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अमेरिका पर कनाडा का पलटवार, 700 से ज्यादा अमेरिकी उत्पादों पर 50% तक टैरिफ

अमेरिका की ओर से कनाडाई सामान पर नए भारी शुल्क लगाए जाने के बाद ओटावा ने भी ‘डॉलर-फॉर-डॉलर’ जवाब दिया है। कनाडा करीब 19.9 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान पर 15% से 50% तक जवाबी टैरिफ लगाएगा। 8 सितंबर से लागू होने वाला यह फैसला दोनों पड़ोसी देशों के बीच बढ़ते व्यापार युद्ध को और तेज कर सकता है।

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | ओटावा | 26 अगस्त 2026

अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव अब खुले टैरिफ टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से कनाडाई उत्पादों पर नए भारी शुल्क लगाए जाने के बाद कनाडा ने भी पलटवार किया है। कनाडा सरकार ने करीब 27.6 अरब कनाडाई डॉलर यानी 19.9 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान पर जवाबी टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। इन शुल्कों की चपेट में 700 से ज्यादा अमेरिकी उत्पाद आएंगे और ये नए टैरिफ 8 सितंबर 2026 से प्रभावी होंगे। कनाडा ने इसे अमेरिका की कार्रवाई का ‘डॉलर-फॉर-डॉलर’ जवाब बताया है।

कनाडा के नए टैरिफ की दरें अलग-अलग उत्पादों के लिए 15% से लेकर 50% तक होंगी। स्टील और एल्युमिनियम, डेयरी उत्पाद, घरेलू उपकरण, कृषि मशीनरी, पल्प और पेपर, प्लास्टिक तथा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कई प्रमुख क्षेत्रों को निशाना बनाया गया है। यानी यह जवाब केवल कुछ चुनिंदा अमेरिकी सामान तक सीमित नहीं है, बल्कि औद्योगिक उत्पादन से लेकर रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं तक कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। ओटावा का उद्देश्य साफ तौर पर अमेरिकी दबाव का आर्थिक जवाब देना और वॉशिंगटन को बातचीत की मेज पर वापस लाने के लिए दबाव बनाना है।

यह कदम दोनों देशों के बीच कई दिनों से बिगड़ती व्यापार वार्ता के बाद आया है। कनाडा और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी, लेकिन हाल के दिनों में वार्ता पटरी से उतर गई। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने करीब 20 अरब डॉलर मूल्य के कनाडाई सामान पर 50% तक के नए शुल्क लगाए। कनाडा ने इसे एकतरफा दबाव के तौर पर देखा और अब समान मूल्य के अमेरिकी सामान पर जवाबी शुल्क लगाने का निर्णय लिया है।

कनाडा ने सिर्फ टैरिफ लगाने तक अपनी रणनीति सीमित नहीं रखी है। सरकार ने व्यापार युद्ध से प्रभावित छोटे और मध्यम कारोबारों को राहत देने के लिए 7.5 अरब कनाडाई डॉलर यानी करीब 5.4 अरब अमेरिकी डॉलर के वित्तीय सहायता पैकेज का भी ऐलान किया है। इसका उद्देश्य उन कंपनियों और कारोबारों को आर्थिक सहारा देना है जिन पर अमेरिकी टैरिफ और उससे पैदा होने वाली अनिश्चितता का सीधा असर पड़ सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि ओटावा लंबी व्यापारिक लड़ाई की संभावना को भी ध्यान में रखकर तैयारी कर रहा है।

इस टकराव का असर सिर्फ सरकारों और बड़ी कंपनियों तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। टैरिफ का भुगतान सीधे तौर पर आयात करने वाली कंपनियों को करना पड़ता है, लेकिन बढ़ी हुई लागत अक्सर उत्पादों की कीमतों के रूप में उपभोक्ताओं तक पहुंचती है। ऐसे में कनाडा के अमेरिकी सामान पर लगाए गए नए शुल्क से कनाडाई बाजार में अमेरिकी उत्पाद महंगे हो सकते हैं, जबकि अमेरिका में पहले से लगाए गए कनाडाई सामान पर शुल्क वहां के कारोबार और उपभोक्ताओं की लागत बढ़ा सकते हैं। यानी दोनों तरफ की टैरिफ नीति का अंतिम बोझ आम लोगों तक पहुंचने का खतरा है।

अमेरिका और कनाडा की अर्थव्यवस्थाओं के बीच गहरी व्यापारिक निर्भरता इस विवाद को और गंभीर बनाती है। दोनों देशों के बीच ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, कृषि, धातु, मशीनरी और उपभोक्ता वस्तुओं की विशाल सप्लाई चेन जुड़ी हुई है। कई कंपनियों का उत्पादन एक ही देश में शुरू होकर दूसरे देश में पूरा होता है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाला टैरिफ युद्ध केवल आयात-निर्यात को प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि उत्पादन लागत, निवेश, रोजगार और सप्लाई चेन पर भी दबाव डाल सकता है।

व्यापारिक विवाद के साथ राजनीतिक बयानबाजी ने भी माहौल को गर्म कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी पर हाल के दिनों में तीखी टिप्पणियां की हैं। ट्रंप ने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की अपनी पुरानी टिप्पणी भी दोहराई है। उन्होंने यहां तक कहा कि वह ओंटारियो झील का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ करने पर विचार कर रहे हैं। कनाडा के लिए इस तरह की टिप्पणियां सिर्फ मजाक या राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ती असहजता का संकेत भी मानी जा रही हैं।

कनाडा की जवाबी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने ऐसे उत्पादों को भी टैरिफ के दायरे में रखा है जिनका अमेरिकी उद्योगों पर प्रभाव पड़ सकता है। इससे ओटावा वॉशिंगटन को यह संदेश देना चाहता है कि व्यापार युद्ध की कीमत सिर्फ कनाडा को नहीं चुकानी पड़ेगी। अगर अमेरिका शुल्क बढ़ाता है, तो अमेरिकी उत्पादकों और कारोबारियों को भी कनाडाई बाजार में अतिरिक्त लागत और प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

हालांकि, कनाडा के लिए भी यह कदम जोखिम से खाली नहीं है। अमेरिका उसके सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में से एक है और दोनों देशों के बीच व्यापार का आकार बेहद बड़ा है। लंबे समय तक चलने वाला टैरिफ युद्ध कनाडाई कंपनियों, किसानों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को भी नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि कनाडा ने एक तरफ अमेरिका को जवाबी टैरिफ से चुनौती दी है, तो दूसरी तरफ अपने घरेलू कारोबारों के लिए अरबों डॉलर के राहत पैकेज का इंतजाम किया है।

अब निगाह इस बात पर है कि वॉशिंगटन कनाडा के इस पलटवार का क्या जवाब देता है। यदि अमेरिका नए कनाडाई टैरिफ के जवाब में फिर शुल्क बढ़ाता है और कनाडा उसके बाद एक और जवाबी कदम उठाता है, तो दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध और व्यापक हो सकता है। इसका असर उत्तरी अमेरिका की अर्थव्यवस्था से आगे वैश्विक बाजारों और सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल कनाडा ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दे दिया है—टैरिफ का जवाब टैरिफ से दिया जाएगा। अमेरिका और कनाडा के बीच शुरू हुआ यह ‘टिट फॉर टैट’ अब केवल शुल्क लगाने और हटाने का मामला नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के आर्थिक हितों, राजनीतिक रिश्तों और उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था की भविष्य की दिशा की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

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