राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अगस्त 2026
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बिहार की भाजपा-नीत सरकार पर छात्रों के विरोध-प्रदर्शन को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करने का गंभीर आरोप लगाया है। राहुल गांधी की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब बिहार में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र संगठनों का विरोध जारी है। कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि जब युवा भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक और नियुक्ति प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर सवाल पूछ रहे हैं, तो सरकार उन सवालों का जवाब देने के बजाय पुलिस कार्रवाई का रास्ता क्यों अपना रही है। विवाद को और तीखा बनाने वाली घटना एक वायरल वीडियो है, जिसमें पटना में छात्र आंदोलन के दौरान एक छह वर्षीय बच्चे को पुलिस द्वारा ले जाते हुए दिखाया गया है। इस वीडियो ने पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के साथ प्रशासन के व्यवहार को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है।
राहुल गांधी ने अपने बयान में बिहार सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने और जवाबदेही से बचने के लिए पुलिस का सहारा लेने का आरोप लगाया। उनके मुताबिक बिहार के छात्र कोई असाधारण मांग नहीं कर रहे, बल्कि बेहद सामान्य और लोकतांत्रिक सवाल पूछ रहे हैं—भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं क्यों सामने आती हैं, पेपर लीक के आरोपों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती और युवाओं के भविष्य के साथ कब तक खिलवाड़ जारी रहेगा? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में सरकारी नौकरियां लाखों युवाओं के लिए रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा माध्यम हैं। ऐसे में किसी प्रतियोगी परीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठना सिर्फ परीक्षा केंद्र तक सीमित मामला नहीं होता, बल्कि हजारों-लाखों परिवारों की उम्मीदों और वर्षों की तैयारी से जुड़ा होता है।
भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी चिंता विश्वसनीयता और पारदर्शिता की होती है। एक युवा जब वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है, फीस जमा करता है, परीक्षा देता है और परिणाम की प्रतीक्षा करता है, तो उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष हो। यदि पेपर लीक, प्रश्नपत्र की गोपनीयता भंग होने, परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितता या चयन सूची में गड़बड़ी जैसे आरोप सामने आते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल यह कहना नहीं होती कि आरोप निराधार हैं। सरकार को जांच के जरिए यह स्पष्ट करना होता है कि वास्तव में क्या हुआ, कौन जिम्मेदार था और यदि गड़बड़ी हुई तो दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। परीक्षा व्यवस्था में भरोसा एक बार टूट जाए तो उसे केवल सरकारी बयान से वापस हासिल करना मुश्किल होता है।
बिहार जैसे राज्य में इस मुद्दे की संवेदनशीलता और ज्यादा है क्योंकि यहां सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या बहुत बड़ी है। रोजगार की सीमित संभावनाओं के बीच सरकारी भर्ती परीक्षा लाखों युवाओं के लिए जीवन बदलने का अवसर बनती है। यही कारण है कि परीक्षा से जुड़ी किसी भी कथित गड़बड़ी पर छात्र सड़क पर उतरते हैं। सरकार के लिए यह समझना जरूरी है कि हर प्रदर्शनकारी को राजनीतिक विरोधी मान लेना समस्या को और गंभीर बना सकता है। छात्रों के हाथ में किताब होनी चाहिए, सवाल हो सकते हैं, असहमति हो सकती है—लेकिन उनकी शिकायत का जवाब पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि पारदर्शी जांच और संवाद होना चाहिए।
हालांकि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की यह जिम्मेदारी भी है कि प्रदर्शन कानून के दायरे में हो और सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहे। प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है और यदि कोई प्रदर्शन हिंसक हो जाता है या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस कार्रवाई की भी एक सीमा होती है। बल प्रयोग आखिरी उपाय होना चाहिए, पहला जवाब नहीं। खासकर तब जब प्रदर्शन का मूल मुद्दा परीक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के भविष्य से जुड़ा हो। सरकार को यह दिखाना चाहिए कि वह असहमति को दबाने के बजाय शिकायतों की जड़ तक पहुंचने के लिए तैयार है।
