटनीतिक कोशिश का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे भारत के खिलाफ किसी नए सैन्य मोर्चे के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी।
फिर भी एक बात स्पष्ट है—पाकिस्तान खाड़ी में केवल आर्थिक या कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि सैन्य सहयोग के जरिए अपना रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए संदेश सीधा है: पाकिस्तान की हर रक्षा डील को अलग-अलग देखने के बजाय उसके पूरे क्षेत्रीय नेटवर्क पर नजर रखनी होगी। क्योंकि आने वाले समय में खाड़ी की सुरक्षा केवल पश्चिम एशिया का मुद्दा नहीं रहेगी—इसका सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा रहेगा।




