राष्ट्रीय/कर्नाटक | ABC NATIONAL NEWS | बेंगलुरु | 26 अगस्त 2026
मतदाता सूची के सत्यापन के लिए समय बढ़ाने की मांग
कर्नाटक में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भारत निर्वाचन आयोग से SIR के तहत दावे-आपत्तियां दाखिल करने और मतदाताओं के सत्यापन के लिए उपलब्ध समय बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर कहा कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम Absent, Shifted, Dead, Duplicate और Others (ASDDO) श्रेणियों में रखे गए हैं। इसके अलावा कई मतदाताओं के रिकॉर्ड में “logical discrepancies” यानी तार्किक विसंगतियों के आधार पर सत्यापन की जरूरत बताई गई है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मामलों को देखते हुए मतदाताओं को पर्याप्त समय और उचित प्रक्रिया मिलना जरूरी है।
‘मोबिलिटी’ की वजह से वोट का अधिकार न छिने
शिवकुमार ने अपने पत्र में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और लोकतांत्रिक सवाल उठाया है। उनका कहना है कि लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या उनका स्थान बदलना उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बनना चाहिए। उन्होंने इसी संदर्भ में कहा कि “Mobility should not translate into disenfranchisement”, यानी लोगों की आवाजाही का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि वे अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं। यह मुद्दा खास तौर पर उन मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो रोजगार, शिक्षा, कारोबार या अन्य कारणों से एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं, लेकिन उनका नाम मतदाता सूची में बना रहता है या उन्हें अपने मतदाता रिकॉर्ड को सत्यापित कराने की जरूरत पड़ती है।
ASDDO श्रेणी ने बढ़ाई चिंता
SIR के दौरान मतदाताओं को अलग-अलग श्रेणियों में चिह्नित किया जा रहा है। Absent यानी अनुपस्थित, Shifted यानी स्थानांतरित, Dead यानी मृत, Duplicate यानी दोहरे नाम और Others यानी अन्य श्रेणी में रखे गए नामों को लेकर अब सत्यापन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है। सरकार की चिंता यह है कि यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सत्यापन के दायरे में हैं, तो उन्हें अपने दस्तावेज और दावे प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। किसी वास्तविक मतदाता का नाम केवल रिकॉर्ड में मौजूद किसी विसंगति के कारण हट जाए, तो उसका सीधा असर उसके संवैधानिक मताधिकार पर पड़ सकता है।
5.13 लाख नामों का मामला भी सामने
कर्नाटक में SIR को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि बेलगावी में 5.13 लाख मतदाताओं के नाम SIR प्रक्रिया में छूटने की खबर सामने आई है। ऐसे आंकड़े चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सत्यापन की आवश्यकता को और महत्वपूर्ण बना देते हैं। हालांकि किसी नाम का प्रारंभिक रूप से सूची से बाहर होना और अंतिम रूप से मतदाता सूची से हट जाना एक ही बात नहीं है, फिर भी इतनी बड़ी संख्या में नामों को लेकर दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया बेहद सावधानी से संचालित करना जरूरी है।
निष्पक्ष प्रक्रिया सबसे जरूरी
मतदाता सूची को अपडेट करना निर्वाचन प्रक्रिया का सामान्य और आवश्यक हिस्सा है। मृत मतदाताओं के नाम हटाना, डुप्लीकेट रिकॉर्ड की पहचान करना और स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को दुरुस्त करना जरूरी है। लेकिन इसी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलती से न हटे। चुनावी सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, मताधिकार की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी नाम को हटाने या किसी मतदाता को सत्यापन के दायरे में रखने से पहले पर्याप्त सूचना, सुनवाई और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिलना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती के लिए जरूरी है।
चुनाव आयोग के सामने बड़ी जिम्मेदारी
अब नजर चुनाव आयोग के अगले कदम पर है। मुख्यमंत्री की मांग स्वीकार होती है या नहीं, यह आयोग तय करेगा। लेकिन SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया में समय सीमा, सत्यापन की पारदर्शिता और दावे-आपत्तियों की प्रभावी सुनवाई बेहद अहम होगी। खासकर उन मतदाताओं के लिए जो किसी कारण से अपने पुराने पते पर मौजूद नहीं हैं या जिनके रिकॉर्ड में तकनीकी अथवा दस्तावेजी विसंगतियां हैं।
मतदाता सूची सिर्फ आंकड़ा नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद
आखिरकार मतदाता सूची केवल नामों की एक सरकारी सूची नहीं है। यह उस नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार का आधार है जिसके जरिए वह सरकार चुनता है। इसलिए SIR में गलत नाम बने रहना भी समस्या है और सही मतदाता का नाम हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है। चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता तभी कायम रहेगी जब हर वास्तविक मतदाता को अपना नाम सत्यापित कराने, गलती सुधारने और अपने मताधिकार की रक्षा करने का पर्याप्त अवसर मिले। कर्नाटक में SIR को लेकर अब यही सबसे बड़ा सवाल है—सूची कितनी साफ होगी, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि सफाई की प्रक्रिया में किसी वास्तविक मतदाता की आवाज कहीं मिट न जाए।




