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मिसाइल निर्माण में निजी क्षेत्र की एंट्री, 1,500 किमी तक मारक क्षमता वाली मिसाइलों पर बड़ा दांव

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अगस्त 2026

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत के पारंपरिक मिसाइल निर्माण क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा निजी क्षेत्र को DRDO की तकनीक के इस्तेमाल के जरिए पारंपरिक मिसाइलों के निर्माण की अनुमति दिए जाने के एक दिन बाद सरकार ने करीब 1,000 से 1,500 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LRLACRM) और 150 से 500 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली प्रलय मिसाइल के उत्पादन के लिए भारतीय निजी कंपनियों की पहचान की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

नई व्यवस्था के तहत निजी कंपनियां ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (ToT) मॉडल के जरिए DRDO द्वारा विकसित मिसाइल प्रणालियों का उत्पादन करेंगी। सरकार का उद्देश्य मिसाइलों के उत्पादन की क्षमता और गति बढ़ाने के साथ-साथ देश में एक मजबूत स्वदेशी रक्षा उद्योग तैयार करना है। इससे पहले अस्त्र मार्क-I और मार्क-II जैसी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के निर्माण के लिए भी भारतीय निजी क्षेत्र को तकनीक हस्तांतरण के रास्ते पर आगे बढ़ाया जा चुका है।

रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका अब केवल सहायक उपकरणों या छोटे हिस्सों तक सीमित नहीं रहने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार ICOMM, हैदराबाद, भारत फोर्ज, अडानी डिफेंस एंड टेक्नोलॉजीज, भारत डायनेमिक्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियां अलग-अलग मिसाइल और हथियार प्रणालियों के उत्पादन में शामिल हो सकती हैं। प्रस्तावित उत्पादन सूची में नेक्स्ट जेनरेशन एंटी-रेडिएशन मिसाइल, रुद्रम-II, UAV लॉन्च्ड प्रिसिजन गाइडेड मिसाइल, लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम, स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन, क्विक रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल, वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम और विभिन्न श्रेणियों की एंटी-शिप मिसाइलें शामिल हैं।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि निजी क्षेत्र को पारंपरिक मिसाइल निर्माण में प्रवेश देने के बाद सरकार भविष्य में रणनीतिक मिसाइल क्षेत्र में भी निजी भागीदारी का रास्ता खोल सकती है। रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियां पहले से ही मिसाइलों के करीब 50 विभिन्न सब-सिस्टम और घटकों की आपूर्ति कर रही हैं। ऐसे में सरकार अब अनुसंधान से लेकर उत्पादन और बड़े पैमाने पर विनिर्माण तक निजी उद्योग की भूमिका बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

सरकार के इस कदम को ‘आत्मनिर्भर भारत’ और भारत के सैन्य औद्योगिक आधार को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निजी कंपनियों की बड़ी उत्पादन क्षमता और DRDO की तकनीकी विशेषज्ञता को एक साथ लाने से मिसाइलों के उत्पादन में तेजी आ सकती है। साथ ही इससे रक्षा उपकरणों के घरेलू निर्माण, निजी क्षेत्र में निवेश और रक्षा क्षेत्र से जुड़े सहायक उद्योगों के विस्तार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

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