इसी बीच छह साल के बच्चे को पुलिस द्वारा ले जाए जाने वाला कथित वीडियो पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बन गया है। उपलब्ध खबर में इस घटना के पूरे संदर्भ और पुलिस की ओर से बच्चे को ले जाने की वजह का विस्तृत विवरण सामने नहीं आया है, इसलिए केवल वीडियो के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि कोई नाबालिग वास्तव में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की चपेट में आया है, तो यह गंभीर सवाल जरूर उठाता है कि मौके पर प्रशासन ने स्थिति को किस तरह संभाला। बच्चे की मौजूदगी, प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और पुलिस कार्रवाई की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच जरूरी है, ताकि राजनीतिक आरोपों और वास्तविक तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट हो सके।
राहुल गांधी का हमला इसलिए भी राजनीतिक महत्व रखता है क्योंकि बिहार की राजनीति में युवा और रोजगार का सवाल लंबे समय से केंद्रीय मुद्दा रहा है। राज्य में चुनावी राजनीति के दौरान रोजगार, सरकारी भर्ती, पलायन और शिक्षा जैसे विषय बार-बार प्रमुखता से उठते रहे हैं। ऐसे में भर्ती परीक्षाओं को लेकर आंदोलन विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का बड़ा मुद्दा बन सकता है। दूसरी ओर सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह विरोध को केवल राजनीतिक साजिश बताकर समाप्त करने की कोशिश न करे। यदि परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो सरकार को दस्तावेज सामने रखकर छात्रों को विश्वास में लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप और आरोप सिद्ध होना दो अलग चीजें हैं। भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता या पेपर लीक के आरोप लगने भर से सरकार या किसी अधिकारी को दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन इसी तरह आरोप लगने के बाद जांच किए बिना उन्हें खारिज कर देना भी उचित नहीं है। लोकतांत्रिक शासन का रास्ता बीच का है—आरोप की निष्पक्ष जांच, तथ्य सार्वजनिक करना, दोषी पाए जाने पर कार्रवाई और निर्दोष पाए जाने पर स्पष्ट रूप से स्थिति बताना। यही प्रक्रिया छात्रों और सरकार दोनों के लिए सबसे बेहतर है।
बिहार सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। उसे एक तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखनी है, तो दूसरी तरफ उन छात्रों के सवालों का जवाब भी देना है जिनका भविष्य भर्ती परीक्षाओं के परिणामों पर निर्भर है। यदि सरकार वास्तव में मानती है कि परीक्षा व्यवस्था में कोई गंभीर गड़बड़ी नहीं हुई, तो उसे स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच के माध्यम से यह साबित करने का अवसर लेना चाहिए। वहीं यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी सामने आती है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और प्रभावित छात्रों के हित में सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए।
राहुल गांधी के बयान ने एक मूलभूत लोकतांत्रिक सवाल फिर सामने ला दिया है—सरकार से सवाल पूछने वाले युवाओं को जवाब मिलेगा या कार्रवाई? किसी भी लोकतंत्र में छात्रों का विरोध अपने आप में अपराध नहीं है। असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है, बशर्ते वह शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में हो। सरकार की मजबूती इस बात से साबित नहीं होती कि वह कितने प्रदर्शन रोक सकती है, बल्कि इससे होती है कि वह कितने कठिन सवालों का जवाब देने का साहस रखती है।
बिहार में छात्रों के आरोप, सरकार का रुख और पुलिस कार्रवाई—तीनों पर स्पष्ट और विस्तृत तथ्य सामने आना जरूरी है। अगर भर्ती परीक्षाएं निष्पक्ष थीं तो सरकार को यह पारदर्शिता से साबित करना चाहिए और अगर कहीं गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को राजनीतिक बयानबाजी में दबाने के बजाय उनका तथ्यात्मक समाधान ही बिहार सरकार के लिए सबसे विश्वसनीय रास्ता होगा।




