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भारत ने UNCERD की टिप्पणियां खारिज कीं, कहा- ‘राजनीतिक मंशा से प्रेरित और बेहद दुर्भावनापूर्ण’

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति की भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा जातीय और धार्मिक समुदायों के खिलाफ कथित बड़े पैमाने पर उल्लंघनों को लेकर की गई टिप्पणियों पर भारत ने कड़ा जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय ने समिति की टिप्पणियों को तथ्यात्मक आधार से परे बताते हुए उनकी मंशा पर सवाल उठाया और उन्हें ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ तथा ‘बेहद दुर्भावनापूर्ण’ करार दिया।

टाइमलाइन | 26 अगस्त 2026

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अगस्त 2026

भारत ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र की Committee on the Elimination of Racial Discrimination (UNCERD) की हालिया टिप्पणियों को सख्ती से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि समिति की ओर से भारत को लेकर की गई कुछ टिप्पणियां राजनीतिक मंशा से प्रेरित हैं और उनमें दुर्भावनापूर्ण तत्व दिखाई देते हैं। भारत की यह प्रतिक्रिया उस समय आई है जब UNCERD ने देश में जातीय और जाति-आधारित समूहों तथा धार्मिक समुदायों से जुड़े लोगों के अधिकारों और कानून प्रवर्तन से संबंधित कथित उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त की है।

UNCERD ने अपनी टिप्पणियों में कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा जातीय और जातीय-धार्मिक समूहों, स्वदेशी और आदिवासी समुदायों तथा अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ कथित बड़े पैमाने पर उल्लंघनों से जुड़ी रिपोर्टों का उल्लेख किया था। समिति ने अनुसूचित जातियों, विशेषकर दलित समुदायों और गैर-नागरिकों से जुड़े मामलों को भी अपनी चिंताओं में शामिल किया। भारत ने इन टिप्पणियों को स्वीकार करने के बजाय समिति की रिपोर्टिंग और उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है।

विदेश मंत्रालय का रुख साफ है कि भारत में संवैधानिक व्यवस्था, कानून और संस्थागत तंत्र सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मौजूद हैं। सरकार का कहना है कि देश में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा संविधान और कानून के तहत सुनिश्चित की जाती है। ऐसे में भारत ने संयुक्त राष्ट्र समिति द्वारा लगाए गए व्यापक आरोपों को एकतरफा और राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रभावित बताया है।

इस पूरे विवाद का केंद्र केवल किसी एक घटना या समुदाय का मामला नहीं है, बल्कि भारत में भेदभाव, कानून प्रवर्तन, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक तथा वंचित समूहों के अधिकारों से जुड़े व्यापक सवाल हैं। UNCERD नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था का हिस्सा है और विभिन्न देशों में जातीय, नस्लीय तथा संबंधित भेदभाव के मामलों पर अपनी टिप्पणियां और सिफारिशें देता है। भारत की आपत्ति इस बात को लेकर है कि समिति ने देश की जमीनी और संवैधानिक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखे बिना गंभीर निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं।

भारत की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार, सामाजिक भेदभाव और कानून के समान अनुप्रयोग को लेकर देशों की नीतियों की लगातार समीक्षा हो रही है। नई दिल्ली पहले भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भारत से जुड़ी टिप्पणियों पर यह कहती रही है कि देश के आंतरिक मामलों को व्यापक और राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय भारत के संवैधानिक और कानूनी ढांचे को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

UNCERD की चिंता में अनुसूचित जाति और दलित समुदायों का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में जाति आधारित भेदभाव का मुद्दा लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया है और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा और सकारात्मक कार्रवाई की व्यवस्था की है। इसके बावजूद जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता से जुड़े मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। सरकार और आलोचकों के बीच विवाद अक्सर इस बात पर रहता है कि मौजूदा कानूनों और संस्थागत व्यवस्थाओं को जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जा रहा है।

UNCERD की टिप्पणियों में गैर-नागरिकों का उल्लेख भी किया गया है। यह मुद्दा भारत में नागरिकता, प्रवासन और कानून के तहत अधिकारों से जुड़ी व्यापक बहस से संबंधित है। भारत का आधिकारिक रुख यह रहा है कि नागरिकता और गैर-नागरिकों से जुड़े मामलों का निर्धारण देश के कानूनों के तहत किया जाता है और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा संप्रभुता से जुड़े विषयों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार भारत के पास है।

भारत और संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं के बीच मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर पहले भी मतभेद सामने आते रहे हैं। नई दिल्ली आम तौर पर इस बात पर जोर देता है कि भारत एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था वाला देश है, जहां न्यायपालिका, संसद, राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं और अन्य वैधानिक निकाय नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए काम करते हैं। सरकार का मानना है कि किसी भी शिकायत या अधिकारों के उल्लंघन के मामले में देश की निर्धारित कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र की समितियां सदस्य देशों में मानवाधिकार और भेदभाव से जुड़े मुद्दों की अंतरराष्ट्रीय संधियों और उनके अनुपालन के आधार पर समीक्षा करती हैं। इसलिए भारत की आपत्ति के बावजूद UNCERD की टिप्पणियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सामाजिक और मानवाधिकार नीतियों को लेकर चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि, समिति की टिप्पणियां अपने आप में भारत पर कोई कानूनी दंड या प्रतिबंध लागू नहीं करतीं।

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि भारत और UNCERD के बीच इस मुद्दे पर आगे कोई औपचारिक संवाद या स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं। भारत का मौजूदा संदेश बेहद स्पष्ट है—नई दिल्ली किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था की ऐसी टिप्पणी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है जिसे वह राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित या भारत की वास्तविक परिस्थितियों की गलत तस्वीर पेश करने वाली मानता है।

इस विवाद ने एक बार फिर भारत के संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानी के बीच संतुलन को लेकर बहस को सामने ला दिया है। भारत ने जहां अपनी संप्रभुता और संस्थागत व्यवस्था का बचाव करते हुए UNCERD की टिप्पणियों को खारिज किया है, वहीं समिति की चिंताएं देश में वंचित और कमजोर समुदायों के अधिकारों से जुड़े सवालों को अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ले आई हैं।

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